What is Peace Bond: लेफ्ट के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने 'पीस बॉन्ड' भरने से इंकार किया है। इस बॉन्ड को उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। इसके बाद से यह 'पीस बॉन्ड' शब्द चर्चा में है। दरअसल, सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने बोरा को बीते 16 अक्टूबर को हिरासत में लिया था। वह CJP के 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में शामिल होने जा रही थीं। हालांकि, उन्हें 17 अक्टूबर को रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद बोरा को दिल्ली पुलिस का एक नोटिस मिला, जिसमें शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया था।
क्या होता है पीस बॉन्ड
पीस बॉन्ड यानी शांति बनाए रखने का मुचलका। यह एक लिखित वचन है, जिसमें व्यक्ति तय अवधि तक शांति भंग न करने का भरोसा देता है और बॉन्ड की राशि के साथ अक्सर एक जमानतदार भी देता है। यह कोई सजा नहीं, बल्कि एक निवारक कार्रवाई है। इसका मकसद अपराध होने से पहले ही उसे रोकना है। इसका प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 में है, जो पहले CrPC की धारा 107 थी। इसके तहत अगर किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचना मिले कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ सकता है, तो वह उससे पूछ सकता है कि उससे एक साल तक के लिए शांति बनाए रखने का बॉन्ड क्यों न लिया जाए।
प्रक्रिया के भी कुछ चरण हैं। धारा 130 के मुताबिक मजिस्ट्रेट को लिखित आदेश में मिली सूचना का सार, बॉन्ड की राशि, उसकी अवधि और जमानतदारों की संख्या बतानी होती है। इसके बाद धारा 135 के तहत जांच होती है। जांच के दौरान मजिस्ट्रेट चाहे तो अंतरिम बॉन्ड भरवा सकता है, और न भरने पर जांच पूरी होने तक व्यक्ति को हिरासत में भी रख सकता है। जांच के बाद धारा 136 के तहत अंतिम आदेश होता है।
नेहा बोरा ने इसे क्यों दी चुनौती?
नेहा को दिया गया नोटिस BNSS की धारा 126 और 130 के साथ धारा 135(3) के तहत जारी हुआ था। इसमें उन्हें 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने पेश होकर 10,000 रुपये के निजी बॉन्ड और एक जमानतदार के साथ शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरने को कहा गया। यह कार्रवाई चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में हुई। नेहा का पक्ष है कि यह प्रावधान शांतिपूर्ण असहमति को दबाने का हथियार बन गया है। उनकी याचिका में इसे शांतिपूर्ण असहमति दबाने के लिए निवारक शक्तियों का 'दिखावटी इस्तेमाल' बताया गया है। उन पर प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी से उपद्रव करने और अनधिकृत प्रदर्शन के लिए उकसाने के आरोप हैं। याचिका के मुताबिक ये आरोप शांति भंग की संभावना साबित ही नहीं करते।
neha bora
पीस बॉन्ड भर कर रिहा हुए दिपके
उनका यह भी कहना है कि नोटिस में ऐसी कोई सामग्री नहीं दी गई जिससे शांति भंग होने की संभावना सिद्ध हो। न कोई खास घटना या अवधि बताई गई है, और न कोई पुरानी घटना। कानूनी तौर पर यह अहम बिंदु है, क्योंकि धारा 130 में मजिस्ट्रेट को सूचना का सार बताना अनिवार्य है। नेहा का आरोप है कि यह कार्यवाही अभिव्यक्ति, सभा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। इस मामले में एक फर्क भी दिखता है। CJP संस्थापक अभिजीत दिपके को भी हिरासत में लिया गया था, लेकिन उन्होंने SEM के सामने पेश होकर पीस बॉन्ड भर दिया और रिहा हुए। नेहा के वकीलों ने साफ किया कि वे SEM को बताएंगे कि नेहा बॉन्ड पर दस्तखत नहीं करेंगी। सुनवाई की स्थिति यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट में नेहा के वकील के अनुरोध पर सुनवाई टल गई। अदालत ने मामले को गुरुवार सुबह के लिए सूचीबद्ध किया है।
उल्लंघन पर कितनी मिलती है सजा
यहां दो स्थितियां अलग हैं: बॉन्ड भरने से इनकार करना और बॉन्ड भरने के बाद उसे तोड़ना। पहली स्थिति में, यानी जब कोई जांच के बाद आदेश होने पर भी बॉन्ड न भरे, तो धारा 141 के तहत उसे जेल भेजा जा सकता है। शांति बनाए रखने की सुरक्षा न देने पर होने वाली यह कैद 'साधारण' होती है, यानी सश्रम नहीं। यह कैद बॉन्ड की अवधि तक ही हो सकती है, जो अधिकतम एक साल है। जांच के दौरान अंतरिम बॉन्ड न भरने पर भी, जैसा ऊपर बताया गया, जांच पूरी होने तक हिरासत संभव है।
... बॉन्ड की रकम जब्त हो सकती है
दूसरी स्थिति में, बॉन्ड भरने के बाद उसे तोड़ने पर कार्रवाई और कड़ी हो सकती है। अगर मजिस्ट्रेट के सामने साबित हो जाए कि व्यक्ति ने बॉन्ड तोड़ा है, तो वह कारण दर्ज करके उसकी गिरफ्तारी और बॉन्ड की अवधि खत्म होने तक जेल में रखने का आदेश दे सकता है। यह आदेश किसी अन्य सजा या बॉन्ड राशि की जब्ती के अतिरिक्त होता है। यानी बॉन्ड की रकम जब्त हो सकती है, और अगर उल्लंघन में कोई अलग अपराध भी बनता है तो उस पर अलग मुकदमा चल सकता है।
कानून-व्यवस्था के लिए ऐसी कार्रवाई जरूरी-पुलिस
यह मामला एक बड़े सवाल से जुड़ गया है कि क्या शांति भंग की 'आशंका' के नाम पर प्रदर्शनकारियों पर निवारक कार्रवाई की जा सकती है, और उसकी सीमा क्या है। पुलिस का तर्क है कि कानून-व्यवस्था के लिए ऐसी कार्रवाई जरूरी है। नेहा का तर्क है कि बिना ठोस आधार के इसका इस्तेमाल लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश है। अब हाईकोर्ट का रुख तय करेगा कि ऐसे नोटिसों के लिए अदालत कितना ठोस आधार जरूरी मानती है।
rahul gandhi
'पुलिस का नोटिस अस्पष्ट, तथ्यों के लिहाज से गलत'
बोरा निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ हालिया विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे रही हैं। बोरा की याचिका में नोटिस खारिज किए जाने और यह निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया गया है कि पुलिस आइसा अध्यक्ष के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न करे। बोरा से कहा गया है कि वह कारण बताएं कि क्यों न उनसे 'जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए’ एक जमानतदार के साथ 10,000 रुपए का व्यक्तिगत मुचलका भरवाया जाए। वकील अभिक चिमनी के माध्यम से दायर अपनी याचिका में, बोरा ने कहा कि पुलिस का नोटिस अस्पष्ट है, तथ्यों के लिहाज से गलत है और इसमें शांति भंग होने की 'संभावना’ को साबित करने के लिए कोई सामग्री या जानकारी नहीं है।
बोरा की याचिका में क्या दी गई है दलील
याचिका में बताया गया है कि एसईएम के समक्ष चल रही कार्यवाही, 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में कथित तौर पर नारेबाजी की घटनाओं, बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार विरोध-प्रदर्शनों, और 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोगों को उकसाने के आरोपों पर आधारित है। याचिका में कहा गया है, 'यह नोटिस प्रथम दृष्टया एक गलत तथ्य पर आधारित है-कि याचिकाकर्ता ने लोगों को 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था। याचिकाकर्ता का आह्वान और कथित घटना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। याचिकाकर्ता ने 16 अक्टूबर 2026 को शाम पांच बजे मंडी हाउस में एक शांतिपूर्ण सभा का आह्वान किया था, और यह रिकॉर्ड में दर्ज है कि उन्हें मंडी हाउस से ही हिरासत में लिया गया था।’
