मर्ज की दवा देते-देते गीतकार बन गए मजरूह सुल्तानपुरी, देने लगे दिल के दर्द की दवा

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  • Updated Aug 23, 2022, 07:19 PM IST

मजरूह सुल्तानपुरी मरीजों को दवा द‍िया करता था लेकिन एक मुशायरे ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस मुशायरे ने उन्हें हिंदी सिनेमा का महान गीतकार बना दिया।

Untold story of famous lyricist Majrooh Sultanpuri: एक अक्‍टूबर 1919 को उत्‍तर प्रदेश सुल्‍तानपुर में एक पुलिस अधिकारी के यहां पैदा हुए मजरूह सुल्‍तानपुरी का उर्दू भाषा से बहुत लगाव था। वह राजपूत परिवार में पैदा हुए थे, लिहाजा खानदानी परंपरा के तहत उन्हें भी स्कूली शिक्षा से दूर रखा गया और दीनी तालीम के लिए मदरसे भेजा गया। इसके बाद वह लखनऊ आए और हिकमत (यूनानी मेडिसिन) की पढ़ाई शुरू की। पढ़ाई पूरी हुई तो वह प्रैक्टिस करने लगे और मरीजों को दवाइयां देने लगे। हालांकि कुदरत को मंजूर था कि उनकी कलम दिलों के दर्द की दवा दे। 'मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया...' जैसे शेर लिखने वाले मजरूह सुल्तानपुरी 'रहें न रहें हम....महका करेंगे...बनके कली, बनके सबा...बाग़-ए वका में...' जैसे गीत मजरूह की कलम से निकले।

मर्ज की दवा देते-देते गीतकार बन गए मजरूह सुल्तानपुरी, देने लगे दिल के दर्द की दवा

फ‍िल्‍म बुढ्ढा मिल गया का गाना 'रात अकेली एक ख्‍वाब में आई' हो, या कालिया फ‍िल्‍म का गाना 'जहां तेरी ये नजर है' हो, सीआईडी फ‍िल्‍म का गाना 'लेके पहला पहला प्‍यार' हो, या हम किसी से कम नहीं फ‍िल्‍म का गीत 'क्‍या हुआ तेरा वादा' हो, मजरूह सुल्तानपुरी ने ऐसे नगमे लिखे जो अमर हो गए। साल 1945 में मजरूह सुल्‍तानपुरी जिगर मुरादाबादी के साथ वह मुशायरे में शामिल होने मुंबई चले गए। मुशायरे में राशिद कारदार भी मौजूद थे। मजरूह साहब ने ऐसी शायरी पढ़ी कि तालियां बजने लगीं।

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