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नेहरू से लेकर मोदी तक....संकट के हर दौर में कैसे मजबूत होते चले गए भारत-रूस संबंध?

भारत-रूस साझेदारी, जो आजादी के बाद के दशकों में शुरू हुई थी, शीत युद्ध के दौरान फली-फूली, सोवियत संघ के पतन और 1990 के दशक के उथल-पुथल भरे दौर से बची रही। इसने 2000 के दशक में नई मजबूती हासिल की और यूक्रेन पर आक्रमण के बाद हर तरह के दबाव के बावजूद कायम है। इसपर विस्तार से डालते हैं नजर।

India Russia Ties

भारत-रूस संबंधों का इतिहास (AP)

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं। 4-5 दिसंबर की अपनी यात्रा के दौरान वह 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलेंगे। फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। पुतिन इससे पहले दिसंबर 2021 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने से कुछ महीने पहले भारत आए थे। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस यात्रा से दोनों पक्ष द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति की समीक्षा करेंगे और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में बात करेंगे। क्रेमलिन ने एक बयान में कहा कि यह दौरा बेहद अहम , जिसमें एक विशेष रूप से विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी के रूप में रूसी-भारतीय संबंधों के व्यापक एजेंडे पर व्यापक रूप से चर्चा होगी। दरअसल, यह साझेदारी, जो आजादी के बाद के दशकों में शुरू हुई, शीत युद्ध के दौरान फली-फूली, सोवियत संघ के पतन और 1990 के दशक के उथल-पुथल भरे दौर से बची रही। इसने 2000 के दशक में नई मजबूती हासिल की और यूक्रेन पर आक्रमण के बाद हर तरह के दबाव के बावजूद कायम है। इसपर विस्तार से डालते हैं नजर।

नेहरू के रुख से संबंधों को मिली मजबूती

स्वतंत्रता के शुरुआती दिनों से ही भारत ने सामरिक स्वायत्तता पर जोर दिया कि शीत युद्ध के किसी भी पक्ष के साथ गठबंधन नहीं किया जाए। हालांकि, जैसे-जैसे अमेरिका इस्लामाबाद के करीब आया, सोवियत संघ ने नई दिल्ली के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। जवाहरलाल नेहरू की 1955 और 1961 की सोवियत संघ यात्राएं इस रिश्ते की नींव बनीं। सोवियत संघ ने भारत के औद्योगीकरण अभियान का उस समय समर्थन किया जब कुछ ही देश भारत के विकास में राजनीतिक पूंजी निवेश करने को तैयार थे। इसके बाद दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा और रूस ने बढ़-चढ़कर भारत का साथ दिया। इस्पात संयंत्र, भारी मशीनरी, तकनीकी संस्थान और शुरुआती वैज्ञानिक सहयोग स्थापित हुए। सोवियत सैन्य उपकरण, खासकर मिग विमान, धीरे-धीरे भारत के रक्षा आधुनिकीकरण की रीढ़ बन गए।

संधि पर इंदिरा के हस्ताक्षर ने सब कुछ बदल दिया

1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा हस्ताक्षरित भारत-सोवियत शांति, मैत्री और सहयोग संधि ने इस रिश्ते को एक नए आयाम पर पहुंचा दिया। जैसे-जैसे भारत और पाकिस्तान पूर्वी पाकिस्तान, जो जल्द ही बांग्लादेश बन गया — उसे लेकर उलझ गए। अमेरिका के भारी दबाव के बावजूद इंदिरा चट्टान की तरह डटीं रहीं। इससे दोनों देशों के वैश्विक गठबंधन और मजबूत होते चले गए। निक्सन प्रशासन ने पाकिस्तान की ओर तेजी से झुकाव दिखाया और सातवें बेड़े की टास्क फोर्स 74 को बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया। ब्रिटेन ने एचएमएस ईगल को इस क्षेत्र में तैनात कर दिया। भारत द्वारा बांग्लादेश को मान्यता देने से स्थिति और भी बिगड़ गई।

तब सोवियत संघ ने हस्तक्षेप किया। उसने परमाणु पनडुब्बियों सहित अपनी नौसैनिक ताकत तैनात कीं और साफ कर दिया कि बाहरी शक्तियों के किसी भी तरह हस्तक्षेप के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मॉस्को ने अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा लाए गए युद्धविराम प्रस्तावों पर बार-बार वीटो लगा दिया, जिससे भारत को जरूरी कूटनीतिक स्थान मिल गया। कुछ दिनों बाद, पाकिस्तानी सेना ने ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया।

रक्षा संबंधों की नई इबारत लिखी गई

1960, 1970 और 1980 के दशक में नियमित सोवियत आपूर्ति और विमानों, टैंकों, पनडुब्बियों और तोपखाने प्रणालियों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन ने रूस को भारत के सैन्य इकोसिस्टम का केंद्र बना दिया। प्रशिक्षण, रखरखाव और सिद्धांत आपस में गुंथ गए। संबंधों में और मजबूती आई। आज भी हथियारों और गोला-बारूद के मामले में 70 से 80 प्रतिशत भारतीय हार्डवेयर रूस से आता है। भारत कई रूसी निर्मित डिफेंस सिस्टम पर निर्भर है, जिनमें Su-30MKI लड़ाकू विमान, T-90 और T-72 मुख्य युद्धक टैंक, BMP-2 पैदल सेना लड़ाकू वाहन, S-400 ट्रायम्फ, INS विक्रमादित्य विमानवाहक पोत और चक्र II परमाणु पनडुब्बी शामिल हैं।

1975 में सोवियत संघ ने भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट प्रक्षेपित किया। 1984 में राकेश शर्मा ने सोयुज अंतरिक्ष यान में उड़ान भरी जो अंतरिक्ष सहयोग में एक प्रतीकात्मक उपलब्धि थी। धातु विज्ञान से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक, विभिन्न क्षेत्रों में संयुक्त आयोगों, प्रौद्योगिकी हस्तांतरणों, अनुसंधान के आदान-प्रदान और उपकरण की मदद ने एक विज्ञान और उद्योग साझेदारी का निर्माण किया जिसने दशकों तक भारतीय संस्थानों को मजबूत आधार और आकार दिया।

पुतिन-वाजपेयी का आगमन

1999 में व्लादिमीर पुतिन के सत्ता में आने से भारत-रूस संबंधों को नई दिशा मिली। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के तहत 2000 में उनकी भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने "भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी घोषणापत्र" पर हस्ताक्षर किए, जिससे वार्षिक शिखर सम्मेलन और संरचित संवाद तंत्र स्थापित हुए। 2000 और 2010 के दशक में सहयोग व्यापक और गहरा हुआ।

• ब्रह्मोस एक प्रमुख सह-विकास परियोजना के रूप में विकसित हुआ

• सुखोई के विकास और लाइसेंस प्राप्त उत्पादन ने भारत की विमानन क्षमताओं का विस्तार किया

• क्रायोजेनिक इंजन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण ने भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को बल दिया

• परमाणु ऊर्जा सहयोग में तेजी आई, जिसका केंद्र बिंदु कुडनकुलम रहा

• ऊर्जा संबंध मजबूत हुए, जिसमें सखालिन-1 (Sakhalin-1) में भारत की हिस्सेदारी भी शामिल है

नरेंद्र मोदी ने संबंधों को और दी मजबूती

2010 में दिमित्री मेदवेदेव और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में इस साझेदारी को "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" का दर्जा दिया गया। 2014 से नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद उनके और पुतिन के बीच व्यक्तिगत तालमेल ने संबंधों को नई गति दी। 2019 में व्लादिवोस्तोक सहित पीएम मोदी की कई यात्राओं ने रूस के सुदूर पूर्व जैसे नए क्षेत्रों को खोला। इस बीत भारत ने अमेरिका, यूरोप और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ अपने संबंधों का विस्तार किया, लेकिन मॉस्को के साथ संबंधों में गर्माहट बरकरार रही। खास तौर पर यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद भारत पर दबाव बढ़ा और मुश्किल हालात पैदा हुए। रूस से भारत को सस्ता तेल मिलने लगा तो अमेरिका तिलमिला उठा और कई कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन अमेरिका की इन चालबाजियों और दबाव के बावजूद भारत-रूस की दोस्ती और संबंधों में कोई गिरावट नहीं आई। व्लादिमीर पुतिन का दौरा इसकी गवाही भी देता है।

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अमित कुमार मंडल
अमित कुमार मंडल Author

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर... और देखें

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