CEC Row: देश में विपक्षी दलों की राजनीति चुनाव आयोग के इर्द-गिर्द घूम रही है। पिछले कुछ दिनों से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं। इस बीच, 40 से ज्यादा पूर्व जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के कथित प्रयासों पर गंभीर चिंता जताते हुए एक खुला पत्र लिखा।
चुनाव आयोग (फाइल फोटो)
पूर्व जजों ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के लगातार 'वोट चोरी' जैसे आरोप लगाना और संवैधानिक संस्थाओं को 'चोर' या 'समझौता करने वाला' बताना लोकतंत्र में जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा, ''संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बदनाम करना नहीं।''
पूर्व जजों ने SIR का किया बचाव
42 जजों ने खुले पत्र में कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बदनाम करना उचित नहीं है। उन्होंने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह मतदाता सूचियों को स्वच्छ और सटीक बनाने के मकसद से कानून के तहत की जाने वाली एक प्रक्रिया है।
पत्र में कहा गया कि लोकतंत्र में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण आधार है। चुनावों की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठाकर उन्हें अवैध ठहराने की कोशिश से सामाजिक अस्थिरता बढ़ सकती है और अराजक तत्वों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
CEC के खिलाफ विपक्षी दलों का प्रदर्शन
पिछले तीन दिनों से विपक्षी दलों का सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहा है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में विपक्षी दलों के सांसदों ने मंगलवार को चुनाव आयोग का घेराव करने की कोशिश की, लेकिन दिल्ली पुलिस ने उन्हें आकाशवाणी के पास रोक दिया और बाद में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को हिरासत में ले लिया गया।
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इसके बाद, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बुधवार को विपक्षी दलों के सांसदों को कनॉट प्लेस में लंच पर बुलाया और वहां से सीधे जंतर-मंतर स्थित धरना स्थल की ओर रुख किया, लेकिन धरना स्थल से कुछ दूरी पर एक बार फिर राहुल-प्रियंका को हिरासत में ले लिया गया। इसके बाद, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें पुलिस के साथ मारपीट के आरोप लगाए गए।
