Bihar Politics: बिहार की सियासी उठापटक से लालू यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की टेंशन में सबसे ज्यादा इजाफा होना लाजमी है। दरअसल, नीतीश ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राजद और कांग्रेस का साथ छोड़कर महागठबंधन को अधर में छोड़ दिया। विधानसभा में 79 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद लालू यादव एक बार फिर कुछ भी नहीं कर सके। बिहार की सरकार से उनकी पार्टी का अलग होना ही सिर्फ लालू की चिंता नहीं है, बल्कि लालू और तेजस्वी के जेहन में एक डर पनप रहा है।
नीतीश ने लालू को दिया गच्चा, अब आरजेडी का क्या होगा?
लोकसभा चुनाव में लालू यादव की आरजेडी का क्या होगा?
लालू यादव और उनकी पार्टी को नीतीश ने सिर्फ झटका ही नहीं दिया, बल्कि उनका खौफ भी बढ़ा दिया, लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जो तस्वीर देखने को मिली थी, कहीं लालू को 2024 में भी ऐसी ही हार न झेलनी पड़ जाए। पिछले आम चुनावों 2019 में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का खाता तक नहीं खुल पाया था। हालांकि इसके बावजूद 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में वो सूबे की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। अब नीतीश कुमार ने फिर पलटी मार ली है, चुनाव का समीकरण बदलना लाजमी है।
क्या फिर लालू यादव की पार्टी आरजेडी का नहीं खुलेगा खाता?
लालू यादव की सबसे बड़ी चिंता यही है कि भाजपा और नीतीश जब मिलकर लोकसभा चुनाव में ताल ठोकेंगे, तो उनके अरमानों का जनाजा निकल सकता है। 2019 में इसकी एक झलक देखने को मिली थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की तुलना में और मजबूत नजर आ सकती है। इसकी वजह है राम मंदिर, कर्पूरी ठाकुर, जम्मू कश्मीर का मुद्दा... ऐसे कई मुद्दे हैं जिन्हें भाजपा इन चुनाव में जमकर भुनाएगी। 2019 में सरकार बनते ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खात्मा हुआ। राम मंदिर जैसे वादों को भाजपा ने पूरा किया और बिहार के कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा करते ही नीतीश ने पाला बदल लिया।
कैसे रहे 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे, समझें गणित
याद दिला दें कि पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों में आरजेडी का खाता तक नहीं खुल पाया था। बिहार की 40 सीटों पर हुए पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा का बोलबाला रहा है। 2014 के चुनावी नतीजों में भाजपा ने अकेले 22 सीटें हासिल की थी, जबकि एनडीए गठबंधन ने 31 सीटें जीती थीं। हालांकि अगर 2019 के चुनावी नतीजों का जिक्र किया जाए तो 2014 की तुलना में भाजपा को 5 सीटों का नुकसान झेलना पड़ा था, मगर एनडीए गठबंधन ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर अपना कब्जा जमाया था।
नीतीश के पलटीमार ट्रैक रिकॉर्ड के चलते छवि पर पड़ा असर
कभी एनडीए, कभी महागठबंधन, तो कभी INDIA... बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कब सियासी फायदे की खातिर पलटी मार लेंगे, इसका अंदाजा लगा पाना भी बिल्कुल वैसा ही है, जैसे रेत के मैदान में एक सुई को ढूंढना। लंबे वक्त तक भाजपा के साथ गठबंधन में रहने वाले नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को पानी पी-पीकर कोसा था, इसके बाद लालू की पार्टी के साथ मिलकर वो बिहार में सरकार बनाते हैं, मुख्यमंत्री बनते हैं और देखते ही देखते एक बार फिर लालू से पीछा छुड़ाकर भाजपा को गले लगा लेते हैं। 2019 का आम चुनाव एनडीए में रहते हुए लड़ते हैं। फिर 2020 का विधानसभा चुनाव भी साथ में लड़ते हैं, जिसमें उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, बावजूद इसके वो फिर से सीएम बनते हैं। मगर न जाने क्यों, नीतीश कुमार ने पलटी मार ली और फिर से लालू के साथ चले गए। अब एक फिर सीएम नीतीश ने साल 2017 वाला पलटीमार कांड दोहराया और उसी अंदाज मे लालू का साथ छोड़ भाजपा के साथ चले गए।
लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे
| गठबंधन | पार्टी | सीटें |
| एनडीए | भारतीय जनता पार्टी | 22 |
| एनडीए | लोक जनशक्ति पार्टी | 6 |
| एनडीए | राष्ट्रीय लोक समता पार्टी | 3 |
| यूपीए | राष्ट्रीय जनता दल | 4 |
| यूपीए | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 2 |
| जनता दल यूनाइटेड | जद(यू) | 2 |
| कोई नहीं | निर्दलीय | 2 |
लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे
| गठबंधन | पार्टी | सीटें |
| एनडीए | भारतीय जनता पार्टी | 17 |
| एनडीए | जदयू जनता दल यूनाइटेड | 16 |
| एनडीए | लोक जनशक्ति पार्टी | 6 |
| महागठबंधन | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 1 |
| महागठबंधन | राष्ट्रीय जनता दल | 0 |
| महागठबंधन | राष्ट्रीय लोक समता पार्टी | 0 |
भाजपा भी समझती है नीतीश कुमार की अहमियत
इस बार भाजपा के पास खुला मैदान था, जो नीतीश-लालू-कांग्रेस के साथ आमने सामने की लड़ाई लड़ती। मगर भाजपा को ये बात अच्छे से समझ आ रहा था कि अगर ऐसा होता है तो सबसे बड़ा नुकसान बिहार में झेलना पड़ सकता है। यहां जातीय समीकरण का बोलबाला है और लालू-नीतीश की जोड़ी को मात दे पाना शायद भाजपा के लिए मामूली बात नहीं होगी। इसी लिए बिहार में भाजपा इस कोशिश में लगी थी नीतीश कुमार को अपने साथ लाया जाए। भाजपा को इस बात का एहसास था कि अगर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद बिहार में एकसाथ चुनाव लड़ते हैं, तो साल 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर 2024 के चुनाव में दिख सकता है। आपको याद दिला दें कि 2015 के नतीजों में आरजेडी को 80 सीटें, जदयू को 69 और भाजपा को सिर्फ 59 सीटें मिली थीं।
लालू का ख्वाब अब चकनाचूर हो गया है, लालू और नीतीश अगर एकसाथ मिलकर चुनाव लड़ते तो भाजपा को बिहार में बड़ी शिकस्त झेलनी पड़ सकती थी, मगर अब हार का डर लालू की आरजेडी को सता रहा है। कांग्रेस का क्या है उसने सिर्फ एक सीट जीती थी, वो भी हाथ से खिसक जाएगी तो शायद राहुल गांधी को फर्क ना पड़े, लेकिन लगातार दो चुनावों में आरजेडी का खाता नहीं खुलता लालू के लिए टेंशन की बात होगी।
