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क्या है Core 5 जिसकी अमेरिका हो रही खास चर्चा, क्या ट्रंप चलेंगे नई चाल, नए ग्रुप में भारत भी होगा शामिल?

प्रस्तावित कोर 5 को एक संभावित उच्च-स्तरीय मंच बताया जा रहा है जो दुनिया के पांच सबसे प्रभावशाली देशों - संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, भारत, जापान और रूस को एक साथ लाएगा। ये सभी पांचों देश न सिर्फ वैश्विक राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, बल्कि दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में भी शामिल हैं।

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क्या है Core5?
Authored by: अमित कुमार मंडल
Updated Dec 14, 2025, 15:17 IST
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पिछले कई हफ्तों से वाशिंगटन में 'कोर 5' (Core 5) पर चर्चा चल रही है। बताया जा रहा है कि अमेरिका, चीन, रूस, भारत और जापान शामिल होंगे। यह विचार अमेरिकी डिफेंस आउटलेट डिफेंस वन और पॉलिटिको की विस्तृत रिपोर्ट के जरिए सामने आया। हालांकि व्हाइट हाउस का कहना है कि ऐसा कोई गोपनीय दस्तावेज मौजूद नहीं है, लेकिन इसेक तथ्य और मौजूदा जियो पॉलिटिकल हालात कुछ और ही इशारा कर रहे हैं। खबर है कि अमेरिका जी7 जैसे बड़े संगठन को एक नए खास मंच से बदलने पर विचार कर रहा है। एक ऐसा मंच जिसमें यूरोप को बाहर रखा जाएगा। क्या है कोर 5, क्या भारत में भी हो सकता है इसमें शामिल, रिपोर्ट में कितना है दम, इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

'कोर 5' क्या है?

प्रस्तावित कोर 5 को एक संभावित उच्च-स्तरीय मंच बताया जा रहा है जो दुनिया के पांच सबसे प्रभावशाली देशों - संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, भारत, जापान और रूस को एक साथ लाएगा। ये सभी पांचों देश न सिर्फ वैश्विक राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, बल्कि दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में भी शामिल हैं, जिनमें से हर एक की आबादी 100 मिलियन यानी 10 करोड़ से अधिक है (पांचों देश की कुल जनसंख्या लगभग 3.5 बिलियन यानी 3.5 अरब)। भारत के लिहाज से अहम सवाल है कि बीजिंग और मॉस्को जैसे देशों को शामिल करने वाले इस रणनीतिक क्लब में नई दिल्ली की क्या भूमिका होगी।

कहां से आया 'कोर 5' आइडिया?

डिफेंस वन ने रिपोर्ट किया कि यह विचार ट्रंप प्रशासन के नेशनल स्ट्रैटेजिक सर्विस (NSS) के एक लंबे, अप्रकाशित संस्करण में सामने आया था। इस अवधारणा के अनुसार, पांचों सरकारों के बीच नियमित बैठकें होंगी, जिनमें अहम मुद्दों पर आधारित शिखर सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे। मसौदे में जिन क्षेत्रों की पहचान की गई है, उनमें से एक पश्चिम एशिया में सुरक्षा संबंधी घटनाक्रम हैं, विशेष रूप से इजराइल और सऊदी अरब के बीच राजनयिक प्रयासों को आगे बढ़ाने की संभावना पर विचार होगा। इस सी5 संरचना को जी7 के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जी-7 में अमेरिका, कनाडा, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और इटली शामिल हैं। साफ तौर पर इसमें यूरोपीय संघ की अधिक भागीदारी है। ट्रंप ने अतीत में जी-7 के प्रति सार्वजनिक रूप से असंतोष जताया है, यहां तक कि यह सुझाव भी दिया है कि अन्य वैश्विक शक्तियों को भी इस समूह में शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, रूस या चीन के विस्तारित जी-7 में शामिल होने की चर्चा उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान कई बार सामने आई है।

C5 को क्यों मिल रही तरजीह?

C5 का विचार ट्रंप की विदेश नीति से परिचित कई विश्लेषकों को प्रभावित कर रहा है। कई पूर्व अधिकारियों का कहना है कि यह प्रस्ताव ट्रंप की जानी-मानी कूटनीतिक सूझबूझ से पूरी तरह मेल खाता है। पॉलिटिको ने रिपोर्ट में बताया कि ट्रंप के कुछ शुरुआती फैसलों और प्रतिनिधिमंडलों से यह धारणा पुष्ट होती है कि वे प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के साथ सीधे तौर पर बातचीत करने में सहज हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने चीन को एनवीडिया के H200 चिप्स की बिक्री को मंजूरी दी - यह कदम रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में भी बीजिंग के साथ उच्च स्तरीय तकनीकी लेनदेन के प्रति उनकी खुलेपन का संकेत देता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में यूरोपीय मामलों के पूर्व निदेशक टॉरे टॉसिग ने पॉलिटिको को बताया था कि यह उस दृष्टिकोण से मेल खाता है जिस तरह से हम राष्ट्रपति ट्रंप को दुनिया को देखते हुए जानते हैं।

C5 में भारत का क्या महत्व होगा?

प्रस्तावित C5 संरचना में भारत का समावेश दक्षिण एशिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। भारत न सिर्फ एक उभरती हुई वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति है, बल्कि हिंद-प्रशांत रणनीतिक गणनाओं में भी इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। अमेरिका, चीन, जापान और रूस के साथ एक मंच पर भारत का शामिल होना 21वीं सदी की भू-राजनीति में इसके महत्व की मान्यता को दर्शाता है। भारत की जनसंख्या और आर्थिक शक्ति को देखते हुए, इसकी भागीदारी कई कारणों से तर्कसंगत है। भारत का विशाल जनसांख्यिकीय आकार और बढ़ता आर्थिक प्रभाव इसे किसी भी वैश्विक नेतृत्व संरचना में दीर्घकालिक आधार प्रदान करता है।

भारत प्रमुख समुद्री और महाद्वीपीय स्थितियों के केंद्र में स्थित है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र को पश्चिम एशिया और मध्य एशिया से जोड़ता है। जापान जैसे सहयोगी देशों के विपरीत, भारत औपचारिक रूप से किसी भी गुट से बंधा नहीं है। यह इसे एक साथ कई शक्तियों के साथ जुड़ने की स्वतंत्रता देता है। यह एक ऐसी खासियत है जो एक काल्पनिक C5 में जगह बनने के लिए सटीक होगा। हालांकि, चीन और अमेरिका जैसे देशों वाले समूह में भारत की मौजूदगी अपनी चुनौतियां भी लाएगी, विशेष रूप से बीजिंग के साथ इसके सीमा तनाव और वाशिंगटन के साथ इसकी बढ़ती रणनीतिक साझेदारी को देखते हुए भारत के लिए हालात चुनौतीपूर्ण होंगे।

क्या यूरोपीय संघ पर निशाना?

मसौदा राष्ट्रीय सुरक्षा नोटिस (एनएसएस) का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें कुछ यूरोपीय देशों को यूरोपीय संघ से अलग होने की रणनीति का समर्थन किया गया है। डिफेंस वन ने रिपोर्ट किया कि इस दस्तावेज में ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और पोलैंड को यूरोपीय संघ से अलग होने के संभावित देशों के रूप में पहचाना गया है। इस प्रस्ताव को "यूरोप को फिर से महान बनाने" की व्यापक कोशिश के हिस्से के रूप में पेश किया गया है, जो ट्रंप की व्यापक बयानबाजी शैली से मेल खाता है। मसौदे में वाशिंगटन को यूरोप में संप्रभुता, राष्ट्रीय पहचान और पारंपरिक सामाजिक ढांचों की वापसी की वकालत करने वाले राजनीतिक समूहों और सांस्कृतिक आवाजों को बढ़ावा देने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका को उन दलों, आंदोलनों और बौद्धिक एवं सांस्कृतिक हस्तियों का समर्थन करना चाहिए जो संप्रभुता और पारंपरिक यूरोपीय जीवन शैली के संरक्षण की मांग करते हैं, साथ ही अमेरिकी समर्थक बने रहना चाहिए। हालांकि, इस दस्तावेज के अस्तित्व की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, और व्हाइट हाउस ने एनएसएस के किसी भी गोपनीय या वैकल्पिक संस्करण के दावों को दृढ़ता से खारिज कर दिया है।

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