Times Now Navbharat
live-tv
Premium

अरावली को क्यों कहा जाता है उत्तर भारत की 'नेचुरल शील्ड', अगर खत्म हुई तो क्या रेगिस्तान बन जाएगा दिल्ली-NCR?

ढाई अरब साल पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली पर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा ने जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर सेव द अरावली नाम से कैंपेन चलाया जा रहा है। हर कोई सुप्रीम कोर्ट के 100 मीटर वाले फैसले को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। लोगों की चिंता है कि अगर यह नई परिभाषा लागू हो गई और अरावली के जंगल कटे तो उत्तर भारत का क्या होगा?

Image
अरावली पर संकट के बादल। फोटो- टाइम्स नाउ नवभारत
Authored by: शिव शुक्ला
Updated Dec 21, 2025, 11:16 IST
Follow on Google News

मैं अरावली हूं...मैं ऊंचाई से नहीं, इतिहास से जाना जाता हूं। हजारों सालों से खड़ा रेगिस्तान को थामे हुए...मुझे पहचान की नहीं, संरक्षण की जरूरत है। मैं अरावली हूं...' इंस्टाग्राम से लेकर फेसबुक तक, इस समय कुछ ऐसी ही लाइनों और रील्स से सोशल मीडिया भरा पड़ा है। इसका कारण सिर्फ एक है और वह है अरावली। हजारों-लाखों सालों से उत्तर भारत की नेचुलर शील्ड बनकर खड़ी अरावली की पर्वत श्रंखलाएं। ये पर्वत श्रंखलाएं महज कुछ पहाड़ियों का समूह भर नहीं हैं, बल्कि यही वो ढ़ाल हैं जिसके कारण उत्तर भारत अभी तक रेगिस्तान नहीं बना है। ये रेगिस्तान को दिल्ली में आने से ही नहीं रोकती बल्कि गर्म और रेतीली हवाओं को भी यहां नहीं आने देतीं। अब इसी अरावली को लेकर लोगों में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद चिंता है। हर किसी का बस यही कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा लागू हो गई और अरावली के जंगल कटने लगे, तो उत्तर भारत का भविष्य क्या होगा? क्या दिल्ली-NCR और आसपास के इलाके रेगिस्तान जैसे हालात की ओर बढ़ जाएंगे? इन सवालों का जवाब तलाशने से पहले हमें जानना होगा कि अरावली का इतिहास क्या है, और उत्तर भारत के लिए यह क्यों जरूरी है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है।

अरावली का इतिहास जान लीजिए

अरावली पर्वत श्रृंखला लगभग ढाई अरब साल पुरानी बताई जाती है। दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली हिमालय से भी पुरानी है। इतिहासकारों का तो यहां तक कहना है कि जब दुनिया आज की तरह महाद्वीपों में नहीं बंटी थी तब भी अरावली अस्तित्व में थी। अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला है, जो पैलियोप्रोटेरोजोइक युग की है। पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला का निर्माण करोड़ों साल पहले टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से हुआ, जब भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराई, तो पृथ्वी की परत मुड़कर ऊपर उठ गई। जिससे यह दुनिया की सबसे पुरानी वलित (फोल्डेड) पर्वत श्रृंखलाओं में से एक बन गई। वर्तमान में यह लगभग 670 किमी (420 मील) दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैली हुई है।

अरावली कितने राज्यों में फैली है?

अरावली पर्वत श्रंखला दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात चक फैली हुई है। इसकी सबसे ऊंची चोटी राजस्थान के माउंट अबू में स्थित गुरु शिखर है, जिसकी उंचाई 1,722 मीटर (5,650 फीट) है। दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन जिस रायसीना हिल्स पर बना है, वह भी इसी पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है। इसका इतिहास बहुत स्वर्णिम रहा है। मध्यकालीन भारत में जब भारत पर मुगल शासन के दौरान यह महाराणा प्रताप जैसे वीरों की शरणस्थली भी बनी। इसके दोहन का काम अंग्रेजों के समय में बहुत तेजी से हुआ। उस समय बड़े पैमाने पर यहां जंगलों की कटाई हुई और खनिज संसाधनों को निकाला गया।

सबसे पहले बात सुप्रीम कोर्ट के फैसले की

अरावली के अस्तित्व को लेकर जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वो सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर को लिए गए एक फैसले से जुड़े हैं। बीते महीने के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने अरावली को लेकर केंद्र सरकार की समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया है। इन सिफारिशों के तहत केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाडियों को ही अरावली हिल्स में गिना जाएगा। अरावली क्षेत्र में होने के बाद भी इस ऊंचाई से नीचे की पहाडियों को इसमें नहीं गिना जाएगा। अदालत ने कहा कि सिर्फ इस आधार पर किसी भी भूमि को वन भूमि नहीं माना जा सकता कि वह अरावली क्षेत्र में है। जमीन की स्थिति के आधार पर उसका फैसला होगा न कि ऊंचाई के आधार पर। कोर्ट का मकसद प्रशासनिक अस्पष्टता को कम करना बताया जा रहा है, ताकि यह तय हो सके कि किस जमीन पर कौन से नियम लागू होंगे। हालांकि अदालत ने अपने फैसले में यह भी साफ किया है कि अरावली क्षेत्र की कोई भूमि या हिस्सा अगर पहले से ही वन भूमि घोषित है या फिर उसे किसी पर्यावरणीय कानून के तहत संरंक्षण प्राप्त है तो उस पर उसका फैसला लागू नहीं हेगा।

अरावली की पहाडियां।

अरावली की पहाडियां।

यह विवाद क्यों हैं?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला प्रत्यक्ष तौर पर भले ही जंगलों की अंधाधुंध कटाई करने की अनुमति नहीं देता है, लेकिन अगर यह परिभाषा लागू हो गई तो जमीन की स्थिति पर फैसला लेने के लिए राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन को ज्यादा ताकत मिल जाएगी। मतलब यह कि अब स्थानीय और राज्य सरकार जंगल को गैर वनभूमि बता सकेगा। यही वजह है कि पर्यावरणविद और सामाजिक संगठनों का यह कहना है कि यह फैसला अरावली को बचाने के बजाय कमजोर कर सकता है।

राजस्थान की 90 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर ऊंचाई से कम

सरकारी और तकनीकी अध्ययनों के मुताबिक राजस्थान में मौजूद अरावली की करीब 90 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर ऊंचाई की तय शर्त पर खरी नहीं उतरतीं। इसका सीधा अर्थ यह है कि नई व्याख्या लागू होने की स्थिति में राज्य की केवल 8 से 10 प्रतिशत पहाड़ियां ही कानूनी रूप से ‘अरावली’ के दायरे में आएंगी, जबकि बाकी लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्र संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकते हैं। ऐसे में अरावली के आसपास विकास परियोजनाएं बढ़ सकती हैं। जिससे जंगलों और खुले क्षेत्रों पर दबाव बढ़ेगा।

अरावली उत्तर भारत के लिए क्यों जरूरी है?

अरावली को उत्तर भारत की ‘नेचुरल शील्ड’ कहा जाता है। इसकी कई वजहें हैं। राजस्थान का थार रेगिस्तान प्राकृतिक रूप से उत्तर-पूर्व दिशा में फैलने की कोशिश करता है, यानी दिल्ली और हरियाणा की ओर। ऐसे में अरावली ही इस रास्ते में ढ़ाल बनकर खड़ी है। इसके अलावा, अरावली के जंगल राजस्थान की ओर आने वाली गर्म और धूलभरी हवाओं को आने से भी रोकती है। अरावली के जंगल धूल को रोकते हैं। पेड़-पौधे डस्ट फिल्टर का काम करते हैं। अगर यह पर्वत श्रृंखलाएं कमजोर होंगी और यहां व्यापक पैमाने पर जंगलों का खनन होगा तो इन हवाएं के तेजी से उत्तर भारत में आने के लिए दरवाजा खुल जाएगा। जिससे दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण के साथ ही मरुस्थलीकरण की समस्या और विकराल हो जाएगी।

अगर अरावली को खत्म किया गया तो जलसंकट भी बढ़ेगा

अरावली की पर्वत श्रंखलाएं केवल रेतीली हवाओं को ही नहीं रोकतीं, बल्कि यह भूगर्भ के जल को भी बढ़ाती हैं। अरावली की पहाडियां बारिश के पानी को रोककर जमीन में रिसने देती है, जिससे भूजल रिचार्ज होता है। बता दें कि दिल्ली एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान में पहले ही पानी को लेकर बड़ा संकट है। इसकी एक बड़ी वजह अरावली का लगातार कमजोर होना भी माना जाता है। ऐसे में अगर यहां व्यापक रूप से पहाडियों को नष्ट किया गया तो यह संकट और गहरा हो जाएगा।

शुरू हुआ 'सेव द अरावली' अभियान

पर्यावरणविदों की इसी चिंता के बाद 11 दिसंबर को देश भर में 'सेव अरावली' मुहिम शुरू की गई। इस मुहिम में पर्यावरणविदों के साथ ही आम जनमानस और विपक्ष के नेता भी शामिल हैं। इसके तहत सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों जैसे ट्वीटर, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ऑनलाइन कैंपेन चलाए जा रहे हैं। वहीं, जमीन पर भी रैली आदि निकाली जा रही हैं। विपक्ष के नेता भी इसमें सहभाग कर रहे हैं। राजस्थान में इसकी कमान पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने संभाल रखी है। चूंकि इस पर्वतश्रंखला का अधिकांश हिस्सा राजस्थान में आता है, ऐसे में यह राजस्थान के लिए बड़ा संकट है। पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि अगर इन पहाड़ियां को नुकसान पहुंचाया गया तो राजस्थान के अधिकांश जिलों में भूजल का स्तर और नीचे जाएगा। जिससे सूखा बढ़ेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि विकास बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना होना चाहिए। इसके लिए स्पष्ट और व्यापक परिभाषा बनाए जाने की जरूरत है। उनका कहना है कि अगर अरावली खत्म हो गई, तो विकास के फायदे भी लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगे।

End of Article