भारत का राष्ट्रीय ध्वज 'तिरंगा' सिर्फ देश की आन-बान-शान का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और खादी की विरासत से भी जुड़ा है। लेकिन ‘हर घर तिरंगा’ अभियान से पहले सरकार ने भारतीय ध्वज संहिता (Indian Flag Code) में कई अहम बदलाव किए। आखिर फ्लैग कोड बदलने की जरूरत क्यों पड़ी, इसमें किन नियमों को बदला गया और इन बदलावों पर सवाल क्यों उठे? आइए समझते हैं पूरी कहानी।
‘हर घर तिरंगा’ के लिए क्यों बदली गई भारतीय ध्वज संहिता?
क्या है ‘हर घर तिरंगा’ अभियान?
‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरुआत वर्ष 2022 में 'आजादी का अमृत महोत्सव' के तहत की गई थी। इसका उद्देश्य लोगों को अपने घरों पर तिरंगा फहराने के लिए प्रेरित करना और स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों को याद करते हुए देशभक्ति की भावना को मजबूत करना था। सरकार चाहती थी कि तिरंगा सिर्फ सरकारी कार्यालयों या खास मौकों तक ही सीमित न रहे, बल्कि आम नागरिक भी अपने घरों पर सम्मान के साथ तिरंगा फहरा सकें। इसी व्यापक जनभागीदारी को आसान बनाने के लिए फ्लैग कोड में कई बड़े बदलाव किए गए, ताकि तिरंगा फहराने की प्रक्रिया सरल हो सके। लेकिन इन संशोधनों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस भी हुई।
Flag Code में क्या बड़ा बदलाव किया गया?
भारतीय ध्वज संहिता 2002 के मुताबिक राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा केवल हाथ से काते और बुने गए खादी, सूती या रेशमी कपड़े का ही हो सकता था। खादी के एक मानक आकार के झंडे को बनाने में लागत, समय और मेहनत तीनों ही काफी ज्यादा आती थी। 'खादी इंडिया' की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, हाथ से बने एक पारंपरिक खादी झंडे की कीमत लगभग ₹2,500 से ₹2,800 तक पहुंच जाती है। देश की 140 करोड़ आबादी के बड़े हिस्से के लिए एक झंडे पर इतने पैसे खर्च करना मुमकिन नहीं था। 30 दिसंबर 2021 को सरकार ने इन नियमों में संशोधन किए। इसके तहत मशीन से बने कपास, पॉलिएस्टर, ऊन, सिल्क और खादी से तैयार झंडे को भी अनुमति दी गई। इस बदलाव से बड़े पैमाने पर तिरंगे का उत्पादन संभव हो सका। जिससे इनकी कीमतें बेहद सस्ती (20-30 रुपये) हो गईं।
अब रात में भी फहरा सकते हैं तिरंगा
‘हर घर तिरंगा’ अभियान को और व्यापक बनाने के लिए 20 जुलाई 2022 में एक और बड़ा बदलाव किया गया। इसके तहत खुले में या किसी नागरिक के घर पर तिरंगे को दिन-रात दोनों समय फहराने की अनुमति दी गई। इससे पहले सामान्य नियम के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज को सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता था।
खादी को लेकर क्यों हुआ विवाद?
फ्लैग कोड में हुए बदलाव को लेकर सभी की राय एक जैसी नहीं रही। खादी से जुड़े लोगों और कुछ विपक्षी नेताओं ने पॉलिएस्टर और मशीन से बने कपड़े से तिरंगा बनाने की अनुमति पर सवाल उठाए। उनका तर्क था राष्ट्रीय ध्वज और खादी का संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ रहा है और मशीन से बने पॉलिएस्टर जैसे कपड़ों को अनुमति देने से तिरंगे और खादी के बीच ऐतिहासिक संबंध कमजोर हो सकता है। विपक्ष की ओर से यह आशंका भी जताई गई कि मशीन से बने झंडों के आयात से विदेशी निर्माताओं को फायदा हो सकता है।
सरकार ने बदलाव क्यों किए?
सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य तिरंगे को ज्यादा से ज्यादा नागरिकों के घर तक पहुंचाना और राष्ट्रीय ध्वज फहराने में आने वाली पाबंदियों को कम करना था। यानी ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के लिए सरकार ने दो अहम चीजों को आसान बनाया - तिरंगे का उत्पादन व उसकी उपलब्धता और उसे फहराने का समय। सीधे शब्दों में कहा जाए तो फ्लैग कोड में बदलाव इसलिए किए गए ताकि ‘हर घर तिरंगा’ केवल सरकारी अभियान बनकर न रह जाए, बल्कि बड़े पैमाने पर आम नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, खादी और स्वदेशी उत्पादन से जुड़े सवालों के कारण इन बदलावों पर बहस भी हुई।
तिरंगा खरीदना और उपलब्ध कराना कैसे आसान हुआ?
‘हर घर तिरंगा’ अभियान के दौरान सरकार ने तिरंगे की उपलब्धता को बढ़ाने के लिए डाकघरों, राज्य सरकारों, स्वयं सहायता समूहों और अन्य माध्यमों का इस्तेमाल किया। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पर भी राष्ट्रीय ध्वज उपलब्ध कराया गया। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और अन्य संस्थाओं के माध्यम से भी तिरंगे की पहुंच बढ़ाने की कोशिश की गई।
