Uttar Pradesh Election 2027: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए सियासी पारा गर्म हो चुका है। अपने वोटों के समीकरण के हिसाब से राजनीतिक दल दांव चलने लगे हैं। जातिगत एवं सामाजिक समीकरण साधे जा रहे हैं। चुनावी तैयारियों के मौसम में यूपी में अंग्रेजी के तीन अक्षरों की चर्चा खूब है। ये तीन अक्षर हैं- P, D और A यानी कि पीडीए। चुनावी जीत के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पीडीए फॉर्मूला पेश किया है। सूबे की सियासत में यह नारा खूब उछला है। आज इन्हीं तीन अक्षरों की परिभाषा को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में जंग छिड़ी है। एक तरफ़ PDA का मतलब है 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक'। दूसरी तरफ से एक नया मतलब आता है, और वह इतना तीखा है कि जवाब में 'पागल' शब्द तक इस्तेमाल हो जाता है।
अखिलेश ने नारा दिया-'PDA NDA को हराएगा'
तो सवाल यह है कि 2027 के चुनाव से पहले एक शब्द के मायने पर इतना घमासान क्यों? आखिर तक बने रहिए, क्योंकि इसके पीछे उत्तर प्रदेश का पूरा जातीय गणित छुपा है। PDA है क्या, और आया कहां से, इसे शुरुआत से समझते हैं। जून 2023 में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने PDA का नारा दिया: पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक। मकसद साफ था। SP की पहचान लंबे समय से मुख्य रूप से यादव और मुस्लिम समीकरण से जुड़ी रही है। PDA के जरिए उस दायरे को पिछड़ी जातियों के बड़े हिस्से और दलितों तक फैलाने की कोशिश हुई। 2023 में ही उन्होंने नारा दिया, 'PDA NDA को हराएगा'। और 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजे इस रणनीति की सबसे बड़ी दलील बन गए। सपा को राज्य की 80 में से 37 सीटें मिलीं, जबकि BJP 33 पर सिमटी।
PDA- 'पेशेंस, डिसिप्लिन, एक्शन'
अब 2027 विधानसभा चुनाव नजदीक है। इसलिए PDA फिर से केंद्र में है। 29 अगस्त को अखिलेश यादव ने X पर PDA की नई परिभाषा दी और इसे 'पेशेंस, डिसिप्लिन, एक्शन' यानी धैर्य, अनुशासन और कार्रवाई के रूप में पेश किया। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि लोग खुद PDA की अलग-अलग सकारात्मक परिभाषाए गढ़ रहे हैं, और इससे सामाजिक एकता बनेगी। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि इस दायरे में 'पीड़ित पंडितों' को जोड़ने का संकेत था, यानी सवर्ण वोटरों तक पहुंच की कोशिश। सपा सुप्रीमो की इस नई परिभाषा पर तंज कसने में भाजपा ने देरी नहीं की। BJP के उत्तर प्रदेश के प्रभारी विनोद तावड़े ने PDA की एक अलग व्याख्या की। उन्होंने पीडीए का मतलब 'पराया धन अपना' बताया। यह सीधा इशारा था कि सपा दूसरों की संपत्ति को अपना बना लेती है।
Akhilesh yadav
अखिलेश ने शरू की पीडीए रथ यात्रा
इसके बाद अखिलेश का पलटवार आया। PTI के अनुसार अखिलेश यादव ने तावड़े को 'पागल' कहा। उन्होंने यह भी कहा कि BJP से बेहतर कौन जानता है कि 'दूसरों का धन अपना' कैसे बनाया जाता है। साथ ही उन्होंने PDA को 'प्रगतिशील और सकारात्मक लोगों का गठबंधन' बताया, और कहा कि 'पीड़ित, दुखी और अपमानित' लोग PDA में साझा पीड़ा के धागे से जुड़ेंगे। यह ध्यान देने वाली बात है कि बीते 24 सितंबर को अखिलेश ने 'PDA रथ यात्रा' शुरू की, लखनऊ से रायबरेली तक। रिपोर्टों में कहा गया है कि सपा अध्यक्ष का लक्ष्य हर विधानसभा सीट पर पार्टी के वोट में 27,000 वोट जोड़ना।
सपा के दायरे को बढ़ाता है PDA
इसी दौरान रायबरेली में सपा के छात्र संगठन और ABVP के बीच झड़प हुई, जिस पर अखिलेश ने कहा कि PDA वर्गों का जानबूझकर अपमान हो रहा है। अब सबसे अहम सवाल। एक नारे की परिभाषा पर इतनी ऊर्जा क्यों खर्च हो रही है? तो इसका जवाब है कि राजनीति में जो शब्द को परिभाषित करता है, वह नैरेटिव तय करता है। सपा की दृष्टि से PDA को 'धैर्य, अनुशासन, कार्रवाई' या 'प्रगतिशील लोगों का गठबंधन' बताने के दो फायदे हैं। पहला, यह इसे सिर्फ जाति-आधारित लेबल से हटाकर एक समावेशी, सकारात्मक पहचान देता है, जिससे सवर्ण या तटस्थ वोटर भी खुद को जोड़ सके। दूसरा, यह BJP की उस आलोचना की धार कम करता है कि सपा सिर्फ जाति की राजनीति करती है।
यूपी की आबादी का बड़ा हिस्सा हैं पिछड़े, दलित-मुस्लिम
BJP की दृष्टि से 'पराया धन अपना' जैसी परिभाषा का मकसद है PDA को भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोपों से जोड़ना, ताकि यह सामाजिक न्याय का नारा न रहकर संदिग्ध छवि वाला ब्रांड बन जाए। यानी दोनों तरफ से एक ही काम हो रहा है- तीन अक्षरों के खाली बर्तन में अपना अर्थ भरना। PDA की ताकत इसलिए है क्योंकि उत्तर प्रदेश की आबादी में पिछड़े, दलित और मुस्लिम मिलकर बहुत बड़ा हिस्सा बनते हैं। अगर इनमें से एक बड़ा तबका एक तरफ आ जाए, तो सीटों का समीकरण बदल सकता है। 2024 इसी तर्क की मिसाल माना जाता है। पहली, 'पिछड़ा' एक इकाई नहीं है। पिछड़ी जातियों में अलग-अलग समुदाय हैं, जिनकी अपनी आकांक्षाएं और कई बार आपसी प्रतिस्पर्धा भी है। यादवों के अलावा गैर-यादव पिछड़ी जातियों को साथ जोड़ना सपा के लिए हमेशा कठिन सवाल रहा है।
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चुनावों में मुद्दे बदलते रहते हैं
दूसरी, दलित वोट के दावेदार कई हैं। इसमें दूसरी पार्टियां भी अपना दावा रखती हैं, और BJP की कल्याण योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंच भी एक अलग फैक्टर है। तीसरी, चुनाव-दर-चुनाव मुद्दे बदलते हैं। लोकसभा और विधानसभा के मतदाता का व्यवहार अक्सर अलग होता है। लोकसभा में जो काम आया, वह विधानसभा में उसी तरह दोहराया जाएगा, यह पक्का नहीं। चौथी, BJP खुद भी व्यापक हिंदू एकता और लाभार्थी राजनीति के अपने ढांचे के साथ मैदान में है, और उसका संगठन मजबूत माना जाता है। तो 27,000 वोट प्रति सीट का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, पर उसकी परीक्षा सिर्फ 2027 के नतीजे ही करेंगे। उत्तर प्रदेश लोकसभा की 80 सीटों वाला राज्य है। जो राज्य की जातीय राजनीति साध ले, राष्ट्रीय समीकरण पर उसका असर पड़ता है। इसलिए यह बहस राष्ट्रीय है।
जातीय पहचान पर लड़े जाते हैं भारत में चुनाव
विपक्षी गठबंधन में सपा की भूमिका अहम मानी जा रही है। 2023 में PDA का नारा INDIA गठबंधन के दौर में भी उछला था, और उस समय सीट-बंटवारे को लेकर कांग्रेस के साथ खींचतान की रिपोर्टें भी आईं। PDA सपा की अपनी स्वतंत्र सौदेबाजी की ताकत का प्रतीक भी है। भारत में दशकों से यह बहस चल रही है कि चुनाव जातीय पहचान पर लड़े जाते हैं या शासन और डिलीवरी पर। PDA बनाम BJP की परिभाषा वाली जंग इसी बहस का नया रूप है। 'पागल' जैसे शब्द और पलटकर तीखी परिभाषाएं हमें यह भी दिखाती हैं कि चुनावी माहौल में राजनीतिक संवाद कहां पहुंच रहा है। एक जागरूक मतदाता के तौर पर हमें मुद्दों को शब्दों की गर्मी से अलग करके देखना चाहिए। कुल मिलाकर PDA की यह लड़ाई असल में एक बड़े सवाल की है। सवाल है कि उत्तर प्रदेश का मतदाता अपनी पहचान से वोट देगा, या अपने अनुभव से? इसका जवाब 2027 देगा।
