India Alliance: लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दोस्ती की नई शुरुआत हो गई है। इसका मजमून चंडीगढ़ में 18 जनवरी को होने जा रहे मेयर चुनाव के दौरान देखने को मिलेगा, जहां दोनों पार्टियां एक साथ मैदान में उतर रही हैं। जानकारी के मुताबिक, आप और कांग्रेस एक साथ मिलकर चंडीगढ़ का मेयर चुनाव लड़ने जा रही हैं। दिल्ली और पंजाब में लोकसभा सीट शेयरिंग से पहले इस कदम को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अरविंद केजरीवाल-मल्लिकार्जुन खड़गेे
बता दें, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दिल्ली और पंजाब में लोकसभा सीटों की शेयरिंग को लेकर बैठकों का दौर जारी है। अभी हाल ही में आप संयोजक अरविंद केजरीवाल कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पहुंचे थे। इस बैठक में राहुल गांधी भी मौजूद थे। हालांकि, इन बैठकों से इतर लगातार खबरें आ रही थीं कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस के साथ समझौता करने को तैयार नहीं हैं। अब चंडीगढ़ में पार्टियों के साथ आने से दोनों खेमों में उम्मीद बढ़ गई है।
चंडीगढ़ होगा लोकसभा का लिटमस टेस्ट
कांग्रेस नेता पवन कुमार बंसल का कहना है कि दोनों पार्टियां इस पर चर्चा कर रही थीं और यह निर्णय लिया गया कि AAP मेयर पद पर चुनाव लड़ेगी जबकि कांग्रेस शेष दो पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा, लोकसभा चुनाव बाद में आने हैं, लेकिन उससे पहले नगर निगम चुनाव आ गए हैं। हम उसी पर चर्चा कर रहे हैं और यह निर्णय लिया गया है कि आप मेयर पद के लिए चुनाव लड़ेगी और कांग्रेस वरिष्ठ उप महापौर पद के लिए चुनाव लड़ेगी।
दिल्ली और पंजाब में तय हो गया फार्मूला?
यह खबर तब सामने आई है जब दिल्ली और पंजाब में दोनों पार्टियों के बीच तकरार देखी गई थी। दरअसल, विधानसभा चुनाव का हवाला देते हुए अरविंद केजरीवाल यहां ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस इस पर राजी नहीं थी। इस बीच चंडीगढ़ में दोनों पार्टियों के साथ आने से संकेत मिलता है कि कांग्रेस और आप ने दिल्ली, पंजाब, गोवा और हरियाणा में सीट शेयरिंग का फार्मूला तलाश लिया है।
गठबंधन के अन्य दलों को संकेत
चंडीगढ़ में मेयर चुनाव के जरिए कांग्रेस और आप INDIA गठबंधन के अन्य घटक दलों को भी बड़ा संकेत देने की कोशिश करेंगी। दरअसल, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार ऐसे राज्य हैं, जहां क्षेत्रीय पार्टियों और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर मतभेद है। अब ऐसे में अन्य राज्यों में भी सुलह की उम्मीद जगेगी। इसके अलावा इससे यह भी संकेत जाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन से पहले विपक्षी गठबंधन के घटक दलों को स्थानीय चुनावों में भी आपसी समझ दिखानी होगी।
