Sudha Chandran Exclusive: टीवी दुनिया की जानी-मानी हसीना सुधा चंद्रन (Sudha Chandran ) अक्सर अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में रहती हैं। कई हिट सीरियल में काम करने के बाद सुधा चंद्रन भले ही इंडस्ट्री से गायब चल रही हैं लेकिन अब वे कमबैक के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। सुधा चंद्रन ने अपने फैंस को खुशखबरी दी कि वे माइक्रो-ड्रामा 'हिसाब बराबर' (Hisab Barabar) से एक्टिंग में लौट रही हैं। वहीं अब अपने कमबैक और ड्रामा को लेकर सुधा ने जूम टीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत की और नए किरदार को लेकर खुलासे किये। (टाइम्स नाउ नवभारत हिंदी पर ये भी पढ़ें: Exclusive: 'हुंकार' में Aneet Padda संग काम करने पर Pavleen Gujral का रिएक्शन, कहा- 'वो अब भी उतनी ही चुलबुली हैं')
हिसाब बराबर से सुधा चंद्रन का कमबैक/फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम
सुधा चंद्रन ने क्यों कहा 'हिसाब बराबर' के लिए हाँ?
सुधा चंद्रन का मानना है कि एक एक्टर को कभी भी खुद को एक्सप्लोर करना बंद नहीं करना चाहिए। उनके मुताबिक, हर जेनरेशन अपने साथ एक नया मीडियम, नई ऑडियंस और कहानी कहने का नया तरीका लेकर आती है। जब टुक-टुकी ने उन्हें ‘हिसाब बराबर’ के लिए अप्रोच किया, तो वह इतने छोटे फॉर्मेट में पूरी कहानी बताने के चैलेंज को एक्सेप्ट करने के लिए तुरंत तैयार हो गईं। सुधा कहती हैं कि आज की ऑडियंस कंटेंट को पहले से काफी अलग तरीके से देखती है। ऐसे में स्टोरीटेलिंग भी ज्यादा शार्प और फास्ट होनी चाहिए। कहानी में ऐसी कोई चीज नहीं होनी चाहिए जो सिर्फ दिखावे के लिए हो। उनके लिए ‘हिसाब बराबर’ इसी बदलते कंटेंट वर्ल्ड को करीब से समझने और उसे खुद एक्सपीरियंस करने का मौका था। उनका मानना है कि एक एक्टर के अंदर हमेशा यह क्यूरियोसिटी होनी चाहिए कि आगे क्या नया होने वाला है। (टाइम्स नाउ नवभारत हिंदी पर ये भी पढ़ें: Rise And Fall 2: प्यार में काजल राघवानी संग हुई मारपीट, रोते हुए बोलीं- बाल खींचकर, जमीन पर पटककर मारा गया)
माइक्रो ड्रामा पर बोलीं सुधा चंद्रन
टीवी और लॉन्ग-फॉर्मेट प्रोजेक्ट्स में काम करने के अपने एक्सपीरियंस को माइक्रो-ड्रामा से कंपेयर करते हुए सुधा ने बताया कि दोनों में सबसे बड़ा फर्क पेस का है। टीवी में किसी किरदार के साथ लंबे समय तक रहने का मौका मिलता है। इस दौरान एक्टर उसके कैरेक्टर के अलग-अलग शेड्स को आराम से एक्सप्लोर कर सकता है। वहीं, सिनेमा में भी किरदार को डेवलप करने और उसकी कहानी को समझने के लिए थोड़ा ज्यादा स्पेस मिलता है। लेकिन माइक्रो-ड्रामा में कहानी बहुत कम समय में पूरी करनी होती है। इसलिए यहां हर सीन और हर डायलॉग काफी मायने रखता है। गैर-जरूरी चीजों के लिए लगभग कोई जगह नहीं बचती। सुधा के लिए यही चीज माइक्रो-ड्रामा को एक्साइटिंग बनाती है। कम समय में कहानी को असरदार तरीके से ऑडियंस तक पहुंचाना एक अलग तरह का चैलेंज है, जिसे वह बतौर एक्टर एक्सप्लोर कर रही हैं।
