Middle East Tension: पश्चिम एशिया में जंग, अस्थिरता और खूनखराबा फिलहाल थम गया। तेहरान और तेल अवीव के बीच रुकी मौजूदा तनातनी हालिया वक्त का सबसे जोखिम भरा जंगी टकराव था। फिलहाल इस संघर्ष में शामिल दोनों मुल्कों ने ऐलानिया सीजफायर लागू कर दिया। बीते हफ्ते दुनिया ने देखा कि कैसे ये संघर्ष न्यूक्लियर जंगी मुहाने पर आ गया था। अब सभी खेमो ने अपनी संगीने नीचे कर दी, लेकिन ये शांत माहौल अंदर से काफी खोखला है। दो पुराने दुश्मन, पुराने मसले को लेकर आमने सामने थे। अमेरिकी सरपरस्ती में इजरायल ने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को निशाना बनाया, जिसके लिए कई एरियल ऑपरेशन्स को अंजाम दिया गया। खुद पर हुई जंगी कार्रवाई का जवाब देने के लिए तेहरान ने हाइफा, तेल अवीव और येरूशलम समेत कई इजरायली इलाकों पर अपनी बैलिस्टिक मिसाइलें बरपा दी। दोनों तरफ की सिलसिलेवार हथियारबंद जवाबी कार्रवाई ने मौत और तबाही का मंजर फैला दिया। हालात काफी बिगड़ते हुए काफी नाज़ुक दौर पर पहुंच गए थे।
ईरान इजरायल के बीच सीजफायर का ऐलान
कतर पर ईरानी हमला जंग का अहम पड़ाव
अमन पसंद मुल्क उस वक्त सकते में आ गए जब खामनेई के जंगी सिपहसालारों ने लड़ाई का दायरा इजरायल से बढ़ाकर अमेरिका की ओर किया। गैर जिम्मेदाराना, भड़काऊ और लापरवाह कदम उठाते हुए IRGC ने कतर में अल-उदीद एयर बेस पर मिसाइलें बरसाईं। बता दें कि इस एयरबेस पर 10,000 हजार से ज्यादा ग्रीन बैरेट, डेल्टा और एयरबोर्न यूनिट (अमेरिकी सुरक्षा बल) की तैनाती है। मध्य पूर्व में ग्राउंड और एरियल ऑपरेशन्स के लिए ये वाशिंगटन का काफी अहम ठिकाना माना जाता है, जिसे ईरान ने निशाना बनाया। हालांकि, एयरबेस पर तैनात अमेरिकी हवाई रक्षा प्रणाली ने ईरानी बैलेस्टिक मिसाइलों को वक्त रहते ट्रैक किया, जिसके तुरंत बाद बेस से इंटरसेप्ट मिसाइलों को लॉन्च कर ईरानी हमले को नाकाम कर दिया गया। इस ईरानी कार्रवाई के दौरान एक मिसाइल एयरबेस से जुड़ी इमारत पर गिरी, लेकिन हमले में कोई घायल नहीं हुआ। इस जंग में ये अहम मोड़ था, क्योंकि द्विपक्षीय संघर्ष की आंच तीसरे मुल्क तक जा पहुंची थी।
खाड़ी मुल्कों ने की तेहरान की आलोचना
अल-उदीद एयरबेस पर हुए हमले पर कतर ने फौरी तौर पर जुब़ानी प्रतिक्रिया दी। कतर के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी करते हुए मिसाइल हमलों की मजम्मत और मुखालफत की। कतर के विदेश मंत्रालय ने ईरानी मिसाइल हमलों को अपने वजूद, आबरू और आव़ाम पर सीधा हमला माना। साथ ही उन्होंने इसे अपने हवाई इलाके और ग्लोबल कायदों की नाफऱमानी भी करार दिया। इस फेहरिस्त में दूसरे खाड़ी मुल्कों ने भी कतर के सुर में सुर मिलाये। सऊदी अरब ने कतर में ईरान के हमले को गैरवाज़िब और गैरमुनासिफ़ बताया। दूसरी ओर मस्कट, कुवैत, आबूधाबी और बहरीन के हुक्मरान भी सऊदी अरब के नक्शेकदम पर चलते दिखे। इन सभी मुल्कों ने शांत रहने और तनातनी कम करने की अपील की।
अमेरिकी एयरबेस को ईरान ने बनाया निशाना
क्षेत्रीय एकजुटता दिखी
मामले में खाड़ी मुल्कों की सधी और नपीतुली प्रतिक्रिया डिप्लोमैटिक कवायदों से कहीं ज्यादा मायने रखती है। इस क्षेत्रीय एकजुटता से साफ है कि खाड़ी मुल्क किसी भी सूरत में ऐसी जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, जिसे ना तो उन्होंने शुरू और ना ही वो उसके साथ खड़े थे। ईरान के जंगी कदमों की तासीर कम किए जाने में इन देशों का किरदार काफी अहम रहा। इन मुल्कों ने संयुक्त तौर पर ना तो इजरायल के साथ दिया और ना ही खामनेई के खिलाफ मोर्चा खोला। मौके की नज़ाकत भांपते हुए इन देशों के नीति नियंताओं ने अपने बयानों और कूटनीतिक कदमों में काफी सर्तकता बरती। इन सभी के तेवर संतुलित थे ना कि बेलगाम। संयम की अपील और बातचीत/मशविरे पर जोर की वकालत, खाड़ी देशों की कूटनीति का केंद्र बनते दिखे।
ईरान वहीं किया, जिसके वो खिलाफ था
अब बड़ा सवाल ये है कि IRGC ने IDF और अमेरिकी सेना को निशाना बनाया तो उसने कतर को अपनी मिसाइलों की जद में क्यों रखा? दोहा जो कि इस तस्वीर में कहीं भी नहीं था, उसे भी निशाना बनाया। इससे साफ हो जाता है कि तेहरान की सेना में अभी भी सामरिक समझ की कमी है। यक्ष प्रश्न ये भी है कि युद्ध उन्माद में संभावित तौर पर क्या ईरान खाड़ी के दूसरे देशों को भी निशाना बना सकता है? तेहरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से ही वहां के निज़ाम अपनी संप्रभुता, अखंडता और अक्षुण्णता खंड़ित होने के राग अलापते रहे है। दोहा की सरजमीं हमला करके उसने वहीं काम किया, जिसके खिलाफ वो लंबे समय तक खड़ा रहा। ईरान का ये ढोंग, स्वांग और पाखंड़ उसकी खोखली विश्वसनीयता को और ज्यादा खोखला कर देता है।
IRGC को बरतनी होगी संवेदनशीलता
हालिया युद्धविराम जंगी तनातनी थमने के मौके से ज्यादा बातचीत की मेज पर आने का अवसर होना चाहिए। जंग की काली परछाईंयों से दूर शांत खाड़ी मुल्कों तक लड़ाई की आंच फैलाने के ईरानी फैसले ने मिडिल ईस्ट को पूरी तरह अस्थिर करने का बड़ा जोखिम उठाया था। अगर तेहरान अपने मंसूबे हासिल करने में कामयाब रहता तो ये त्रिपक्षीय युद्ध ज़बरदस्त क्षेत्रीय संघर्ष में तब्दील हो सकता था। अगर ये थ्योरी हकीकत की शक्ल अख्तियार कर लेती तो इसके नतीज़े भारी तबाही ला सकते थे। मुमकिन नतीज़ों में इसका असर पश्चिम एशिया से निकलकर ग्लोबल इक्नॉमी को अपनी जद में ले सकता था।
खाड़ी का इलाका जीवाश्म ईंधन का घर है। लड़ाई का दायरा बढ़ने पर पेट्रोलियम और गैस की सप्लाई ठप्प पड़ सकती थी। ईरानी प्रॉक्सी पुख्ता तौर पर अपने आका के साथ मिलकर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम शिपिंग रूट के बंद करते, इससे पहले से ही लड़खड़ा रही ग्लोबल सप्लाई चैन और वैश्विक बाजारों को करारा झटका लग सकता था। तारीखों से मिले सबक बताते है कि अगर लड़ाई में गैरवाज़िब इरादतन तौर पर किसी तीसरे खेमे को उसकी मर्जी के खिलाफ शामिल किया जाता है तो इससे क्षेत्रीय तनाव की चिंगारियां ग्लोबल वॉर में तब्दील हो जाती है।
भले ही कतर पर हुए ईरानी हमले में कोई बड़ा नुकसान ना हुआ हो, लेकिन इससे ये साफ हो जाता है कि कैसे महीन सी लक्ष्मण रेखा लांघकर छोटी लड़ाई बड़े जंगी मोर्चें में तब्दील हो जाती है। फिलहाल युद्धविराम प्रभावी है, लेकिन अगर IRGC फिर इसी तरह की उकसावे भरी कवायद दोहराती है तो बड़े पैमाने पर जंग छिड़ने के आसार बने रहेंगे।
फोर्दो न्यूक्लियर साइट
दिग्गज देशों को करनी होगी ये पहल
फिलहाल ग्लोबल बिरादरी खासतौर से खाड़ी देशों को मुस्तैद और चौंकन्ना रहते हुए एकजुट होना चाहिए। साथ ही उन्हें ईरान को ये पैगाम भी देना चाहिए कि वो इजरायल के साथ अपनी जंगी रंजिशें और खूनी अदावत को दूसरे मुल्कों पर ना थोपें। दुश्मनी और हमले के दायरे को अपने तक ही सीमित रखे। खाड़ी देशों के मौजूदा तटस्थ रवैए के मद्देनज़र उन्हें बदला, धमकी और अनचाहे इरादतन नुकसान से बचाया जाना चाहिए। वक्त की दरकार है कि संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय यूनियन, बीजिंग और वाशिंगटन जैसे बड़े खिलाड़ी इस फलसफे की हिफाजत करे कि किसी भी मुल्क की अखंडता से कोई खिलवाड़ और छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। इन सूरमाओं को ये भरोसा दिलाना होगा कि अमन पसंद मुल्कों के खिलाफ फौजी गोलबंदी कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी।
ईरानी हुक्मरानों को दिखानी होगी समझदारी
आयतोल्लाह सैय्यद अली होसैनी ख़ामेनेई और मसूद पेज़ेशकियन को अपने कमांडरो को ये समझाना चाहिए कि जब वो दुश्मनों से घिरे हो और जंगी तनाव से दबे हो तो उन्हें बेमतलब पड़ोसियों को निशाना बनाने से बचना चाहिए। ये राह सिर्फ और सिर्फ लंबे अलगाव और अस्थिरता की ओर जाती है। ईरानी निज़ाम को समझना होगा कि निर्दोषों के खून में हाथ रंगने से बेहतर है कि डिप्लोमैटिक गलियारे, अंतरराष्ट्रीय तंत्र और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के जरिए वो अपनी शिकायत और ऐतराज़ दुनिया के सामने रखे। फिलहाल हुए तेल अवीव-तेहरान युद्ध विराम ने फौरी राहत दी है, लेकिन संघर्ष के दौरान कतर को निशाना बनाकर किए गए ईरानी हमले और उससे पैदा हुई खतरनाक रवायत को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। खाड़ी मुल्कों ने जिस तरह से अमन की पैरोकारी की और संयम दिखाया वो बेमिसाल था। ऐसे में तेहरान का कतर पर मिसाइल हमला सरासर गलत कदम था। इसके चलते जंग बड़े पैमाने पर फैल सकती थी। ग्लोबल बिरादरी को ये आश्वासन दिलवाना होगा कि इस तरह के हालात फिर से कभी ना बने, अगर बने भी गए तो उसका असर जंग लड़ रहे देश तक ही सिमटा रहे। खाड़ी मुल्कों को जंग की आग झोंकने से बचाना होगा। किसी भी सूरत में अगर ऐसा ना हुआ तो कई देशों की जीवाश्म ईंधन पर टिकी अर्थव्यवस्थाएं धूल फांकने लगेगी।
नोट: इस आर्टिकल के लेखक राम अजोर वरिष्ठ पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं।
