एक मशहूर कहावत है कि 'इस्लामाबाद का हर फैसला रावलपिंडी से होकर गुजरता है।' इसका सीधा मतलब है कि पाकिस्तानी सेना की इजाजत के बिना वहां की सरकार कोई भी अहम फैसला लेने की जुर्रत नहीं कर सकती। मौजूदा हालात को ही देख लीजिए, शायद ही कोई ऐसा मुल्क होगा जहां प्रधानमंत्री के साथ उस देश का आर्मी चीफ (फील्ड मार्शल) साये की तरह घूमता हो। शहबाज शरीफ सरकार में जनरल आसिम मुनीर (Asim Munir) को 'सुप्रीम पावर' मिल चुकी है।
Asim Munir: पढ़ें कैसे आसिम मुनीर के हर फैसले पाकिस्तान को बर्बादी की ओर धकेल रहा है। AI IMAGE
आसिम मुनीर खुद में एक 'संसद' बन चुके हैं। उनकी हैसियत न केवल राष्ट्रपति से ज्यादा है, बल्कि देश का संविधान भी उनके आगे बौना नजर आता है। रही-सही कसर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पूरी कर दी, जिन्होंने पहले मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच कराया और फिर 'इस्लामाबाद वार्ता' के बाद उनकी तारीफ भी की।
हालांकि, खुद को पाकिस्तान का 'मसीहा' समझने वाले मुनीर का रिपोर्ट कार्ड कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। मुनीर को हर कदम पर नाकामी ही मिल रही है। आइए जानते हैं कि कैसे उनके फैसले पाकिस्तान को अंधेरे की ओर धकेल रहे हैं।
'तानाशाह' बनता जा रहा मुनीर
दुनिया आसिम मुनीर को 'मुल्ला मुनीर' के नाम से भी पुकारती है, क्योंकि वह अपने भाषणों में अक्सर इस्लाम की दुहाई देते हैं। वह पूर्व सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक की नकल करते नजर आते हैं। कश्मीर को पाकिस्तान की 'गले की नस' बताने वाले मुनीर ने अब तक भले ही औपचारिक तख्तापलट न किया हो, लेकिन देश में 'अघोषित मार्शल लॉ' जरूर लागू कर रखा है।
आज पाकिस्तान में इंटरनेट शटडाउन और मीडिया सेंसरशिप के माध्यम से असहमति की आवाज को दबाना और सेना की आलोचना करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाना आम बात हो चुकी है। वहीं, वह आतंकियों के जरिए कश्मीर में अस्थिरता फैलाने के पुराने मंसूबों में भी जुटे हैं। पाकिस्तान की जनता मुनीर से त्रस्त हो चुकी है, लेकिन वहां सेना के खिलाफ बोलने की सजा सीधे मौत है।
अफगानिस्तान और ईरान के साथ पाकिस्तान के बिगड़े रिश्ते
मुनीर की 'अफगानिस्तान पॉलिसी' पूरी तरह फेल रही है। तालिबान शासन को नियंत्रित करने की कोशिश में पाकिस्तान ने अपनी सीमा पर युद्ध जैसे हालात पैदा कर लिए हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के खिलाफ अफगानिस्तान का सहयोग न मिलना मुनीर की सबसे बड़ी रणनीतिक हार है। दूसरी ओर, ईरान के साथ सैन्य झड़पों के बाद हुई 'इस्लामाबाद वार्ता' और कूटनीतिक प्रयास अब ठंडे बस्ते में हैं। ईरान को मनाने और क्षेत्रीय सुरक्षा में भरोसेमंद साथी बनाने में जनरल मुनीर पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
ऑपरेशन 'अज्म-ए-इस्तेहकाम' की नाकामी
आतंकवाद को जड़ से मिटाने के लिए जून 2024 में बड़े जोर-शोर से 'ऑपरेशन अज़्म-ए-इस्तेहकाम' शुरू किया गया था। लेकिन भारी बजट और सैन्य ताकत के बावजूद टीटीपी (TTP) और बलूच विद्रोहियों के हमले कम होने के बजाय बढ़ गए हैं।
'ऑपरेशन सिंदूर' ने तोड़ दी पाक सेना की कमर
वहीं, 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पाकिस्तान की सेना न तो अपनी चौकियों को बचा पा रही है और न ही खुफिया जानकारी जुटाने में सफल रही। भारतीय सेना ने सबूत के साथ दुनिया को बताया कि किस तरह सैन्य ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तानी सेना को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा। वहीं, पाकिस्तानी मीडिया ने सैन्य कार्रवाई को लेकर कई दावे किए, जिसमें भारतीय सेना को नुकसान पहुंचाने की बात कही गई। हालांकि, हकीकत यह है कि यह ऑपरेशन केवल एक 'इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर' और प्रोपेगेंडा का हिस्सा बनकर रह गया।
बलूचिस्तान में भड़कता विद्रोह
बलूचिस्तान अब पाकिस्तान के हाथ से निकलता महसूस हो रहा है। मुनीर के कार्यकाल में 'बलूच लिबरेशन आर्मी' (BLA) ने अपने हमलों की धार तेज कर दी है। सेना की 'जबरन गायब करने' वाली दमनकारी नीति ने स्थानीय जनता में इतना आक्रोश भर दिया है कि अलगाववाद की आग और भड़क गई है।
चीन पर संपूर्ण निर्भरता
पाकिस्तान की संप्रभुता का दावा करने वाली सेना आज आर्थिक मदद के लिए पूरी तरह बीजिंग पर निर्भर है। सी-पेक (CPEC) की सुस्त रफ्तार और चीनी नागरिकों पर पाकिस्तान में लगातार हो रहे हमलों ने चीन को नाराज कर दिया है। मुनीर की नीति अब केवल चीन को खुश रखने और कर्ज की किश्तें चुकाने तक सिमट कर रह गई है, जिससे पाकिस्तान की वैश्विक साख एक 'क्लाइंट स्टेट' जैसी हो गई है।
'इस्लामिक नाटो' का टूटा सपना
मुनीर ने मुस्लिम देशों के बीच अपनी धाक जमाने और एक 'इस्लामिक नाटो' जैसा गठबंधन बनाने का जो सपना देखा था, वह पूरी तरह बिखर चुका है। सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देश अब पाकिस्तान की सैन्य मदद के बजाय भारत के साथ आर्थिक रिश्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं। रणनीतिक रूप से मुनीर ने पाकिस्तान को मुस्लिम जगत में भी अलग-थलग कर दिया है।
कुल मिलाकर, चाहे आतंकवाद के खिलाफ जंग हो, पड़ोसियों के साथ शांति वार्ता हो, या देश की गिरती अर्थव्यवस्था, जनरल आसिम मुनीर का रिपोर्ट कार्ड 'फेल' के टैग से भरा हुआ है। सेना की राजनीतिक भूख और गलत रणनीतियों ने पाकिस्तान को एक ऐसी गहरी खाई में धकेल दिया है, जहाँ से वापसी का रास्ता फिलहाल नजर नहीं आता।
