पहली बार आम आदमी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है, आप गठन के बाद से केजरीवाल लगातार कहीं जीत रहे थे तो कहीं हार कर भी अपना जनाधार बढ़ा रहे थे, लेकिन ये पहली बार है, जब उन्हें, उस जगह करारी हार मिली है, जहां से आप ने राजनीति की शुरुआत की थी। केजरीवाल के हारने के कई कारण है, जिसमें नि:संदेह कांग्रेस भी है, जिसके साथ केजरीवाल ने चुनावी मैदान अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था, लेकिन इसके अलावा कई ऐसे कारण है जिससे केजरीवाल हैं, जिसमें सबसे ज्यादा उनका सॉफ्ट हिंदुत्व वाला प्लान है।
अपनी सीट से भी हार गए हैं केजरीवाल
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इस बार केजरीवाल ने पकड़ी अलग राह
अभी तक का चुनाव केजरीवाल अपनी फ्री की योजनाओं, स्वास्थ्य और बेहतर शिक्षा के नाम लड़ते रहे हैं, इस बार वो बीजेपी के पिच पर खेलने उतरे और चुनाव से पहले साफ तौर से हिंदुत्व की राह पर चलते दिखे, इससे उनका परंपरागत मुस्लिम वोट छिटका और बीजेपी को फायदा हो गया। क्योंकि हिंदुत्व के मुद्दे पर शायद ही कोई बीजेपी को छोड़ आप को वोट देता, जबकि मुस्लिमों को ऐसा लगा कि उनके साथ केजरीवाल धोखा कर रहे हैं, इसलिए उनका वोट बंट गया।
सॉफ्ट हिंदुत्व से छिटका मुस्लिम वोट
दिल्ली चुनाव के दौरान भाजपा तो अपने हिंदुत्व वाली छवि के साथ ही मैदान में थी। लेकिन, आम आदमी पार्टी भाजपा की पिच पर खेलने के लिए उतर आई और उसके 'सॉफ्ट हिंदुत्व' वाली छवि बनाने की कोशिश ने उसे झटका दिया। आम आदमी पार्टी के लिए मुस्लिम वोट बैंक जो उसकी 'बपौती' मानी जाती थी, वह उससे दूर जाती नजर आई। जिसके परिणामस्वरूप आम आदमी पार्टी को दिल्ली में यह दिन देखना पड़ा। दिल्ली चुनाव में जहां 10 प्रतिशत से ज्यादा वोट का नुकसान आम आदमी पार्टी को हुआ, वहीं कांग्रेस के वोट बैंक में इजाफा हुआ और यह वोट बैंक कभी आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से छीना था। वहीं, पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा के वोट बैंक में भी 10 प्रतिशत से ज्यादा का इजाफा हुआ है। इससे साफ पता चलने लगा कि मुसलमान वोटरों का आम आदमी पार्टी से मोहभंग हो गया और यह केवल और केवल अरविंद केजरीवाल के सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ मुड़ने की वजह से हुआ।
केजरीवाल का सॉफ्ट हिंदुत्व
आम आदमी पार्टी सॉफ्ट हिंदुत्व पर दांव खेलती नजर आई, पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सनातन सेवा समिति का गठन किया। पुजारी और ग्रंथियों को पुजारी-ग्रंथी सम्मान योजना के तहत सरकार बनने के बाद 18 हजार रुपए हर महीने देने का ऐलान कर दिया। वहीं, बुज़ुर्गों को अयोध्या, रामेश्वरम, वैष्णो देवी, द्वारकाधीश, अमृतसर जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों की मुफ्त यात्रा भी इसी सॉफ्ट हिंदुत्व का हिस्सा था। 2024 में जब अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम था, इस दिन आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में रामलीला का मंचन किया। अरविंद केजरीवाल अपने परिवार के साथ अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन करने भी गए। वहीं, अरविंद केजरीवाल सहित उनकी पार्टी के तमाम नेताओं द्वारा कई मंचों से हनुमान चालीसा का पाठ कहीं ना कहीं उनसे मुसलमानों को दूर करता चला गया।
केजरीवाल और मनीष सिसोदिया आप की 'सनातन सेवा समिति' के सदस्यों के साथ
किन सीटों पर बिगड़ा खेल
दिल्ली में ओखला, सीलमपुर, मुस्तफाबाद, मटिया महल, बल्लीमारान और सीलमपुर जैसे सीट हैं, जहां से मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतते आए हैं। इसके अलावा सीमापुरी, चांदनी चौक, सदर बाजार, बाबरपुर, गांधी नगर, किराड़ी, जंगपुरा और करावल नगर ऐसी सीटें हैं, जहां मुस्लिम मतदाता जीत-हार तय करने की ताकत रखता है। इन सभी सीटों में कुछ सीटें जैसे सीलमपुर, मटिया महल, बल्लीमारान और सीलमपुर से 'आप' के मुस्लिम उम्मीदवारों को जीतने में कामयाबी तो मिली, लेकिन इन सीटों पर उन्हें कड़ी टक्कर मिली।
कहीं कांग्रेस तो कहीं AIMIM ने खींचा वोट
मुस्लिम बाहुल्य सीटों में से दो सीटों पर तो असदुद्दीन औवेसी की एआईएमआईएम के उम्मीदवारों ने उसे कड़ी टक्कर दी तो वहीं कई सीटों पर 'आप' के उम्मीदवारों को कांग्रेस से टक्कर मिली, यानी मुसलमान वोटरों का 'आप' और अरविंद केजरीवाल से मोहभंग हो गया है। साल 2019 में सीएए को लेकर मुसलमानों में गुस्सा था। मुसलमान इस कानून के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे थे। दिल्ली में इस दौरान दंगे हुए, लेकिन, केजरीवाल और उनकी सरकार ने तब चुप्पी साध ली।
केजरीवाल से मुस्लिम क्यों हुए नाराज
दिल्ली दंगों में मौजूदा 'आप' पार्षद ताहिर हुसैन और कई अन्य पर दंगा भड़काने के आरोप लगे, जिसके बाद केजरीवाल ताहिर हुसैन के साथ कई अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग करते नजर आए। कोरोना काल में जब तब्लीगी जमात के खिलाफ बयानबाजी हुई तो केजरीवाल ने परोक्ष रूप से कहा था कि तब्लीगी जमात के लोग कोरोना फैला रहे हैं। गुजरात दंगों की पीड़िता बिलकिस बानो के मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था। बिलकिस बानो मामले में आरोपियों की रिहाई पर लगभग सभी विपक्षी दलों ने भाजपा की आलोचना की और केजरीवाल इस पर बोलने से बचते नजर आए। मनीष सिसोदिया ने साफ कर दिया कि बिलकिस बानो मामले से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
ऐसे फंसे केजरीवाल
दरअसल, केजरीवाल ये समझ गए कि सिर्फ मुसलमानों के सहारे सत्ता हासिल नहीं की जा सकती। ऐसे में मुस्लिम बहुल सीटों को भी जीतने के लिए उन्हें हिंदू वोटों की जरूरत होगी। अगर इन सीटों पर कांग्रेस थोड़ी मजबूत होती है तो उन्हें मुश्किल होगी। ऐसे में उन्होंने सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ रूख किया और इसी का नुकसान हुआ कि उनकी पार्टी से मुसलमान दूर होते चले गए।
