चार सूबे, 40 लोकसभा और 160 विधानसभा सीटें...समझें- आखिर जाट फैक्टर को क्यों नजरअंदाज नहीं कर सकती है BJP

  • Compiled by: अभिषेक गुप्ता
  • Updated Jun 10, 2023, 02:33 PM IST

ऐतिहासिक रूप से देखें तो हम पाते हैं कि जाटों का उत्तर भारत की राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव रहा है। 1950 और 1960 के दशक में देवी लाल और रणबीर सिंह हुड्डा (हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पिता) (अविभाजित) पंजाब के प्रमुख जाट नेता थे, जबकि राजस्थान में नाथूराम मिर्धा थे और यूपी में चौधरी चरण सिंह (अजीत सिंह के पिता) थे।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के निवर्तमान अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह (Brij Bhushan Sharan Singh) के खिलाफ पहलवानों के प्रदर्शन (Wrestlers Protest) ने न सिर्फ भगवा पार्टी को प्रेशर में ला दिया बल्कि उसके जाट वोटबैंक (Jat Votebank) के दिमाग पर भी असर डाला है। चूंकि, आने वाले समय में कई चुनाव (Assembly Elections + Lok Sabha Elections) हैं, इस लिहाज से बीजेपी के लिए यह बड़ा मसला है। आइए, समझते हैं कि आखिरकार भाजपा के लिए जाट फैक्टर क्यों इतना मायने रखता और वह उसे इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती है:

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तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइलः iStock)

बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं। (फाइलः IANS)

अंग्रेजी अखबार 'दि इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक, भाजपा को इस बात का अहसास है कि वह हरियाणा में तो जाट फैक्टर को अनदेखा कर सकती है, मगर यूपी में उनके बीच उसके समर्थन के आधार का क्षरण पहले से ही महंगा पड़ रहा है। यादव फैक्टर को नकारने के लिए जाटों का इस्तेमाल करके बीजेपी ने राज्य में फायदा हासिल किया था।

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