Extreme Heat: भारत में गर्मी हर साल नए रिकॉर्ड बना रही है। इस समय जब तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, तो यह मौसम सिर्फ असहज करने वाला नहीं रहता बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य आपदा बन जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मानव शरीर का सामान्य आंतरिक तापमान लगभग 36.5 से 37.5 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। शरीर इसी सीमित तापमान पर ठीक से काम करता है। लेकिन जब बाहरी तापमान 48 डिग्री तक पहुंचता है, तो शरीर की कूलिंग प्रणाली पर अत्यधिक दबाव पड़ने लगता है। ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है। कि मानव शरीर कितनी भीषण गर्मी को झेल सकता है? और शरीर के अलग-अलग अंगों पर गर्मी का कैसा असर (Heat wave Effects on Body) होता है। आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से...
कितना तापमान झेल सकता है हमारा शरीर
शरीर कैसे खुद को ठंडा रखता है
मानव शरीर के पास खुद को ठंडा रखने के लिए मुख्य रूप से दो तरीके है। पहला पसीना और दूसरा रक्त संचार (blood circulation)। जब गर्मी बढ़ती है, तो शरीर पसीना बनाकर खुद को ठंडा करने का प्रयास करता है, जिससे त्वचा की सतह ठंडी होती है। इसके साथ ही हमारा रक्त त्वचा की सतह की ओर अधिक भेजा जाता है ताकि गर्मी शरीर के बाहर निकल सके।
लेकिन जब बाहरी तापमान बहुत ज्यादा यानी 45–48°C हो जाता है, तो हवा पहले से ही इतनी गर्म होती है कि पसीना वाष्पित नहीं हो पाता है। इसका नतीजा यह होता है कि शरीर ठंडा नहीं हो पाता और अंदरूनी तापमान बढ़ने लगता है।
गर्मी का शरीर के अंगों पर असर
मस्तिष्क
दिमाग शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। जब शरीर का तापमान 39–40°C से ऊपर जाता है, तो मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। यदि तापामन 48 डिग्री हो जाए तो इस गर्मी में हीट स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में मस्तिष्क में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी से न्यूरॉन्स ठीक से काम नहीं कर पाते हैं।
दिल
गर्मी में दिल को शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा तेजी से पंप करना पड़ता है। इससे हार्ट रेट बढ़ जाता है। यही कारण है कि हीटवेव में दिल से जुड़ी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। दिल लगातार शरीर को ठंडा रखने के लिए त्वचा तक रक्त पहुंचाने की कोशिश करता है, जिससे वह थक जाता है।
किडनी
भीषण गर्मी में सबसे बुरा असर हमारी किडनी पर पड़ता है। ऐसे में शरीर से अत्यधिक पसीना निकलता है, जिससे डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है। किडनी का काम शरीर से विषैले पदार्थ निकालना और खून को फिल्टर करना है, लेकिन पानी की कमी से यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है।
फेफड़े
गर्मी के कारण सांस लेने की गति बढ़ जाती है। क्योंकि ऐसे में शरीर ज्यादा ऑक्सीजन लेने की कोशिश करता है, लेकिन गर्म और सूखी हवा से फेफड़ों पर दबाव बढ़ता है। यही कारण है कि 40 डिग्री से ज्यादा तापमान होने पर हमारे फेफड़े प्रभावित हो सकते हैं।
क्या इंसान 50°C तापमान झेल सकता है?
सीधे तौर पर देखें तो मानव शरीर लंबे समय तक 50°C तापमान में जीवित नहीं रह सकता, खासकर जब हवा में नमी (humidity) भी अधिक हो। वैज्ञानिक रूप से, शरीर की “survival limit” लगभग 40–42°C core body temperature के आसपास मानी जाती है। इससे ऊपर जाते ही हीट स्ट्रोक का खतरा जानलेवा हो सकता है। हालांकि सूखी गर्मी (dry heat) में कुछ समय के लिए शरीर survive कर सकता है, लेकिन लगातार एक्सपोजर बेहद खतरनाक होता है।
