अमेरिका की सत्ता में जब से डोनाल्ड ट्रंप आए हैं, ब्रिक्स (BRICS) के खिलाफ लगातार बोल रहे हैं। ब्रिक्स के सदस्य देशों के खिलाफ टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं, एक नहीं कई बार चेतावनी दे चुके हैं। ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि ब्रिक्स देश, अमेरिकी डॉलर को खत्म करना चाहते हैं, ट्रंप और उनके सलाहकार न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की दस्तक से डरे हुए हैं। दरअसल अमेरिका भले ही विश्व की महाशक्ति है, महाशक्ति है, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सालों तक दुनिया का उसने नेतृत्व किया है, लेकिन पिछले कई सालों से न्यू वर्ल्ड से अमेरिका डर रहा है, उनकी शक्ति से अमेरिका खौफ में है। अब सवाल ये है कि क्या सच में ब्रिक्स इतना ताकतवर हो गया है कि अमेरिका डरने लगा है, क्या सच में ब्रिक्स ऐसा कुछ करने जा रहा है, जिससे अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व खत्म हो जाएगा? आइए समझते हैं...
ब्रिक्स से क्यों खौफ खाता है अमेरिका
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ब्रिक्स क्या है और कैसे हो रहा है मजबूत?
BRICS — ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन और साउथ अफ्रीका — एक ऐसा समूह है जो उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है। अब इसमें नए सदस्य भी जुड़ रहे हैं (जैसे ईरान, सऊदी अरब, यूएई आदि), जिससे इसका राजनीतिक और आर्थिक दायरा और बढ़ गया है। इस समूह का उद्देश्य है आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना, विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंचों पर मज़बूत करना और पश्चिमी देशों के दबदबे वाली संस्थाओं के विकल्प तैयार करना। भारत जैसे देशों के लिए यह मंच एक कूटनीतिक अवसर और चुनौती दोनों है। ब्रिक्स एक तरह से न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का प्रतीक बन रहा है।
गठन और इतिहास
- 2006: BRIC के रूप में शुरुआत हुई (ब्राजील, रूस, भारत और चीन)
- 2010: दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ और नाम बना BRICS
- यह एक राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक मंच बन गया है
ब्रिक्स की पहली समिट के दौरान ब्राजील, रूस, चीन और भारत के नेता (फोटो- kremlin.ru)
न्यू वर्ल्ड ऑर्डर क्या है
न्यू वर्ल्ड ऑर्डर (New World Order) एक ऐसा विचार या परिकल्पना है, जो यह दर्शाता है कि वैश्विक सत्ता-संतुलन या नेतृत्व की व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव हो रहा है या होने वाला है। इसका सबसे सामान्य अर्थ यह है कि अब तक जिस तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों का दुनिया पर वर्चस्व रहा है, वह धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है और उसकी जगह एक नई, बहुध्रुवीय व्यवस्था जन्म ले रही है, जहां एक से अधिक देश — जैसे कि चीन, रूस, भारत, ब्राजील आदि — विश्व की दिशा तय करने में भूमिका निभा रहे हैं। यह शब्द शीत युद्ध के बाद अचानक लोकप्रिय हुआ, जब अमेरिका ने अकेले सुपरपावर के रूप में उभरते हुए दावा किया था कि वह दुनिया में शांति, लोकतंत्र और मुक्त व्यापार का संरक्षक बनेगा। लेकिन 21वीं सदी में जैसे-जैसे चीन की आर्थिक ताकत बढ़ी, रूस ने भू-राजनीतिक मोर्चे पर अपनी सक्रियता दिखाई और भारत जैसे देशों ने वैश्विक मंचों पर स्वतंत्र रुख अपनाना शुरू किया, "न्यू वर्ल्ड ऑर्डर" का अर्थ भी बदलने लगा। BRICS जैसे संगठन इसका एक उदाहरण हैं, जो पश्चिमी नियंत्रण वाली संस्थाओं के विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।
ब्रिक्स की शक्ति
| क्षेत्र | स्थिति |
|---|---|
| जनसंख्या | विश्व की 42% आबादी (≈ 3.2 अरब लोग) |
| जीडीपी (पीपीपी) | वैश्विक जीडीपी का ≈ 32% (G7 से ज्यादा) |
| ऊर्जा संसाधन | तेल, गैस, कोयले का विशाल भंडार (रूस, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका) |
| न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) | वर्ल्ड बैंक का विकल्प, $100+ अरब फंडिंग क्षमता |
| भूराजनीतिक प्रभाव | संयुक्त राष्ट्र, G20, SCO और WTO जैसी संस्थाओं में मजबूत उपस्थिति |
ब्रिक्स से अमेरिका को कितना खतरा?
BRICS से अमेरिका को सीधा खतरा शायद उतना नहीं है, यह फिलहाल एक सांकेतिक चुनौती है, हालांकि भविष्य इसका बहुत बड़ा है, जिससे अमेरिका को सीधी चुनौती मिल सकती है — और यही इस समूह की असली ताकत बन जाती है। अमेरिका दशकों से एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था का केंद्र रहा है, जिसे उसने अपने आर्थिक, सैन्य और वैचारिक प्रभाव से गढ़ा। डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रीढ़ बना, वर्ल्ड बैंक और IMF जैसी संस्थाओं पर उसका अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहा, और नाटो या G7 जैसे गठबंधनों से वह राजनीतिक दिशा तय करता रहा। BRICS इस व्यवस्था को वैकल्पिक राह पर ले जाने की एक सोची-समझी कोशिश है — और यही उसे अमेरिका के लिए असहज बना देता है।
- BRICS की सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका के लिए आर्थिक प्रभुत्व के संदर्भ में है। जब चीन और रूस जैसी शक्तियां डॉलर को दरकिनार कर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की बात करती हैं, या जब ब्राजील और भारत वैश्विक संस्थानों के "पुनर्गठन" की मांग करते हैं, तो अमेरिका की वह आर्थिक व्यवस्था, जो काफी हद तक उसके नियंत्रण में रही है, हिलती नजर आती है।
- इसके अलावा, BRICS अमेरिका के भू-राजनीतिक एकाधिकार को भी सवालों के घेरे में लाता है। जैसे-जैसे नए सदस्य BRICS+ में जुड़ते हैं — मसलन सऊदी अरब, ईरान, यूएई जैसे देश — अमेरिका की मध्य-पूर्व पर पकड़ कमज़ोर होती जाती है।
- जब वैश्विक दक्षिण के कई देश BRICS को अपनी आवाज मानने लगते हैं, तो संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में अमेरिका की नैतिक अथॉरिटी को भी चुनौती मिलती है।
- लेकिन यह खतरा फिलहाल प्रत्यक्ष सैन्य या आर्थिक संघर्ष का नहीं है। यह एक धीमा, लेकिन गहरा होता हुआ बदलाव है — जिसमें अमेरिका को यह महसूस हो रहा है कि अब वह अकेला निर्णायक नहीं रहा।
डॉलर पर क्या असर हो रहा है?
BRICS से अमेरिकी डॉलर को जो खतरा है, वह सीधा, धीमा लेकिन बेहद रणनीतिक है — यह खतरा युद्ध जैसा नहीं, बल्कि उस विश्वास की नींव को चुनौती देने जैसा है जिस पर डॉलर की वैश्विक ताकत टिकी हुई है। दुनिया में डॉलर का दबदबा इसलिए है क्योंकि अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार — विशेषकर तेल, गैस, तकनीक, और वित्त — इसी मुद्रा में होता है। अमेरिका को इससे दो फायदे मिलते हैं: एक, उसकी मुद्रा की मांग हमेशा बनी रहती है; और दो, वह अपने कर्ज को अपनी ही मुद्रा में छापकर चुकाने की स्थिति में रहता है — जिसे कई अर्थशास्त्री “अमेरिका का मौद्रिक विशेषाधिकार” (monetary privilege) कहते हैं। BRICS इस विशेषाधिकार को धीरे-धीरे चुनौती देने की दिशा में काम कर रहा है। सबसे पहले, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई जा रही है। भारत-रूस के बीच रुपया-रूबल, चीन-ब्राजील के बीच युआन में लेन-देन, और अब BRICS+ देशों की इसी दिशा में बढ़ती रुचि, डॉलर की भूमिका को सीमित करने की ठोस कोशिशें हैं। इसके अलावा BRICS एक संयुक्त मुद्रा (जैसे "BRICS पे" या "ब्रिकॉइन") लाने की संभावना भी टटोल रहा है — जो अभी विचार स्तर पर है, लेकिन अगर विकसित हुई तो यह SWIFT और डॉलर-आधारित व्यापार तंत्र के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
ब्रिक्स समिट 2025 (फोटो- PMO India)
ब्रिक्स का भविष्य
BRICS का भविष्य एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में आकार ले रहा है जो आने वाले वर्षों में वैश्विक सत्ता-संतुलन को नए रूप में ढाल सकता है। यह केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है; यह अब एक विचार है — एक बहुध्रुवीय, समावेशी और गैर-पश्चिमी विश्व व्यवस्था की परिकल्पना, जिसमें शक्ति और संसाधनों का बंटवारा अधिक न्यायपूर्ण हो। BRICS का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि यह समूह किस हद तक आंतरिक एकता, संस्थागत मजबूती, और रणनीतिक दिशा बनाए रख सकता है। बदलती दुनिया में BRICS का भविष्य उज्ज्वल है — खासकर उन देशों के लिए जो पश्चिमी ढांचे के बाहर अपनी जगह बनाना चाहते हैं।
