नए आपराधिक कानूनों में छह बड़े और अहम फेरबदल किए गए हैं। इनमें मॉब लिंचिंग और घृणा या नफरत फैलाने वाले क्राइम के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है। यही नहीं, आर्थिक सुरक्षा को संकट में डालना भी आतंकी गतिविधियों में गिना जाएगा। आइए, जानते हैं कि कानूनों में कौन से बदलाव हुए हैं:
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल)
मॉब लिंचिंग और नफतरी अपराध के लिए पहले तक कम से कम सात साल की सजा का प्रावधान रहता था। अब इस अवधि को बढ़ा दिया गया है। फेरबदल के बाद इसे आजीवन कारावास कर दिया गया है।
आतंकी गतिविधियों के लिए पहले विशिष्ठ कानून थे, पर इन्हें पहली दफा भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत पेश किया गया। साथ ही बड़ा बदलाव यह है कि आर्थिक सुरक्षा को होने वाला या पहुंचाया जाने वाला खतरा (तस्करी, नकली नोटों का उत्पादन आदि भी शामिल) भी आतंकी गतिविधि में गिना जाएगा।
मौजूदा समय में मानसिक तौर पर बीमार लोगों को क्राइम के लिए सजा से छूट दी जाती है। हालांकि, भारतीय न्याय संहिता में मानसिक बीमारी शब्द की जगह विक्षिप्त दिमाग टर्म आया है।
विधेयक के नए संस्करण में नया प्रावधान कहता है कि कोर्ट की कार्यवाही छापने भी सजा दी जा सकती है। रेप केस में जो कोई भी कोर्ट की कार्यवाही के बारे में बिना अदालत की मंजूरी के कुछ भी छापेगा, उसे दो साल तक की सजा हो सकती है। साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
संगठित आपराधिक समूहों की ओर से क्राइम (गाड़ी चोरी, जेबतराशी सरीखे छोटे संगठित अपराध) के लिए पहले दंड का प्रावधान हुआ करता था। हालांकि, यह तब मान्य था जब मान्य था जब इससे लोगों में असुरक्षा का भाव पैदा हो। अब असुरक्षा के भाव की यह अनिवार्यता हटा दी गई है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता अब सामुदायिक सेवा को भी परिभाषित करती है। यह बताती है कि सामुदायिक सेवा ऐसी सजा होगी जिससे समुदाय का फायदा होगा और उसके लिए अपराधी को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलेगा।
