सुपरबग्स क्या हैं और क्यों बढ़ रहे हैं?
Antibiotic Resistance Explained: आमतौर पर जब हमारे घर में किसी को मामूली बुखार, पेट दर्द या यूरिन इन्फेक्शन हो जाए तो आप क्या करते हैं? डॉक्टर के पास जाते हैं, दवा लेते हैं, और उम्मीद करते हैं कि 2-3 दिन में सब ठीक हो जाएगा। यही तो हम सालों से करते आ रहे हैं। लेकिन अब यह भरोसा धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। क्योंकि जो एंटीबायोटिक दवाएं कभी जादू की तरह काम करती थीं, वही आज कई बार हमारे सामने हार मान रही हैं।
आजकल ज्यादातर लोग शिकायत कर रहे हैं कि किसी भी तरह का संक्रमण होने पर उन्हें एंटीबायोटिक दवाओं से आराम नहीं मिल रहा है। कई लोगों को पहली दवा से आराम नहीं मिल रहा, तो बहुत से लोग ऐसे हैं जिनपर दूसरी दवा भी बेअसर हो रही है। अब ऐसे में आखिर में मरीज को सीधा जाकर अस्पताल में ही भर्ती करना पड़ा। लेकिन समझने वाली बात यह है कि आखिर ऐसा हो कैसे सकता है या क्यों हो रहा है? आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि भारत में लाखों लोग इसी डर और असहाय स्थिति का सामना कर रहे हैं।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) की ताजा रिपोर्ट और लांसेट (Lancet) जैसी ग्लोबल स्टडीज में लगातार यह बात सामने आ रही है कि एंटीबायोटिक्स की ताकत लगातार घट रही है। आम बैक्टीरिया भी अब इन दवाओं के खिलाफ शक्ति विकसित कर रहे हैं। डॉक्टर भी कह रहे हैं कि अगर अभी नहीं संभले, तो आने वाले सालों में साधारण संक्रमण भी जानलेवा हो सकते हैं। आज के इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्यों एंटीबायोटिक्स बेअसर हो रही हैं, इसको लेकर स्टडीज क्या चेतावनी दे रही हैं, और इस पर डॉक्टर्स का क्या कहना है।
ICMR की 2024-25 AMRSN रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कई एंटीबायोटिक दवाएं अब आम बैक्टीरिया पर असर नहीं दिखा रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में पाई जाने वाली कई सामान्य दवाएं जैसे फ्लोरोकिनोलोन्स, सेफालोस्पोरिन, पिपरेसिलिन-टैजोबैक्टम, कार्बापेनेम आदि पर बैक्टीरिया रेजिस्टेंट हो चुके हैं।
अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के सीनियर कसंल्टेंट और संक्रामक रोग एक्सपर्ट डॉ. रोहित कुमार गर्ग बताते हैं, कि ऐसा नहीं है कि दवाएं खराब हैं, बल्कि समस्या यह है कि बैक्टीरिया अब उनसे निपटने के हथकंडे सीख चुके हैं।
अस्पतला के एक अन्य इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मोहित शर्मा बताते हैं कि सुपरबग्स वो बैक्टीरिया हैं जो कई एंटीबायोटिक्स को झेल लेते हैं। ICMR रिपोर्ट के डेटा में देखा गया कि भारत में 2024-25 के दौरान ग्रान-निगेटिव (Gram-negative) बैक्टीरिया सबसे ज्यादा तेजी से बढ़े। सबसे खतरनाक बैक्टीरिया में शामिल हैं,
फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग के चिकित्सक एवं नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. भानु मिश्रा का कहना है कि अब यह समझना जरूरी है कि दिक्कत सिर्फ संक्रमण बढ़ने की नहीं है, बल्कि हमारी सबसे भारी-भरकम दवाएं ही हार मान रही हैं। इससे डॉक्टरों के सामने इलाज के विकल्प बेहद सीमित हो जाते हैं। ICMR की मॉनिटरिंग रिपोर्ट बताती है कि -
यह स्थिति भारत के लिए बेहद गंभीर अलार्म है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भारत में UTI अब पहले जितना आसान नहीं रहा क्योंकि E. coli लगभग 50% से ज्यादा एंटीबायोटिक्स पर रेजिस्टेंट है। क्लेबसिएला निमोनिया तो कई वार्डों में बड़े संक्रमण फैला चुका है, जिससे निमोनिया और सीप्सिस का इलाज और लंबा व महंगा हो रहा है।
डॉ. मोहित कहते हैं कि बैक्टीरिया अब बहुत चतुर हो चुके हैं। वही संक्रमण, जो पहले 3 दिन में ठीक हो जाता था, अब कई बार 15–20 दिन भी ले लेता है।
डॉक्टर्स का मानना है कि संख्या कभी झूठ नहीं बोलती। रिपोर्ट्स में सामने आए आंकड़े साफ दिखाते हैं कि भारत में संक्रमण कितनी तेजी से खतरनाक रूप ले रहे हैं। दुनिया के मुकाबले यह अंतर इतना बड़ा है कि हालात को हल्के में लेना नामुमकिन है। अगर आप तुलनात्मक रूप से देखें तो संक्रमण की स्थिति कुछ ऐसी है,
लांसेट स्टडी और अन्य रिपोर्ट्स के विश्लेषण बताते हैं कि भारत में हर साल 3 लाख से अधिक मौतें एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस से जुड़ी हो सकती हैं। यानी सिर्फ दवाएं काम नहीं कर रहीं इस वजह से इलाज देर से शुरू होता है, बीमारी बढ़ती है और कई बार मरीज की जान तक चली जाती है।
डॉ. रोहित गर्ग की मानें तो हम अक्सर सोचते हैं कि एंटीबायोटिक ले लेने से जल्दी आराम मिलेगा। लेकिन यही जल्दबाजी हमें और ज्यादा कमजोर बना देती है। गलत तरीके से ली गई दवा बैक्टीरिया को और ताकतवर बना देती है। इसमें भारतीयों की कुछ सामान्य गलतियां शामिल हैं,
डॉ. भानु मिश्रा का कहना है कि अस्पतालों में हालात और चुनौतीपूर्ण हैं, क्योंकि मरीज ज्यादा, स्टाफ पर दबाव ज्यादा और दवाओं का दोहराव भी आम है। ऐसे माहौल में सुपरबग्स का फैलना और तेज हो जाता है। ICMR का डेटा बताता है,
डॉक्टर्स और स्टडीज कह रहे हैं कि अगर स्थिति ऐसी ही रही तो यह साधारण संक्रमण जानलेवा बन सकता है। UTI, निमोनिया, पेट का संक्रमण, डायरिया - ये वो बीमारियां हैं जिनका इलाज अब पहले जैसा आसान नहीं रहा। सुपरबग्स के कारण केस लंबा चलता है, दवाएं बार-बार बदलनी पड़ती हैं और मरीज की हालत बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
हेल्थ एक्सपर्ट की मानें तो हर किसी पर इसका असर पड़ सकता है, लेकिन कुछ समूहों के लिए यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इन लोगों में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है या बीमारी पहले से गंभीर होती है। लेकिन सबसे ज्यादा जोखिम ये लोग हैं,
डॉक्टर्स कहते हैं कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को रोकना मुश्किल जरूर है, लेकिन यह असंभव काम नहीं है। बस एक संगठित प्रयास की जरूर है जिसमें व्यक्ति, डॉक्टर, अस्पताल और सरकार सबको साथ आना होगा। इसके लिए वैज्ञानिक और डॉक्टर तीन बड़े कदम सुझाव देते हैं,
कई डॉक्टर मानते हैं कि भारत में अब नई एंटीबायोटिक्स, वैक्सीन और वैकल्पिक इलाज की जरूरत है। ICMR और कई संस्थाओं में शोध चल रहा है, पर यह तभी असर करेगा जब आम लोग भी दवाओं का सही इस्तेमाल करेंगे।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कोई मेडिकल शब्द नहीं, यह हमारे हर घर में उभरता हुआ खतरा है। अगर हम आज सावधान नहीं हुए, तो आने वाले समय में साधारण संक्रमण भी जानलेवा हो सकते हैं। लेकिन यदि हम दवाओं का समझदारी से उपयोग करें, सही जानकारी रखें और डॉक्टर की सलाह मानें तो यह संकट रोका जा सकता है।