Bihar Politics: नीतीश कुमार ने ये तो साफ कर दिया है कि वो इस बार भी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भाजपा के साथ मिलकर ही मैदान में उतरेंगे। उन्होंने हाल ही में पीएम मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़े थे। जिससे सियासी गलियारों में मोदी-नीतीश की जुगलबंदी के चर्चे होने लगे। पीएम मोदी के बिहार दौरे को बीते जुमा-जुमा चार दिन भी नहीं हुए, नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल में 7 भाजपा नेताओं को शामिल कर लिया। अब ये नीतीश कुमार की मजबूरी थी या फिर उनके लिए ऐसा करता जरूरी था?
बिहार चुनाव से पहले नीतीश कुमार का मास्टरस्ट्रोक?
नीतीश कुमार के लिए जरूरी या उनकी मजबूरी?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार को अपनी मंत्रिपरिषद में सात नये चेहरों को शामिल किया। ये सभी गठबंधन सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से हैं। इसके साथ ही मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या 36 हो गई है। बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीट हैं। नियमों के अनुसार कुल सीट का 15 प्रतिशत ही मंत्री हो सकते हैं। इस लिहाज से राज्य मंत्रिपरिषद में 36 सदस्य ही हो सकते हैं। राजभवन में आयोजित एक समारोह में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने मंत्रियों को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई। आपको समझाते हैं कि आखिर नीतीश कुमार के लिए चुनाव से पहले मंत्रिमंडल विस्तार करना और उसमें भाजपा को अहमियत देना जरूरी है या उनकी मजबूरी है।
बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। नीतीश कुमार को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या वो चुनाव से पहले फिर पलटी मारेंगे और लालू खेमे से समझौता कर लेंगे? हालांकि नीतीश बार-बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि वो इस बाद नहीं पलटने वाले हैं। ऐसे में नीतीश कुमार ने भाजपा के सात विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह देकर ये संदेश देने की कोशिश की है कि उनका गठबंधन मजबूत और टिकाऊ है। कहीं न कहीं भाजपा को तवज्जो देना नीतीश की मजबूरी भी है और उनके लिए जरूरी भी है।
नीतीश कुमार के पास क्या-क्या है विकल्प?
पहला विकल्प और सबसे सुरक्षित विकल्प यही है कि नीतीश भाजपा के साथ गठबंधन में टिके रहे। भाजपा ने पहले ही ये ऐलान कर दिया है कि बिहार में भाजपा नीतीश के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी। यदि भाजपा के साथ सीट शेयरिंग को लेकर जेडीयू संतुष्ट नहीं होती है तो, सीएम नीतीश के पास दूसरा विकल्प है कि वो अकेले चुनाव लड़ें। हालांकि नीतीश ने ऐसा करके देख लिया है, ऐसी कम ही संभावना है कि वो बहुमत हासिल कर पाए। तीसरा विकल्प ये है कि वो एक बार फिर से लालू के महागठबंधन में शामिल हो जाए। हालांकि इस बार इस बात की उम्मीद कम ही होगी कि नीतीश को बतौर मुख्यमंत्री राजद और कांग्रेस स्वीकार करे। वैसे बिहार की सियासत में कब क्या होने वाला है इसके बारे में कोई नहीं जानता।
मंत्रिपरिषद में इन सात नये चेहरों को किया शामिल
जिन विधायकों को मंत्री बनाया गया है उनमें जिबेश कुमार, संजय सरावगी, सुनील कुमार, राजू कुमार सिंह, मोती लाल प्रसाद, विजय कुमार मंडल और कृष्ण कुमार मंटू शामिल हैं। बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने हैं। नये मंत्रियों में शामिल जिबेश कुमार अगस्त 2022 तक राज्य मंत्रिपरिषद के सदस्य थे, जब मुख्यमंत्री कुमार ने यह आरोप लगाते हुए अचानक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) छोड़ दिया था कि भाजपा उनके नेतृत्व वाले जनता दल (यूनाईटेड) को ‘तोड़ने’ की कोशिश कर रही है।
दरभंगा से पांचवीं बार विधायक बने संजय सरावगी और बिहारशरीफ का प्रतिनिधित्व करने वाले सुनील कुमार को भी मंत्री बनाया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गढ़ कहे जाने वाले नालंदा जिले के बिहारशरीफ से वह तीन बार जद(यू) के टिकट पर चुने गए। वह 2015 में भाजपा में शामिल हो गए थे। मुजफ्फरपुर जिले की साहेबगंज सीट से विधायक राजू कुमार सिंह को भी मंत्री पद से नवाजा गया है। वह भी पहले जद (यू) में थे। उन्होंने 2020 के विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी के नेतत्व वाली विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के टिकट पर जीत दर्ज की थी।
इस चुनाव में वीआईपी ने कुल मिलाकर तीन सीट जीती थीं। दो साल पहले उस समय इसके सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे, जब सहनी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया था। कुमार की मंत्रिपरिषद में शामिल किए गए नेताओं में एक और उल्लेखनीय चेहरा सारण जिले के अमनौर के विधायक कृष्ण कुमार मंटू का है। हाल ही में उन्होंने पटना में ‘कुर्मी चेतना रैली’ आयोजित की थी, जिसका उद्देश्य इस ओबीसी समुदाय में भाजपा की पैठ बढ़ाने की थी। नीतीश कुमार खुद कुर्मी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।
एक दिन पहले ही भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने की थी बैठक
मंत्रिपरिषद में शामिल किए गए दो अन्य चेहरों में अररिया जिले के सिकटी से विधायक विजय कुमार मंडल और सीतामढ़ी के रीगा से विधायक मोती लाल प्रसाद शामिल हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मंत्रिपरिषद के विस्तार में जातिगत समीकरण के साथ ही भाजपा के राजनीतिक समर्थन के आधार वाले क्षेत्रों पर भी खासा ध्यान दिया गया है। ज्ञात हो कि एक दिन पहले ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा ने पटना में पार्टी के कोर समूह के नेताओं के साथ बैठक की थी।
नए मंत्रियों में से दो, जिबेश कुमार (भूमिहार) और राजू कुमार सिंह (राजपूत) उच्च जातियों से हैं, जो बिहार में आबादी का 10 प्रतिशत से अधिक हैं, लेकिन दशकों से भाजपा के सबसे वफादार मतदाता रहे हैं। इसके अलावा, सुनील कुमार को छोड़कर सभी गंगा के उत्तर क्षेत्र से आते हैं। इस क्षेत्र में राजग के मुकाबले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) कांग्रेस और वाम दलों के गठबंधन का प्रदर्शन बेहतर रहा है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने दिया इस्तीफा
मंत्रिपरिषद में नये चेहरों को ऐसे दिन शामिल किया गया जब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और पूर्व राजस्व मंत्री दिलीप जायसवाल ने पार्टी की ‘एक व्यक्ति, एक पद’ की नीति का हवाला देते हुए मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। जायसवाल को पिछले साल जनवरी में जद(यू) अध्यक्ष नीतीश कुमार के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल होने के बाद गठित नये मंत्रिमंडल में राजस्व और भूमि सुधार विभाग का प्रभार प्रदान किया गया था। जायसवाल जुलाई, 2024 में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के स्थान पर भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष बनाये गये थे।
