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जीते एक पार्टी से, पहुंचे दूसरी में : चार साल में 111 जनप्रतिनिधियों ने बदला पाला, दल-बदल से समझिए बदलती सियासत की हवा

वैसे चुनाव जीतने के बाद किसी सांसद या विधायक का पार्टी बदलना भारतीय राजनीति में नया नहीं है। लेकिन 2022 से 2026 के बीच ऐसे मामलों का एक नया आंकड़ा सामने आया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच के विश्लेषण के मुताबिक, इस अवधि में 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदली। इनमें 26 लोकसभा सांसद,7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं।

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दल-बदल से चार साल में बदले सियासी समीकरण। (फोटो- AI)
Edited by: शिव शुक्ला
Updated Sep 26, 2026, 17:39 IST
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जब भी कोई चुनाव होता है,चाहे वह विधानसभा का हो या लोकसभा का या फिर स्थानीय निकाय चुनाव उसमें जनता से मिले वोट किसी नेता को सिर्फ सदन तक नहीं पहुंचाते,बल्कि एक राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के तौर पर भी पहचान देते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद जब वही सांसद या विधायक पार्टी बदल ले तो सवाल सिर्फ एक नेता के पाला बदलने का नहीं रहता, सवाल उस जनादेश पर भी उठता है,जिसके आधार पर वह सदन तक पहुंचा था।

वैसे चुनाव जीतने के बाद किसी सांसद या विधायक का पार्टी बदलना भारतीय राजनीति में नया नहीं है। लेकिन 2022 से 2026 के बीच ऐसे मामलों का एक नया आंकड़ा सामने आया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच के विश्लेषण के मुताबिक, इस अवधि में 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदली। इनमें 26 लोकसभा सांसद,7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं।

ऐसे में बड़े सवाल ये हैं कि आखिर सबसे ज्यादा नेता किस राज्य में पाला बदलते नजर आए? कौन सी पार्टियों से सबसे ज्यादा नेता निकले और किन दलों ने सबसे ज्यादा नए प्रतिनिधियों को अपने साथ जोड़ा? इस पूरे आंकड़े को समझना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ये मामला सिर्फ राजनीतिक निष्ठा का नहीं, बल्कि देश के दलबदल विरोधी कानून से भी जुड़ा है।

ये 111 मामले हैं क्या?

ADR ने केवल उन नेताओं को इस विश्लेषण में शामिल किया है, जिन्होंने संसद या विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदली। इसमें चार तरह के मामले शामिल किए गए हैं। पहला, जब कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चला गया। दूसरा,जब किसी पार्टी या उसके विधायी समूह का दूसरी पार्टी में विलय हुआ। तीसरा,जब किसी नेता ने इस्तीफा दिया, दूसरी पार्टी में शामिल हुआ और फिर उपचुनाव जीतकर दोबारा सदन में पहुंचा। चौथा, जब किसी सदस्य को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद उसने दूसरी पार्टी से उपचुनाव जीता।

किस राज्य में सबसे ज्यादा दल बदले गए?

ADR के मुताबिक,2022 से 2026 के बीच पार्टी बदलने वाले नेताओं में नगालैंड सबसे ऊपर रहा,जहां 32 विधायकों ने जीत के बाद पार्टी बदल ली थी। नगालैंड का ये घटनाक्रम नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) और नगा पीपुल्स फ्रंट (NPF) के बीच राजनीतिक पुनर्गठन से जुड़ा था। इनमें एनडीपीपी से मूल रूप से चुने गए 25 विधायक उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने पार्टी बदल ली,जबकि कुल 32 विधायक एनपीएफ में शामिल हो गए।

इसके बाद पश्चिम बंगाल में हालिया विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक उठापटक के बीच दलबदल से जुड़ा बड़ा घटनाक्रम सामने आया था। जब राजनीतिक उठापटक के बीच 20 सांसदों ने उस पार्टी को झटका दे दिया था, जिसके बैनर तले वे चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। ADR के अनुसार,ये सांसद मूल रूप से ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) के टिकट पर चुने गए थे और बाद में नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में चले गए। इन सांसदों ने इसे पार्टी विलय बताया है और मामला लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष लंबित है।

इसके बाद तेलंगाना में 9, गोवा में 8 और पंजाब में 8 ऐसे मामले दर्ज किए गए।

बाकी राज्यों का क्या आंकड़ा है?

महाराष्ट्र में 6 सांसदों ने ऐसा ही कुछ किया था। ये सभी लोकसभा सांसद थे, जो शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के टिकट पर चुने गए थे और बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में चले गए। मेघालय में 6 विधायक, मणिपुर में 5, जबकि अरुणाचल प्रदेश और गुजरात में 4-4 ऐसे घटनाक्रम सामने आए थे। हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में 2-2 मामले रहे।

कर्नाटक, मध्य प्रदेश, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में एक-एक मामला दर्ज हुआ। दिल्ली में एक राज्यसभा सदस्य के पार्टी बदलने का मामला विश्लेषण में शामिल है। कुल मिलाकर ADR ने 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसे मामले दर्ज किए।

कौन सी पार्टियों से सबसे ज्यादा नेता निकले?

ADR की रिपोर्ट के आधार पर देखें तो जिन पार्टियों को सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधियों ने दूसरी जगह रास्ता तलाशा तो उनमें NDPP सबसे ऊपर रहा। उसके 25 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने पार्टी बदली। इसके बाद AITC के 20 और कांग्रेस के 19 प्रतिनिधि रहे। इसके अलावा BRS के 9, AAP और NCP के 7-7, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 6, JD(U) के 5 और NPP के 4 प्रतिनिधि इस सूची में शामिल हैं।

ADR के मुताबिक नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी ,ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस से चुनाव जीतने के बाद उसे छोड़कर निकले प्रतिनिधियों की संख्या कुल 64 है, यानी कुल 111 मामलों का करीब 58 प्रतिशत है।

सबसे ज्यादा नेताओं ने किन पार्टियों का दामन थामा?

दूसरी तरफ यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि दल बदलने वाले नेताओं ने किन पार्टियों का रुख किया। एडीआर के आंकड़ों में NPF के साथ 32 प्रतिनिधियों के जुड़ने की बात कही गई है। इसके बाद भाजपा में 29 और एनसीपीआई में 20 प्रतिनिधि शामिल हुए। कांग्रेस को 9,शिवसेना को 8, एनपीपी को 6 और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल को 4 प्रतिनिधि मिले। यानी NPF, BJP और NCPI में शामिल होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या 81, यानी कुल 111 मामलों का लगभग 73 प्रतिशत है।

क्या हर बार पार्टी बदलना 'दलबदल' माना जाता है?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। आम बोलचाल में पार्टी बदलने को दलबदल कहा जाता है, लेकिन संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है, इसके लिए अलग कानूनी व्यवस्था तय करती है।

संविधान की 10वीं अनुसूची में क्या है?

संविधान की 10वीं अनुसूची वह संवैधानिक व्यवस्था है, जिसके तहत सांसदों और विधायकों के दल-बदल को नियंत्रित किया जाता है। इसे आमतौर पर Anti-Defection Law (दल-बदल विरोधी कानून) कहा जाता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनता जिस राजनीतिक दल के उम्मीदवार को चुनकर संसद या विधानसभा भेजती है, वह व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक अवसरवाद के कारण बीच कार्यकाल में पार्टी न बदले। इसका मकसद निर्वाचित सरकारों को अस्थिर होने से बचाना और लोकतांत्रिक जनादेश की रक्षा करना भी है।

दल-बदल कानून के तहत कब सदस्यता खत्म हो सकती है?

10वीं अनुसूची के अनुसार किसी सांसद या विधायक को कई परिस्थितियों में अयोग्य घोषित किया जा सकता है।

सबसे पहला आधार यह है कि यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। दिलचस्प बात यह है कि केवल लिखित इस्तीफा देना ही पार्टी छोड़ना नहीं माना जाता। यदि किसी सदस्य का आचरण यह दर्शाता है कि उसने व्यवहारिक रूप से पार्टी छोड़ दी है,तो भी उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।

दूसरी स्थिति तब बनती है,जब कोई सांसद या विधायक सदन में अपनी पार्टी के व्हिप (Whip) के खिलाफ मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है और पार्टी उसे इसकी अनुमति नहीं देती। ऐसे मामलों में भी दल-बदल कानून लागू हो सकता है।

निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए नियम और भी सख्त हैं। यदि कोई निर्दलीय विधायक या सांसद चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है,तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।

वहीं, मनोनीत सदस्यों को शपथ लेने के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल होने की छूट होती है। यदि वे इसके बाद किसी दल का सदस्य बनते हैं, तो उन पर भी दल-बदल कानून लागू हो सकता है।

दलबदल कानून का फैसला कौन करता है?

मौजूदा व्यवस्था में संसद में दलबदल से जुड़े अयोग्यता मामलों पर निर्णय लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के स्तर पर और विधानसभाओं में संबंधित विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर होता है।

ADR ने इस व्यवस्था में बदलाव की सिफारिश की है। संस्था का सुझाव है कि सांसदों के मामले में अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला राष्ट्रपति और विधायकों के मामले में राज्यपाल करें, जबकि निर्णय चुनाव आयोग की सलाह के आधार पर हो। ADR ने यह भी सुझाव दिया है कि ऐसी याचिकाओं के निपटारे के लिए निश्चित समय सीमा होनी चाहिए। इसके अलावा पार्टी बदलने वाले नेताओं के दोबारा निर्वाचित होने तक सार्वजनिक पद संभालने पर रोक लगाने का सुझाव भी दिया गया है।

क्या दलबदल से सरकारें भी गिर सकती हैं?

ADR ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में सरकारों के गिरने के घटनाक्रम को विधायकों के दलबदल से जोड़ा गया है। इसका कारण यह है कि विधानसभा में कुछ विधायकों के पाला बदलने से किसी सरकार के पास मौजूद बहुमत का समीकरण बदल सकता है।

हालांकि, किसी खास सरकार के गिरने के पीछे केवल दलबदल ही कारण था, ऐसा निष्कर्ष हर मामले में अलग से स्थापित करना होगा। राजनीतिक घटनाक्रम, इस्तीफे, गठबंधन और सदन में संख्या-बल जैसे दूसरे कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।

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