Congress and CJP : भारतीय राजनीति में पिछले पांच महीनों में एक अनोखी चीज उभरी है। कॉकरोच जनता पार्टी, यानी CJP। मई 2026 में एक व्यंग्य के तौर पर शुरू हुआ यह संगठन आज दिल्ली की सड़कों से लेकर संसद के गलियारों तक चर्चा में है। 14 अक्टूबर को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पहली बार खुलकर इसका समर्थन किया। इसके बाद सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस और CJP साथ आ रहे हैं, और अगर हां, तो मोदी सरकार के लिए यह कितनी बड़ी चुनौती है।
राहुल का पहला खुला समर्थन
CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका और सौरव दास को जंतर-मंतर में बिना अनुमति घुसने के आरोप में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। हिरासत से पहले दोनों ने वहां तिरंगा लहराया और नारे लगाए थे। इसी के बाद जंतर-मंतर को दिल्ली में तय प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया। राहुल गांधी ने X पर लिखा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में तिरंगा लहराना अपराध नहीं है और इसके लिए युवाओं को जेल भेजना कायरता है। उन्होंने 'छात्र, युवा, पत्रकार, INDIA गठबंधन' को अलग-अलग झंडे लेकिन एक मकसद वाला बताया और कहा, 'जंतर-मंतर वापस लेंगे।' CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने जवाब में उनका धन्यवाद किया। यह इसलिए अहम है कि मई में CJP बनने के बाद राहुल ने अब तक इससे दूरी रखी थी। NEET पेपर लीक के विरोध प्रदर्शन के वक्त पूछे जाने पर भी उन्होंने बस इतना कहा था कि सभी प्रदर्शन एक ही हैं।
अब तक दूरी क्यों थी?
कांग्रेस की हिचक के कई कारण रिपोर्ट हुए हैं। द प्रिंट की रिपोर्ट में एक कांग्रेस पदाधिकारी के हवाले से कहा गया कि कुछ महीने पहले तक दिपके राहुल गांधी की आलोचना करते रहे थे। पार्टी मानती है कि युवा आंदोलन का नेतृत्व उसे करना चाहिए, खासकर राहुल गांधी के 'छात्रों की गूंज' अभियान के जरिए। उसे यह भी चिंता थी कि CJP आगे चलकर राजनीतिक ताकत बन सकती है। जयराम रमेश ने कहा था कि कांग्रेस एक राजनीतिक दल है। यूथ कांग्रेस ने तो CJP की तर्ज पर अपनी वेबसाइट भी बना ली थी। इस बीच सपा, तृणमूल, AAP, शिवसेना (UBT), CPI, CPI(ML), RJD और DMK जैसे दल CJP के साथ खड़े दिखे। कांग्रेस अकेली बड़ी विपक्षी पार्टी थी जो आधिकारिक समर्थन से बची रही।
CJP की ताकत कहां है?
CJP का जन्म 16 मई 2026 को हुआ, जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी में बेरोजगार और सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं के लिए 'कॉकरोच' शब्द का इस्तेमाल हुआ। उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि उनका इशारा फर्जी डिग्री वाले लोगों की ओर था। लेकिन अभिजीत दिपके ने इसी शब्द को पहचान बना लिया और CJP का नारा रखा- 'बेरोजगारों और आलसियों की आवाज।' इसकी सबसे बड़ी पूंजी है डिजिटल पहुंच और तारीफ बटोरने वाली एक बड़ी जीत। विकिपीडिया के मुताबिक पहले हफ्ते में ही इंस्टाग्राम पर इसके 1.5 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर हो गए। NEET पेपर लीक पर जून से चले आंदोलन के बाद 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। 21 मई को सरकार के आदेश पर इसका X अकाउंट भारत में रोका गया। 7 जुलाई को दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे बहाल करने का आदेश दिया। अन्ना हजारे, सोनम वांगचुक और प्रशांत भूषण जैसे चेहरों ने भी समर्थन जताया। अब CJP का नया निशाना मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है। रांका के मुताबिक यह लड़ाई अब मोदी और अमित शाह तक पहुंच गई है।
कांग्रेस को क्या मिलेगा, क्या जोखिम है?
कांग्रेस के लिए फायदा साफ है। बेरोजगारी, पेपर लीक और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर उसके पास खुद युवाओं के बीच भरोसेमंद चेहरा नहीं था। CJP के पास जोश और ऑनलाइन पहुंच है, कांग्रेस के पास संगठन, संसद में मौजूदगी और राष्ट्रीय स्वीकार्यता। दोनों मिलकर सरकार के खिलाफ एक व्यापक युवा-विपक्षी नैरेटिव बना सकते हैं। लेकिन जोखिम भी हैं। CJP की साख इसी दावे पर टिकी है कि वह किसी पार्टी की पिछलग्गू नहीं है। कांग्रेस के करीब जाते ही उस पर 'विपक्ष का मोहरा' होने का आरोप गहरा सकता है। भाजपा समर्थक मंचों पर पहले ही इसे सरकार-विरोधी एजेंडा बताया जा चुका है। दूसरी तरफ़ कांग्रेस के लिए दिक्कत यह है कि CJP के घोषणापत्र में कई ऐसी बातें हैं जो किसी पारंपरिक दल के लिए निभाना मुश्किल हैं, जैसे मीडिया घरानों के लाइसेंस रद्द करना। इसके अलावा CJP चुनाव आयोग में पंजीकृत भी नहीं है, इसलिए औपचारिक गठबंधन का कोई ढांचा फिलहाल मौजूद नहीं है।
मोदी सरकार के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
भाजपा और मोदी सरकार के लिए चुनौती वास्तविक है क्योंकि सरकार को पहली बार ऐसा विरोध मिला है जिसकी भाषा Gen Z की है और जिसे पारंपरिक आरोपों से घेरना आसान नहीं। प्रधान का इस्तीफा दिखाता है कि दबाव असरदार रहा है। गिरफ्तारियों और जंतर-मंतर की पाबंदी से सरकार पर 'आवाज दबाने' का आरोप लग रहा है, और इसी में 10 अक्टूबर के प्रदर्शन पर लगी पाबंदियों को लेकर गृह सचिव और पुलिस कमिश्नर को सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी लेकिन अतिशयोक्ति से भी बचना चाहिए। संजय राउत ने दावा किया है कि सरकार छह महीने में गिर जाएगी। यह एक राजनीतिक दावा है, तथ्य नहीं। सोशल मीडिया की लोकप्रियता चुनावी वोट में बदलेगी या नहीं, इसका फिलहाल कोई प्रमाण नहीं है। विश्लेषक 2011 के अन्ना आंदोलन से तुलना करते हैं, पर वह आंदोलन भी राजनीतिक दल में ढलने के बाद अपनी चमक खो बैठा था। और राहुल का समर्थन गठबंधन की शुरुआत है, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
असली परीक्षा अगले कुछ हफ्तों में होगी
कांग्रेस और CJP के बीच नजदीकी बढ़ी है, पर यह साझा मुद्दों पर तालमेल है, गठबंधन नहीं। असली परीक्षा अगले कुछ हफ्तों में होगी: क्या कांग्रेस CJP के मंच पर सीधे दिखेगी, क्या दोनों साझा कार्यक्रम बनाएंगे, और क्या CJP अपनी स्वतंत्र पहचान बचा पाएगी। मोदी सरकार के लिए असल चुनौती CJP या कांग्रेस अकेले नहीं हैं। चुनौती वह माहौल है जिसमें बेरोजगारी और परीक्षा-गड़बड़ी जैसे मुद्दों पर युवा सड़क पर हैं और पूरा विपक्ष उनके पीछे खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में कांग्रेस और सीजेपी एक मंच आकर क्या सरकार को घेरेंगे और उसकी मश्किलें खड़ी करेंगे, यह देखने वाली बात होगी।