नवाबों की नगरी लखनऊ ने साफ हवा के मामले में देश के बड़े शहरों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 (Swachh Vayu Survekshan-2026) में 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में लखनऊ ने पहला स्थान हासिल किया है। 198 अंकों के साथ लखनऊ ने इंदौर और जबलपुर को पीछे छोड़ा है।
साफ हवा में नंबर-1 बना लखनऊ (फाइल फोटो)
अपनी तेजी से बढ़ती आबादी, निर्माण कार्यों और भारी ट्रैफिक के बावजूद लखनऊ का यह शीर्ष पर पहुंचना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। अब सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदला, जिससे लखनऊ ने इंदौर और जबलपुर समेत कई शहरों को पीछे छोड़ दिया? आइए विस्तार से समझते हैं कि लखनऊ ने किन अहम कदमों और बदलावों के जरिए यह बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
कूड़ा उठाने में इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल
प्रदूषण की जड़ पर वार करने के लिए लखनऊ ने अपने परिवहन और कचरा प्रबंधन सिस्टम को लगभग पूरी तरह "ग्रीन" बना दिया है। शहर में घर-घर कचरा उठाने के लिए करीब 1,100 इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे न सिर्फ कचरा नियमित तौर पर उठ रहा है, बल्कि वाहनों से होने वाला प्रदूषण भी कम हुआ है। महापौर सुषमा खरकवाल के मुताबिक, शहर के करीब 90% डोर-टू-डोर (घर-घर) कचरा वाहन अब इलेक्ट्रिक हो चुके हैं, और बाकी बचे हुए वाहन भी अगले 6 महीनों में बदल दिए जाएंगे।
ई-बसे और चार्जिंग हब
सिर्फ कचरा उठाने वाली गाड़ियों में ही नहीं बल्कि सार्वजनिक परिवहन में भी यही बदलाव देखने को मिला है। शहर में फिलहाल 140 इलेक्ट्रिक बसें संचालित हो रही हैं। इस ट्रांजिशन को सपोर्ट करने के लिए शहर भर में 12 चार्जिंग स्टेशन बनाए गए हैं, जिनमें कुल 916 चार्जिंग पॉइंट मौजूद हैं।
सड़क की धूल पर सीधा प्रहार
सड़क से उड़ने वाली धूल और महीन कण (particulate matter) शहरों में प्रदूषण की एक बड़ी वजह मानी जाती है। इसे रोकने के लिए प्रशासन ने दो अहम चीजों पर एक साथ काम किया। नगर निगम ने सड़कों की सफाई के लिए 97 इलेक्ट्रिक मैकेनाइज्ड स्वीपिंग मशीनें तैनात की हैं। शहर में करीब 559.85 किलोमीटर सड़कों को पूरी तरह पक्का कर दिया गया, ताकि कच्ची सड़क से गुजरने वाले वाहनों के पहियों से धूल हवा में न उड़े। यानी एक तरफ सड़कों को पक्का बनाया गया, दूसरी तरफ उनकी नियमित मशीनी सफाई भी सुनिश्चित की गई। इन दोनों कदमों ने मिलकर सड़क की धूल को दोबारा हवा में उड़ने से रोकने में अहम भूमिका निभाई।
कचरे को धुआं बनने से रोका गया
खुले में कचरा जलाने से निकलने वाला धुआं हवा की गुणवत्ता को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। लखनऊ प्रशासन ने इस पर पूरी तरह अंकुश लगाया है। शहर में अब 100% म्युनिसिपल कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण (scientific processing) किया जा रहा है। इससे यह सुनिश्चित किया गया कि घरों से निकलने वाला कचरा सड़क किनारे या खाली प्लॉट में खुले में जलाया न जाए।
घनी आबादी में भी हरियाली का जुगाड़
लखनऊ जैसे तेजी से बढ़ते शहर में जगह की कमी की वजह से पारंपरिक तरीके से बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना मुश्किल होता है। इसी समस्या का हल निकालते हुए शहर ने मियावाकी पद्धति (Miyawaki Plantations) से पौधरोपण और वर्टिकल गार्डन जैसे आधुनिक तरीके अपनाए, जिससे कम जगह में भी हरा-भरा माहौल तैयार हुआ है।
मुहिम सिर्फ कागजों तक नहीं, मोहल्ले तक पहुंची
लखनऊ की इस सफलता की सबसे खास बात यह रही कि यह योजना सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सीधे वार्ड और मोहल्ले तक पहुंची। इसी का नतीजा है कि लखनऊ के जोन-4 स्थित वार्ड-70 को 30,000 से अधिक आबादी वाले शहरी वार्डों की राष्ट्रीय सूची में देश में नंबर-1 स्थान मिला। स्थानीय स्तर पर कचरा न जलाने, सड़कों को धूल-मुक्त रखने और समय पर कचरा उठाने जैसे छोटे लगने वाले कदमों ने मिलकर बड़ा असर दिखाया है।
