भारतीय सिनेमा के दिग्गज एक्टर असरानी साहब ने 20 अक्तूबर के दिन इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए। लगभग 5 दशक लम्बे करियर में असरानी साहब ने सैकड़ों ऐसे रोल निभाए, जिन्होंने लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट बिखेरी। फिल्म शोले में उन्होंने कालजयी रोल निभाया, जिस कारण लोग उन्हें अंग्रेजों के जमाने के जेलर बुलाते रहेंगे। असरानी साहब की खास बात ये थी कि वो अपनी कमाल की एक्टिंग से फीके से फीके सीन में जान डाल देते थे। यही कारण था कि 50 सालों तक भारतीय सिनेमा को उनकी जरूरत महसूस होती रही। असरानी ने अपने सालों लम्बे करियर में कई यादगार फिल्में की थीं लेकिन क्या आपको पता है कि उन्हें अपनी एक फिल्म पर मरते दम तक शर्मिंदगी रही। अगर उनका बस चलता तो वो ये फिल्म अपनी फिल्मॉग्राफी से हटा देते... चलिए आपको बताते हैं इस फिल्म के बारे में...
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भारतीय सिनेमा में कुछ सालों पहले एक ऐसा वक्त आया था जब हर दूसरी फिल्म में सनी लियोनी दिखती थीं। भट्ट ब्रदर्स ने सनी लियोनी को इस तरह से फिल्मों में पेश किया था कि फिल्ममेकर्स उनके साथ मूवीज बनाने के लिए तड़पने लगे थे। बॉक्स ऑफिस पर भी सनी फैक्टर खूब चल रहा था और कई फिल्मकार उनके पीछे थे। इसी दौरान सनी लियोनी ने मस्तीजादे नाम की एक फिल्म की, जिसमें तुषार कपूर और वीर दास भी थे। ये मिलाप जावेरी के द्वारा बनाई गई एक एडल्ट कॉमेडी थी, जिसने दर्शकों के बीच में काफी चर्चा बटोरी लेकिन असरानी साहब का सिर शर्मिंदगी से झुका दिया था।
असल में असरानी साहब ने जब ये फिल्म साइन की थी तब उन्हें नहीं पता था कि मेकर्स इसमें जबरदस्ती के एडल्ट जोक्स घुसेड़ेंगे। जब ये फिल्म रिलीज हुई तो असरानी साहब को बहुत बुरा लगा कि मेकर्स ने उन्हें पूरी बात नहीं बताई और वो एक ऐसी फिल्म का हिस्सा बन गए, जिसमें वल्गर जोक्स की भरमार थी। असरानी साहब ने कुछ वक्त पहले एक इंटरव्यू में कहा था, "ये बहुत ही भयावय और डरावनी फिल्म थी। मुझे अगर पता होता कि मेकर्स इसे इस तरह से पेश करेंगे तो मैं इसका हिस्सा कभी न बनता।"
इंटरव्यू में असरानी साहब ने सालों साल ह्यूमर के बदलते स्वरूप पर भी बात की और कहा "महमूद साहब ने फिल्मों में डबल मीनिंग जोक्स बोलने शुरू किए, जिन्हें ऑडियंस ने पसंद भी किया। उन्हें देखते-देखते बाकी लोगों ने भी इसी ट्रेंड को फॉलो करना शुरू कर दिया और ये सक्सेस का फॉर्मूला बन गया। महमूद साहब और उनके साथ के एक्टर्स फिर भी डबल मीनिंग जोक्स बोलते थे लेकिन अब तो बाद इतनी बढ़ गई है कि लोग कॉमेडी करने के लिए कपड़े तक उतारने लगे हैं।"
असरानी साहब को लगता था कि लोगों को हंसाने के लिए क्लीन कॉमेडी की जानी चाहिए क्योंकि भारत की ज्यादातर ऑडियंस फैमिली है। वो ऐसी फिल्मों को एक-दो बार देख जरूर सकती है लेकिन लम्बे समय तक उसे प्यार नहीं दे सकती है। असरानी साहब का मानना था कि लोगों को फैमिली ऑडियंस के लिए फिल्में बनानी चाहिए। भले ही असरानी साहब अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन हम सब जानते हैं कि ओटीटी शोज और फिल्मों में आजकल किस तरह के डायलॉग यूज हो रहे हैं। वैसे आप असरानी साहब के थॉट्स से कितने सहमत हैं, हमें कमेंट में जरूर बताएं।
