India Azerbaijan relation: वैश्विक मोर्चों पर इन दिनों भू-राजनीति को प्रभावित करने वाली कई घटनाएं हुईं। इनमें ताजा पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया के बीच हुआ रक्षा समझौता और विदेश मंत्री एस जयशंकर का अजरबैजान दौरा है। विदेश मंत्री जयशंकर के बाकू दौरे ने सभी का ध्यान खींचा है। यह सामान्य दौरा नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि अजरबैजान की पाकिस्तान और तुर्किये के साथ करीबी जगजाहिर है। भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' की आलोचना करने वाले कुछ चुनिंदा देशों में यह देश भी शामिल रहा। यही नहीं, अजरबैजान के शत्रु देश अर्मेनिया को भारत हथियार बेचता आया है और येरेवान एवं नई दिल्ली के बीच प्रगाढ़ संबंध हैं। तो ऐसे में सवाल है कि भारत क्या अर्मेनिया के साथ-साथ अजरबैजान के साथ अपना द्विपक्षीय संबंध सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अगर ऐसा है तो भारत भी जिओ-पॉलिटिक्स के उसी सिद्धांत पर आगे बढ़ रहा है कि भू-राजनीति की दुनिया में कोई देश न तो स्थायी मित्र होता है और न स्थायी दुश्मन, स्थायी बस राष्ट्रीय हित होते हैं। जयशंकर का यह दौरा भी भारतीय हितों वाले एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए हो सकता है।
भारत अजरबैजान के लिए अहम बाजार
भारत और अजरबैजान के बीच आपसी रिश्ते की अगर बात करें तो दोनों देश कई क्षेत्रों में एक दूसरे का सहयोग करते हैं और इनमें व्यापारिक संबंध भी हैं। भारत अजरबैजान के कच्चे तेल के प्रमुख वैश्विक खरीदारों में शामिल है। भारत की कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (OVL) की अजरबैजान के विशाल अजेरी-चिराग-गुनाशली (ACG) तेल क्षेत्र में 2.925 प्रतिशत और बाकू-त्बिलिसी-जेहान (BTC) पाइपलाइन में 3.097 प्रतिशत हिस्सेदारी है। भारत के साथ ऊर्जा सहयोग अजरबैजान के लिए महत्वपूर्ण राजस्व का स्रोत है, जिसे बाकू सुरक्षित बनाए रखना चाहता है।
पर्यटन और अर्थव्यवस्था: भारतीय पर्यटकों का महत्व
भारत अजरबैजान में विदेशी पर्यटकों के प्रमुख स्रोतों में शामिल हो गया है। भारतीय पर्यटक वहां के पर्यटन उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। 2025 में दोनों देशों के बीच तनाव के दौरान भारतीय पर्यटकों की बुकिंग में आई गिरावट से अजरबैजान को आर्थिक नुकसान की आशंका का एहसास हुआ। भारत और अजरबैजान के बीच हवाई संपर्क भी पर्यटन को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाता है। दिल्ली और मुंबई से बाकू के बीच प्रति सप्ताह 21 से अधिक सीधी उड़ानें संचालित होने का दावा किया गया है, जो दोनों देशों के बीच यात्रियों की आवाजाही को सुगम बनाती हैं।
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परिवहन और कनेक्टिविटी: INSTC की अहम भूमिका
भारत और अजरबैजान दोनों लगभग 7,200 किलोमीटर लंबे अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। यह गलियारा दक्षिण एशिया को ईरान, अजरबैजान, रूस और यूरोप के बाजारों से जोड़ने की क्षमता रखता है। अजरबैजान की भौगोलिक स्थिति उसे यूरेशिया में परिवहन और माल ढुलाई के लिए रणनीतिक महत्व प्रदान करती है। भारत के साथ सहयोग बढ़ाकर बाकू क्षेत्रीय लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है, जबकि भारत को वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों और बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है।
आर्मेनिया के साथ भारत के संबंधों का संतुलन
भारत ने अजरबैजान के प्रतिद्वंद्वी आर्मेनिया के साथ रक्षा और कूटनीतिक सहयोग बढ़ाया है। इसमें पिनाका रॉकेट प्रणाली और टैंक रोधी हथियारों जैसे रक्षा उपकरणों की आपूर्ति शामिल है। इसे लेकर अजरबैजान ने चिंता जताई है। नई दिल्ली के साथ संबंध बेहतर करके बाकू दक्षिण काकेशस में भारत की भूमिका को अधिक व्यावहारिक ढंग से संतुलित करने की कोशिश कर सकता है। इससे उसे भारत के साथ मतभेदों को कम करने और क्षेत्रीय हितों की रक्षा करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, भारत का आर्मेनिया के साथ सहयोग और अजरबैजान के साथ संबंध सुधारने की कोशिशें एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं।
ग्लोबल साउथ में सहयोग: भारत के बड़े बाजार पर नजर
भारत और अजरबैजान दोनों स्वयं को ग्लोबल साउथ के ऐसे देशों के रूप में देखते हैं, जो अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं। अजरबैजान के लिए भारत केवल एक ऊर्जा खरीदार नहीं, बल्कि तकनीक, फार्मास्यूटिकल उत्पादों और आर्थिक सहयोग का एक बड़ा संभावित साझेदार भी है। लगभग 140 करोड़ की आबादी वाले भारतीय बाजार तक पहुंच बाकू के लिए नए व्यापारिक अवसर पैदा कर सकती है। इससे अजरबैजान को अपने पारंपरिक क्षेत्रीय साझेदारों से आगे बढ़कर आर्थिक संबंधों में विविधता लाने का अवसर मिलेगा।
लचीली कूटनीति के रास्ते पर भारत!
अजरबैजान का पाकिस्तान और तुर्किये से रिश्ता भले गहरा हो, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था को भारत से जो मिलता है, वह इन दोनों से नहीं मिल सकता। दूसरी, भारत की आर्थिक ताकत अब कूटनीतिक ताकत में बदल रही है। जिस देश ने कभी आलोचना की, वही आज संवाद की मेज पर लौटा है, क्योंकि भारत के साथ तनाव की कीमत उसे महसूस हुई। तीसरी, जयशंकर की यात्रा भारतीय कूटनीति की उस शैली को दिखाती है जिसमें सख्त संदेश के बाद दरवाजे भी खुले रखे जाते हैं।
दिल से ज्यादा दिमाग का फैसला
अगर यह नरमी टिकती है तो ऊर्जा, पर्यटन, कनेक्टिविटी और निवेश चारों में सहयोग बढ़ सकता है। लेकिन चुनौतियां बनी रहेंगी। पाकिस्तान और तुर्किये के साथ अजरबैजान की रणनीतिक नजदीकी रातोंरात खत्म नहीं होगी, और आर्मेनिया के साथ भारत के रिश्ते भी अपनी जगह रहेंगे। असली परीक्षा यह होगी कि क्या बाकू भारत के संवेदनशील मुद्दों पर भविष्य में संयम रखता है, और क्या भारत इस रिश्ते को पूरी तरह भरोसे के स्तर तक ले जाने को तैयार है। फिलहाल इतना साफ है कि यह मेल-मिलाप दिल से ज्यादा दिमाग का फैसला है। तेल, पर्यटन, गलियारे और बाजार, ये चारों वजहें अजरबैजान को भारत की ओर खींच रही हैं। और कूटनीति में ऐसे रिश्ते अक्सर सबसे टिकाऊ साबित होते हैं, जो हितों की जमीन पर खड़े हों।
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बायरामोव के साथ जयशंकर की हुई बैठक
जयशंकर की शुक्रवार को अजरबैजान के अपने समकक्ष जेयहुन बायरामोव के साथ बैठक हुई। इस बैठक को उन्होंने 'बेहद सार्थक’बताया। इस दौरान दोनों नेताओं ने व्यापार एवं निवेश, ऊर्जा, पर्यटन और संपर्क सुविधा के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया। जयशंकर ने एक प्रेस बयान में कहा कि वार्ता 'बहुत सार्थक’रही और इससे दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाने की दिशा तय करने में मदद मिली है। उन्होंने कहा, 'हमने आर्थिक सहयोग पर चर्चा की, जिसमें व्यापार, निवेश और ऊर्जा शामिल हैं। ये हमारे द्विपक्षीय संबंधों के प्रमुख आधार हैं... हमारा मानना है कि द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को और बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं।’ उन्होंने कहा, 'हमने संपर्क के मुद्दे पर चर्चा की, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसका बहुत महत्व है।’उन्होंने बताया कि दोनों देश अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) में अधिक निकटता से समन्वय करने पर सहमत हुए।
जरबैजान के विदेश मंत्री को भारत आने का निमंत्रण
विदेश मंत्री ने अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच अगस्त में हुए शांति समझौते का भी स्वागत किया और उम्मीद जताई कि इससे क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित होगी। उन्होंने कहा, 'भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए किया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में हमारी चर्चाओं में पश्चिम एशिया, यूरेशिया और यूरोप से जुड़े मुद्दे भी शामिल रहे।’जयशंकर ने कहा, 'शांति, प्रगति और समृद्धि को बढ़ावा देने में हमारा साझा हित है।’ उन्होंने कहा कि आतंकवाद, संघर्ष और अस्थिरता जैसी चुनौतियां 'हमारी साझा दुश्मन हैं।’उन्होंने कहा, 'हमने अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संगठनों में सुधार करने और उनका विस्तार करने के मुद्दे पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया, ताकि उन्हें अधिक समकालीन और प्रासंगिक बनाया जा सके।’ उन्होंने अजरबैजान के विदेश मंत्री को भारत आने का निमंत्रण भी दिया।
