Vande Mataram Parliament Discussion: "वंदे मातरम्, सिर्फ राजनीतिक लड़ाई का मंत्र नहीं था। सिर्फ अंग्रेज जाएं और हम अपनी राह पर खड़े हो जाएं, वंदे मातरम् सिर्फ यहां तक सीमित नहीं था।" लोकसभा में सोमवार को वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर एक खास चर्चा में हिस्सा लेते हुए पीएम मोदी ने इस बात से बहस की शुरुआत की। 10 घंटे तक राष्ट्रीय गीत पर होने वाली चर्चा महज रस्मी कार्यक्रम नहीं, बल्कि इसके पीछे एक राजनीतिक उद्देश्य भी है। सवाल है कि आखिर 'वंदे मातरम्' पर सदन में चर्चा की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल, कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1937 के एक फैसले को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला था।
उन्होंने कहा था कि 'वंदे मातरम्' भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आवाज बना, इसने हर भारतीय की भावनाओं को व्यक्त किया। दुर्भाग्य से 1937 में 'वंदे मातरम्' के महत्वपूर्ण छंदों, उसके एक हिस्से को अलग कर दिया गया। 'वंदे मातरम्' के विभाजन ने विभाजन के बीज भी बोए। आज की पीढ़ी को यह जानने की जरूरत है कि राष्ट्र निर्माण के इस 'महामंत्र' के साथ यह अन्याय क्यों किया गया। यह विभाजनकारी सोच आज भी देश के लिए एक चुनौती है।
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पीएम के आरोपों पर कांग्रेस का जवाब
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के आरोपों को खारिज कर दिया है। पार्टी ने 1937 के उस फैसले का हवाला दिया, जिसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद और सरोजिनी नायडू जैसे बड़े नेता शामिल थे। कांग्रेस के अनुसार, केवल पहली दो पंक्तियों को इसलिए अपनाया गया था क्योंकि बाकी छंदों में धार्मिक भावनाएं थीं, जिनसे मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों को आपत्ति थी। कांग्रेस पार्टी का तर्क है कि यह फैसला स्वतंत्रता आंदोलन में एकता बनाए रखने के लिए लिया गया था।इतना ही नहीं कांग्रेस नेताओं ने रवींद्रनाथ टैगोर के जवाहरलाल नेहरू को लिखी चिट्ठी का भी जिक्र किया, जिसमें टैगोर ने केवल दो छंदों का उपयोग करने का सुझाव दिया था।
नेहरू के असली रुख आएगा सामने: बीजेपी
बीजेपी का कहना है कि 10 घंटे की चर्चा में पार्टी संसदीय चर्चा में ऐतिहासिक मतभेदों को उजागर करेगी। बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने रविवार को कहा कि वंदे मातरम को लेकर जवाहर लाल नेहरू के असली रुख को सामने लाया जाएगा। संबित पात्रा ने ऐसे लेखों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया है कि नेहरू का मानना था कि 'आनंदमठ' से 'वंदे मातरम्' का जुड़ाव मुसलमानों को परेशान कर सकता है और रचना के कुछ हिस्सों को समझना मुश्किल था।
वंदे मातरम और बंगाल चुनाव
बता दें कि मौजूदा समय में बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। वहीं, अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव है। बीजेपा का अब सबसे बड़ा लक्ष्य बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकना है।
वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल से थे और इस गीत को नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भी समर्थन मिला था, ऐसे में बीजेपी इसे बंगाली अस्मिता और TMC की राजनीति से जोड़कर भुनाने की रणनीति पर काम कर रही है। सबसे बड़ी बात है कि इस मामले पर टीएमसी ने चुप्पी साध रखी है।
एक गीत जिसने उड़ा दी अंग्रेजों की नींद
सियासी घमासान के बीच आइए इस राष्ट्रीय गीत की सवर्णिम इतिहास को भी जान लें। वंदे मातरम सिर्फ एक राष्ट्रीय गीत नहीं है बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा कहा जाता है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखी गई इस गीत ने भारत नें अंग्रेजों शासन की नींव हिला कर रख दी थी। सबसे पहली बार 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में इस गीत का प्रकाशण हुआ। इसके बाद बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे अपने अमर उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया जो 1882 में प्रकाशित हुआ था।
उपन्यास आनंद मठ से निकलकर पूरे भारत की रगों में यह गीत दौड़ने लगी। जिस-जिस क्रांतिकारी ने इसे सुना, उनके दिल में यह गीत घर कर गई। जेल की कोठरियां, फांसी का तख्ता, दमन की नीतियां। अंग्रेजों की कोई भी ताकत इस गीत की प्रेरणा को रोक नहीं पाया। ‘वंदे मातरम्’ की गूंज देश से निकलकर पूरी दुनिया में सुनाई देने लगी थी।
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साल 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में जब भीकाजी कामा ने पहली बार भारतीय तिरंगे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फहराया, उस ध्वज पर ‘वंदे मातरम्’ गर्व से लिखा था। एक ऐसा संदेश, जिसने दुनिया को भारत के स्वतंत्रता-संकल्प से पहली बार परिचित कराया। इंग्लैंड में फांसी का सामना करते हुए मदनलाल धींगरा के होठों पर भी अंतिम क्षणों में यही शब्द थे ‘वंदे मातरम्’।
दक्षिण अफ्रीका में गोपालकृष्ण गोखले के स्वागत के दौरान भी यही गूंज सुनाई दी। विदेशों में बसे भारतीयों ने इसे स्वतंत्रता की पुकार मानकर अपनाया और यही गीत उन सभी दिलों की धड़कन बन गया, जो भारत को गुलामी से मुक्त देखने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
इस गीत की रचना भले ही बंगाल में हुई। गीत में संस्कृत-बांग्ला का मिश्रण है, लेकिन सीमाओं के परे यह गीत पूरे देश में गूंज रही थी। आखिर में अंग्रेज हताश होकर 1907 में इसके गायन पर पाबंदी लगा दी थी।
मुस्लिम लीग ने क्यों की खिलाफत?
इस गीत से परेशान होकर अंग्रेजो नें 'बांटो और राज करो' की नीति अपनाई। हिंदुओं-मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग के नेताओं में यह जहर घोल दिया कि इस गीत को इस्लाम विरोधी और संप्रादियक बताने में कामयाब हो गए।
साल 1909 के अमृतसर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने “वंदे मातरम्” का विरोध किया। लीग के अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिक और इस्लाम विरोधी करार देते हुए इसे अस्वीकार किया। लीग ने वंदे मातरम के गायन या पाठ को इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ बताया और कहा कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी अन्य के प्रति भक्ति या उपासना का कोई स्थान नहीं है।
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एक तरफ जहां देशभर में स्वतंत्रा सेनानी 'वंदे मातरम्' गीत को अंग्रेजों के खिलाफ एक शस्त्र बना चुके थे। वहीं, दूसरी ओर मुस्लिम लीग इस गीत कर रहे थे। कांग्रेस के नेताओं की चिंता बढ़ गई। आखिर में कांग्रेस ने समाधान के रास्ते की तलाश की जिम्मेदारी पार्टी की एक कमेटी को सौंपी।
साल 1937 में इस कमेटी ने “वंदे मातरम्” का विरोध करने वालों की शिकायतें पर गौर किया। रवींद्र नाथ टैगोर, नेहरू, अबुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस की सदस्यता वाली इस कमेटी ने बीच का रास्ता निकाला। कमेटी ने न तो गीत को पूरी तौर पर स्वीकार किया और न पूरी तौर पर अस्वीकार। हल निकाला गया कि गीत के शुरू के दो पद्य दो गाए जाएंगे जिनमें कोई धार्मिक पहलू नहीं है।
साल 1950 में संविधान सभा ने सर्वसम्मति से वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया। तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था वंदे मातरम ने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, इसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा।
