Pakistan: धारा 370 के खात्मे के बाद घाटी में अमन और चैन की कलियां खिलने लगी थी, जम्हूरियत की फिजाओं में घुली कश्मीरियत की खूबसूरती परवान चढ़ने लगी, पूरे मुल्क से सैलानी कश्मीर की ओर रूख़ करने लगे। सीमा पार बैठे आंतक के आकाओं को कश्मीर फैलती शांति डसने लगी, जिसके बाद पहलगाम में कत्लोगारत की साज़िशों का ताना बाना बुना गया। इस हमले में दो दर्जन से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस आंतकी कार्रवाई ने घाटी के उन जख्मों को कुरेद दिया, जो कि आम कश्मीर के ज़हन में 90 के दशक में लगे थे। इस हत्याकांड के बाद पाक सेना सुप्रीमो जनरल सैय्यद असीम मुनीर फ्रंट लाइन पर आ गए। असीम मुनीर अक्सर पब्लिक डोमेन में लो-प्रोफाइल रहते थे, लेकिन अब वो आगे आकर नई दिल्ली से दो-दो हाथ करने का मन बन चुके है। कश्मीर मसले पर गैर वाज़िब तकरीरें देकर वो इस्लामाबाद के नापाक नैरेटिव को लगातार नया आयाम देने की जुगत में है। मुनीर अब नेपथ्य में रहने का शौक छोड़ते दिख रहे है, इससे पहले वो पाक सेना के कार्यक्रमों में नपे-तुले अंदाज में तकरीरें और ऐलान करने का शगल रखते थे। उनका एकाएक सामने आना नए और खतरनाक समीकरणों को बल दे रहा है। अब वो फौजी रस्मों-रवायतों को दरकिनार करते हुए सियासी रूझान वाले बयानों पर ज्यादा ध्यान देने लगे है। इसी के चलते अब वो नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बढ़ते जंगी खींचतान के बीच में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
पाकिस्तान पर भारी पड़ती जनरल असीम मुनीर की हरकतें
पाक पर भारी पड़ेगी, नई दिल्ली की सैन्य सक्रियता
नई दिल्ली का सत्ता सदन इस वक्त भारी जन दबाव में है, आम हिंदुस्तानी अब केंद्र सरकार से पाकिस्तान को जोरदार जवाब देने की उम्मीद लगाए बैठा है। बीते कुछ दिनों में जो रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति की बैठकें हुई, उससे कई कयास लगाए जा रहे है। कुछ बैठकों में रक्षा सचिव और अर्धसैनिक बलों के महानिदेशकों की मौजूदगी किसी बड़ी कार्रवाई का संकेत देती दिख रही है। इन सबके बीच रक्षा मंत्रालय लगातार भारतीय सेना के सैन्य संचालन महानिदेशक से संपर्क में बना हुआ है। साफ है कि रावलपिंडी में बैठे पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी इस पर नज़रें बनाए हुए है। उनसे मिले फीडबैक के बाद जनरल मुनीर ने अपने बयानों में नई दिल्ली को लेकर तल्खी और सख्ती बढ़ा दी है, इससे इस्लामाबाद का लहजा साफतौर पर दुनिया के सामने आ चुका है। हाल ही में एक वीडियो सामने आया, जिसमें असीम मुनीर टैंक पर चढ़कर हिंदुस्तान के खिलाफ जहर उगलकर अपने जवानों की हौंसला अफजाई करते हुए दिखे। उन्होनें कहा कि- ये बिल्कुल साफ है, भारत की ओर से होने वाली किसी भी कार्रवाई का आला, फौरी, मजबूत और कड़ा जवाब दिया जायेगा।
हर मोर्चें पर हारा है पाकिस्तान
खास बात ये है कि पहलगाम हमले के बाद असीम मुनीर जिन बयानों को जारी कर रहे है, उससे कई चीजें साफ हो जाती है। पहली तो ये कि वो तंगहाली और बदहाली के हालातों बीच पाकिस्तान को बड़ी ताकत साबित करना चाहते है। दूसरा वो पाकिस्तानी आवाम़ के बीच अपना भारी जनसमर्थन बनाए रखना चाहते है। अपनी तकरीरों से वो आम पाकिस्तानी का ध्यान भुखमरी से हटाना चाह रहे है। अपनी इस कवायद से वो लोगों का रूख बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी, अफगानिस्तान और तहरीक-ए-तालिबान की ओर से मिल रही चुनौतियों से हटाना चाहते है। बता दे कि पाकिस्तान सेना पहले से ही ऑपरेशन जर्ब-ए-अज़्ब में मिली करारी शिकस्त का दाग़ अपने माथे पर ढोती फिर रही है। ऐसे में उकसावे भरे बयानों से अपनी छवि को चमकाना उनका एकमात्र इरादा दिख रहा है।
दिखावटी है इस्लामाबाद की जंगी कुव्वत
कमजोर और खोखली सियासी अगुवाई के चलते पड़ोसी मुल्क कई सालों से मुश्किलों से जूझ रहा है। इसी वज़ह से आम पाकिस्तानी की आस्था सेना को लेकर काफी कम हुई है। मुनीर इस बात को अच्छे से समझते है। यही वज़ह है कि उन्हें दोहरे पर मोर्चें पर काम करना पड़ रहा है। नई दिल्ली की जंगी कुव्वत से पार पाना आसान नहीं है, ये बात वो काफी पहले अच्छे से समझ चुके है। इसलिए अब वो मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे है, क्योंकि उन्हें पता है कि जंगी मैदान में वो ज्यादा देर टिक नहीं पायेगें। साथ ही उन्हें अपनी आवाम़ को भी एकजुट रखना है इसलिए फेक नैरेटिव और एडिटेड वीडियों के दम वो अपनी पकड़ बनाए रखना चाह रहे थे, जिस पर भारत सरकार ने डिजिटल स्ट्राइक करते हुए लगाम कस दी। पाक समर्थित कई सोशल मीडिया चैनल को बंद कर दिया गया। अब पाकिस्तानी जंगी साजोसामान सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया पर है, उनके हथियारखाने और तोपखाने खाली पड़े हुए है। गौरतलब है कि असीम मुनीर हाफ़िज-ए-कुरान है यानि कि कुरान की हर आयात, हर हर्फ उन्हें मुंह ज़ुबानी याद है। ऐसे वो अक्सर भारत के खिलाफ जहर उगलते हुए धार्मिक वक्तव्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करते है। साफ है कि उनकी हालिया कई प्रतिक्रियायें सियासी जमा-घटा से कहीं ज्यादा है। जब उन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का 28 वां महानिदेशक बनाया गया तो उनकी शख्सियत में कट्टरपंथ काफी बढ़ गया। उनके लहज़े से ये साफ हो चुका है कि नई दिल्ली के साथ दशकों से चल आ रहा संघर्ष सियासी और सरहदी मामलों से कहीं ज्यादा धार्मिक है। उन्हें ये भी पता है कि कश्मीर का मुद्दा उछालकर ही वो अपनी चमक बरकरार रख सकते है। पहलगाम हमला उनकी इसी सोच का विस्तार है।
कश्मीर नैरेटिव को सुलगाना पाक की मजबूरी
मकबूजा कश्मीर और आजाद कश्मीर जैसे शब्द अपने साथ बनाए रखना पाकिस्तान की अंतहीन बेबसी का हिस्सा है। पड़ोसी मुल्क की मजबूरी है, खुद को जबरन इस लफ्ज़ों से जोड़े रखना। विदेश मंत्री एस. जयशंकर साफ कर चुके है कि कश्मीर भारत की अक्षुण्णता और अखंड़ता का हिस्सा है। कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की हरकतें निंदनीय है। ऐसे में वैश्विक पटल पर इस मुद्दे को बनाया रखना और उस पर विलाप करना इस्लामाबाद के अस्तित्व से जुड़ा है। पहलगाम जैसी नापाक हरकतों को अंजाम देकर वो इसी कवायद को आगे बढ़ता रहा है। नई दिल्ली और इस्लामाबाद की हालिया तनातनी कम होगी या बढ़ेगी ये सब मुनीर की सियासी चालों और डिप्लोमैटिक दखल पर निर्भर करता है। फिलहाल इस मामलों पर जीरो टॉलरेंस दिखाते हुए भारत ने अपना रूख़ पूरी तरह साफ कर दिया है।
ड्रैगन के भी है, ना-पाक इरादे
दोनों ही मुल्क न्यूक्लियर पावर से लैस है, इसलिए कई पश्चिमी ताकतें और यूएन संयम बरतने की नसीहत दे रहे है। इन सबके बीच भले ही बीजिंग तनाव कम करने की अपील कर रहा हो लेकिन वो इस्लामाबाद के खेमे में खड़ा दिखाई दे रहा है। CPEC और पाक में भारी निवेश के चलते उसे पाकिस्तानी हुक्मरानों की बात सुननी और माननी पड़ रही है, अंदरखाने वो उन्हें हर मुमकिन मदद का भी भरोसा दे रहा होगा। चीन दक्षिण एशिया समेत दुनिया में अपनी बादशाहत कायम करना चाहता है, नई दिल्ली की बढ़ती आर्थिक रफ्तार उसे कचोटती है। ऐसे में भारत को विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह में रोड़े अटकाने का कोई भी मौका ड्रैगन नहीं छोड़ना चाहता। साफ है कि तनाव बढ़ने के साथ चीन असीम मुनीर को जंगी इमदाद देने से नहीं चूकेगा। चीनी सरपरस्ती और मुनीर के बयानों ने साफ कर दिया है कि पाकिस्तान के रिश्ते लंबे समय तक नई दिल्ली के साथ तालुक्कात तनावपूर्ण ही बने रहेगें।
पूर्व सैन्य जनरलों के नक्शे कदम पर असीम मुनीर
बीते अप्रैल महीने में इस्लामाबाद में हुए ओवरसीज़ पाकिस्तानी सम्मेलन और मिलिट्री एकेडमी के कार्यक्रम के दौरान असीम मुनीर की तकरीरों में द्वि-राष्ट्र के सिद्धांतों का जिक्र किया गया। उन्होनें जोर देकर कहा कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौम है। जो कि किसी भी सूरत में एक नहीं हो सकती, जिन्हें अलग मुल्कों की दरकार है। इसी सोच ने पाकिस्तान की नींव रखी। साफ है कि मुनीर अपने पाले में उन कट्टरपंथी ताकतों को भी लेना चाह रहे है, जो कि हिंदुस्तानी सरजमीं पर दबी छिपी हुई है। इस जमात के हौंसलों को उभारने के लिए पहलगाम हमला करवाया गया। जहां मज़हब पूछकर सैलानियों को मार दिया गया। इसी सोच पर पाकिस्तान का पूरा वजूद टिका हुआ है। इतिहास गवाह है कि जनरल टिक्का खान, जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक, जनरल परवेज़ मुशर्रफ, जनरल अशफाक परवेज़ कयानी और जनरल राहील शरीफ़ इसी सोच के मुतमईन थे। आमतौर पर वो इस राह पर चलते थे। जब अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी का दबाव बढ़ता तो इन लोगों ने कदम पीछे खींचने से गुरेज नहीं किया। मौजूदा हालातों में असीम मुनीर कदम पीछे ना खींचते हुए इसी सोच के साथ अड़े हुए है। दूसरी ओर पाकिस्तानी सिपहसालार अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अपील कर रहे है कि असीम मुनीर के बयानों और पहलगाम हमले को जोड़कर ना देखा जाए।
हार और नाकामी से पाक सेना प्रमुख का पुराना रिश्ता
बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान भी असीम मुनीर को ऐसे ही तनाव का सामना करना पड़ा था, उस वक्त वो इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस के महानिदेशक थे। भारतीय वायुसेना के बेमिसाल एरियल अटैक के बाद रावलपिंडी थर्रा उठा था। मुनीर की काबिलियत पर सवालिया निशान लगने लगे थे, भारी दबाव के बीच तत्कालीन प्रधान मंत्री इमरान खान ने उनका ओहदा छीन लिया था। साथ ही इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस एजेंसी की नाकामी को लेकर भी भारी किरकिरी हुई थी। इमरान खान मुनीर की नाकाबिलियत से वाकिफ थे, यहीं वज़ह रही कि जब उन्हें सेना प्रमुख बनाया जा रहा था तो इमरान ने उनकी मजम्मत की। इमरान खान को बड़ी ही सफाई से साइड लाइन करते हुए मुनीर पाकिस्तानी सेना प्रमुख के तख्त पर बैठे। साफ है कि वो अपनी नाकामयाबियों और नाकाबिलियत पर पर्दा डालने के लिए नई दिल्ली से उलझने के लिए बेकरार दिख रहे है।
अंदरूनी क्लेश और कलह में घिरता पाकिस्तान
सीज फायर कर जिन राहों पर पाकिस्तानी सेना आगे बढ़ती दिख रही है, उससे साफ है कि उनका मुल्क कई स्तरों पर पेचीदियां झेलेगा। सिंधु जल संधि का निलंबन, पाकिस्तानियों के रद्द होते वीज़ा, कारोबारी बंदी, अटारी सीमा पर बंद होती आवाज़ाही, भारतीय सेना को मिली ऑप्रेशनल छूट और अरब सागर में हुए मिसाइल परीक्षण से इस्लामाबाद की पेशानी पर बल पड़ गए है। खुद पाकिस्तानी सेना दोफाड़ होने के हालातों की ओर बढ़ रही है। पड़ोसी मुल्क से खबरें छनकर सामने आ रही है कि मुनीर ने झल्लाहट में कई सैन्य अधिकारियों से इस्तीफा मांगा। जंगी हालातों को भांपते हुए मुनीर ने अपने परिवार को विदेश रवाना कर दिया। हालात इस कदर नाज़ुक बन चुके है कि असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच तनातनी की खबरें गर्म है। ऐसे में तख्तापलट की आशंकाओं को भी नहीं नकारा जा सकता। तल्खियां इतनी बढ़ चुकी है कि शहबाज शरीफ की रजामंदी के बगैर मुनीर ने आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद असीम मलिक को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना दिया। दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि असीम मुनीर ने अपना सेनाध्यक्ष पद का कार्यकाल बढ़वाने के लिए और इस्लामाबाद पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पहलगाम हमला करवाया। साफ है कि मुनीर कश्मीर केंद्रित और धार्मिक कट्टरता वाले मॉकटेल का इस्तेमाल करना चाह रहे है, जो कि उनके पूर्ववर्ती जनरल परवेज मुशर्रफ का आजमाया हुआ नुस्खा है। इसी वज़ह से अब वो साख संकट से जूझ रहे है, ये पाकिस्तान में अस्थिरता और युद्ध के हालातों को बढ़ा रहा है। इससे बचने का यही तरीका है कि वो नेकनीयती दिखाए और पहलगाम के आरोपियों का प्रत्यर्पण नई दिल्ली को कर दे। साथ ही भविष्य में भारत के खिलाफ अपनी जमीन का इस्तेमाल आंतकियों को ना करने दे। इसके लिए उसे संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ काम करना होगा, लेकिन इसकी उम्मीद बेहद कम है।
डिस्क्लेमर: इस लेख के लेखक राम अजोर जो वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं और लेख में व्यक्ति विचार उनके निजी है जिसके लिए टाइम्स नाउ नवभारत उत्तरदायी नहीं है।)
