BRICS Summit 2026: भारत की राजधानी दिल्ली में इन दिनों विदेशी मेहमानों का तांता लगा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ तमाम राष्ट्राध्यक्ष यहां आयोजित दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं, जहां हो रही बैठकों पर दुनिया की नजर है।
पाकिस्तान को ब्रिक्स में एंट्री का इंतजार (फोटो साभार: AI)
भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहा है और इस समूह में चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात समेत अन्य देश शामिल हैं। हालांकि, इस सम्मेलन में एक ऐसा देश शामिल नहीं है, जो पिछले करीब तीन सालों से ब्रिक्स की सदस्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है। यह देश कोई और नहीं बल्कि, हमारा अपना पड़ोसी पाकिस्तान है।
इस्लामाबाद ने 2023 में ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आवेदन किया था। ऐसे में चीन और रूस जैसे देशों का उसे समर्थन भी मिला। इसके बावजूद पाकिस्तान अभी तक ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य नहीं बन पाया है।
पीआईबी के मुताबिक, ब्रिक्स की शुरुआत का विचार 2001 में सामने आया था। उस समय गोल्डमैन सैक्स द्वारा प्रकाशित ग्लोबल इकोनॉमिक्स पेपर The World Needs Better Economic BRICs में गढ़ा गया था।
कब बना ब्रिक्स?
बाद में साल 2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने मिलकर एक औपचारिक समूह बनाया। इसका मकसद उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देना है।
साल 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के साथ ब्रिक का विस्तार हुआ और उसे ब्रिक्स कहा गया। इसके बाद लगातार समूह का विस्तार होता रहा। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ब्रिक्स को नए पूर्ण सदस्यों के तौर पर शामिल किया गया, जबकि इंडोनेशिया 2025 में औपचारिक रूप से ब्रिक्स का सदस्य बना।
इन नए सदस्य देशों के शामिल होने से ब्रिक्स की भौगोलिक और आर्थिक पहुंच में उल्लेखनीय विस्तार हुआ। इस विस्तार के साथ 'पार्टनर कंट्री' (साझेदार देश) की एक नई श्रेणी भी बनाई गई। साल 2025 के दौरान 10 देश इस ढांचे में शामिल हुए। जिनमें बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं।
इसी विस्तार के दौर में अगस्त 2023 में पाकिस्तान ने भी ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आवेदन किया था और बाद में उम्मीद जताई कि रूस इस प्रक्रिया में उसकी मदद करेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही। रूस ने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान की दावेदारी का समर्थन किया। साथ ही इस्लामाबाद को अपने करीबी सहयोगी चीन का भी समर्थन प्राप्त हुआ।
कहां फंसा पेंच?
ब्रिक्स में नए सदस्य को सर्वसम्मति से शामिल किया जाता है। जिसका मतलब साफ है कि किसी नए सदस्य को शामिल होने के लिए सभी मौजूदा सदस्यों की सहमति की मंजूरी चाहिए और यही नियम पाकिस्तान के लिए मुश्किल खड़ी कर रहा है।
भारत लगातार सीमापार से आतंकवाद को लेकर सवाल उठाता रहा है। पिछले साल अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंध धरातल में चले गए। इस दौरान, भारत ने पाकिस्तान की धरती से संचालित हो रहे आतंकवाद को लेकर गंभीर आरोप लगाए और ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। जिसके तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूत किया।
BRICS से PAK को मिल सकता है रणनीतिक फायदा
अगर पाकिस्तान को ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता मिलती है, तो उसे मुख्य रूप से आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक फायदे हो सकते हैं। हालांकि, ब्रिक्स का सदस्य बनना अपने आप में आर्थिक संकट का समाधान नहीं है।
लेकिन पाकिस्तान को इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, परिवहन और विकास परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक फंडिंग के अवसर मिल सकते हैं। इसके अलावा, चीन और रूस जैसे देशों के साथ आर्थिक रिश्ते और भी ज्यादा मजबूत हो सकते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ब्रिक्स खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में पेश करता है। पाकिस्तान को सदस्यता मिलने पर वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए एक बड़ा बहुपक्षीय मंच मिलेगा।
