Ukraine Drone Attack On Russia : बीते रविवार को यूक्रेन ने रूस के भीतर जिस तरह से ड्रोन हमला किया, उससे दुनिया दंग रह गई। सेक्युरिटी सर्विस ऑफ यूक्रेन (SBU) का दावा है कि उसने रूस के खिलाफ 'ऑपरेशन स्पाइडर वेब' लॉन्च किया और उसके एयरबेस पर हमले किए। इन हमलों में उसने रूस के 40 एयरकक्राफ्ट तबाह कर दिए। हलांकि, रूस ने अपने एयरबेस पर हमले की बात तो मानी है लेकिन उसके कितने लड़ाकू जहाज और बमवर्षक विमानों का नुकसान पहुंचा, इसकी संख्या नहीं बताई है। एसबीयू का दावा है कि उसके इस ड्रोन हमले में ए-50 सर्विलांस प्लेन, सुपरसोनिक टीयू-160, टीयू-22 बॉम्बर्स और टीयू-95 बमवर्षकों को नुकसान पहुंचा। रूस के ये स्ट्रेटेजिक एवं टैक्टिकल वेपन हैं जिन्हें परमाणु हथियार ले जाने के लिए विकसित किया गया है। जरूरत पड़ने पर इनमें क्रूज मिसाइलें भी लगाई जा सकती हैं। एसबीयू का कहना है कि इन हमलों में रूस को करीब 7 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है।
रूस आने वाले दिनों में यूक्रेन पर कर सकता है बड़ा हमला।
यूक्रेन ने दिया रूस को संदेश
जाहिर है कि रूस भी अपने भीतर इतने बड़े ड्रोन हमले की उम्मीद नहीं की होगी। उस पर यह हमला ऐसे समय हुआ है जब इस्तांबुल में सीजफायर को लेकर वार्ता होनी थी। हालांकि, ड्रोन हमले के बाद इस्तांबुल में वार्ता हुई भी लेकिन यह असफल हो गई। यूक्रेन ने 30 दिनों के भीतर बिना शर्त सीजफायर की मांग रखी जिसे रूस ने खारिज कर दिया। इस हमले के बारे में एक्सपर्ट का कहना है कि यूक्रेन ने रूस को संदेश देने की कोशिश की है। संदेश यह है कि जरूरत पड़ी तो वह रूस के अंदरूनी इलाके में हमला कर सकता है। कोई भी जगह उससे अछूती नहीं है। इरकुत्स्क के बेलाया एयरबेस पर हमला कर उसने यही संदेश दिया है।
यूक्रेन की सीमा से 4000 किलोमीटर दूर है बेलाया एयरबेस
बेलाया एयरबेस यूक्रेन की सीमा से 4000 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा मुरमांस्क के ओलेनया एयरबेस, रेजान के दयागिलेवो एयरबेस और इवानोवो एयरबेस पर ड्रोन हमले हुए। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सभी हमले रूस के भीतर से हुए। ड्रोन को ट्रकों के कंटेनर में भरकर एयरबेस के पास पहले ही पहुंचाया जा चुका था और जब यूक्रेन की तरफ से इशारा हुआ तो ड्रोन हमले शुरू हो गए। इन्हें ट्रकों में इस तरह छिपाया गया था ताकि लोगों की इस पर नजर न पड़े। सवाल है कि इन हमलों के बाद क्या रूस शांत या खामोश रहेगा। जाहिर है कि नहीं, वह इन हमलों का जवाब देगा। जवाब भी पुतिन की स्टाइल में यानी बड़ा होगा।
जेलेंस्की ने इतना बड़ा हमला क्यों किया?
एक सवाल यह भी है कि अचानक से जेलेंस्की को रूस पर इतना बड़ा हमला करने का साहस कहां से आ गया। हालांकि, दावा है कि इस गोपनीय मिशन की तैयारी उनकी देख-रेख में करीब आठ महीने से चल रही थी। फिर भी क्या जेलेंस्की को पता नहीं है कि इतने बड़े हमले की रूस की तरफ से जवाबी कार्रवाई बहुत बड़ी हो सकती है। रूस का पलटवार इतना बड़ा हो सकता है जिसे शायद यूक्रेन झेल नहीं पाए। तो इतना बड़ा जोखिम जेलेंस्की ने आखिर क्यों उठाया? जाहिर है कि इसके पीछे कोई और हो सकता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पुतिन को 'युद्धोन्मादी' बताया था।
क्या पुतिन से चिढ़ गए हैं ट्रंप?
इस बयान से पहले ट्रंप की फोन पर पुतिन से बातचीत हुई थी और ट्रंप ने दावा किया था कि सीजफायर के लिए पुतिन भी तैयार हैं। लेकिन इसी बीच, रूस ने कीव पर बड़ा हमला कर दिया। इसके बाद ट्रंप ने पुतिन को 'क्रेजी' कहा। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के समय ट्रंप ने अपनी रैलियों और टीवी बहसों में कहा था कि 20 जनवरी को राष्ट्रपति बनते ही 24 घंटे के भीतर वह रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवा देंगे लेकिन युद्ध रुका नहीं, इससे उनकी दुनिया भर में किरकिरी हो रही है। ट्रंप को लगता था कि राष्ट्रपति बन जाने के बाद पुतिन भागे-भागे उनके पास आएंगे और युद्ध रोकने के लिए अमेरिका ने जो प्लान तैयार किया है, उसे हंसते हुए स्वीकार कर लेंगे, लेकिन पुतिन न तो ट्रंप से मिलने गए और न ही ट्रंप के कहे मुताबिक काम कर रहे हैं। ऐसे में पुतिन से ट्रंप का चिढ़ना स्वभाविक है। और हो न हो रूस पर इस हमले के पीछे अमेरिका का दिमाग हो सकता है।
जंग का दायरा बढ़ने पर रूस की मदद करेगा चीन
एक्सपर्ट मान रहे हैं कि यूक्रेन के इस ड्रोन हमले का पुतिन की तरफ से जवाब दिया जाएगा। यह पलटवार इतना भारी हो सकता है कि शायद यह नाटो को भी घसीट ले। नाटो आएगा तो अमेरिका भी आएगा। फिर जंग का दायरा बढ़ जाएगा। यह बात रूस को भी पता है कि वह अकेले यूक्रेन और कुछ पश्चिमी देशों से तो टकरा और युद्ध लड़ सकता है लेकिन अकेले पूरे नाटो से लड़ना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा। वह भी तब जब वह पहले ही तीन साल से युद्ध फंसा है। ऐसे में उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन आगे आ सकता है। चीन और रूस की करीबी भारतीय हितों के लिए ठीक नहीं होगी। क्या अमेरिका, रूस और भारत के बीच दूरी बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है? यह भी एक बड़ा सवाल है। क्योंकि 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारतीय स्वदेशी हथियारों, वायु रक्षा प्रणालियों ने जो अपना दमखम और सटीकता दिखाई है, उससे हथियार निर्यात करने वाले अमेरिका सहित पश्चिमी देशों में खलबली मच गई है।
रूस-भारत की दोस्ती में दरार लाना चाहते हैं ट्रंप?
भारत इनके लिए बड़ा बाजार है। आने वाले समय में भारत ने यदि इनसे हथियार खरीदना बंद कर दिए तो इनकी हथियार बनाने वाली कंपनियों का क्या होगा? ट्रंप चाहते थे कि भारत उनका पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट एफ-35 खरीदे लेकिन भारत की तरफ से कोई रुचि नहीं दिखाई गई। इस बीच, कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि भारत, रूस से Su-57E खरीद सकता है। यह बात भी अमेरिका को परेशान कर रही होगी। ऐसे में भारत के साथ रूस की कोई बड़ी रक्षा डील न हो पाए, इसे रोकने के लिए अमेरिका में साजिश रची गई हो। यह साजिश रूस को एक बड़े युद्ध में धकेलने की हो सकती है। जाहिर है कि यूक्रेन से बाहर युद्ध का दायरा बढ़ने पर भारत शायद ही रूस की मदद उस तरीके से कर पाए जैसे चीन कर सकता है। चीन सैन्य रूप से महाशक्ति भले ही न हो लेकिन आर्थिक महाशक्ति तो है ही। संकट और मुश्किल घड़ी में वह रूस का साथ दे सकता है। इससे रूस की निर्भरता चीन पर ज्यादा बढ़ेगी और यह निर्भरता रूस और भारत के बीच एक दूरी बनाने का काम करेगी। रूस जब खुद बड़े युद्ध में फंसा रहेगा तो भारत ही नहीं किसी और देश के साथ भी वह हथियारों का सौदा नहीं कर पाएगा।
