भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की बीजेपी में वापसी ने बिहार की सियासत को गरमा दिया है। राजनीतिक गलियारों में इसे 2025 विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए का बड़ा दांव माना जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह कदम पूर्व मंत्री आरके सिंह की बगावत को साधने की कोशिश है या फिर प्रशांत किशोर के भ्रष्टाचार प्रहार का जवाब?
पवन सिंह की वापसी ने बिहार चुनाव 2025 को नया मोड़ दे दिया है (फाइल फोटो: facebook)
मंगलवार को पवन सिंह, बीजेपी बिहार प्रभारी विनोद तावड़े और उपेंद्र कुशवाहा के साथ नज़र आए। इससे पहले वह आरके सिंह और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात कर चुके थे। इन बैठकों ने साफ़ कर दिया कि पवन सिंह पार्टी में अपनी दूसरी पारी शुरू करने जा रहे हैं।
क्यों अहम है पवन सिंह की एंट्री?
•इलाका असरग्रस्त: शाहाबाद–डेहरी-ऑन-सोन की 24-25 सीटें
•2020 का रिज़ल्ट: बीजेपी – 11, राजद – 10, कांग्रेस – 4
•संभावित वोट असर: 3-4% वोट ट्रांसफर की उम्मीद
•सामाजिक समीकरण: राजपूत समाज में पकड़, बगावत झेल रहे आरके सिंह का असर कम करने का प्रयास
बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक या अंदरूनी साज़िश?
बीजेपी को उम्मीद है कि पवन सिंह की स्टार पावर इन सीटों पर वोटिंग पैटर्न बदल सकती है। पार्टी का मानना है कि उनका प्रभाव हार-जीत तय करने में निर्णायक साबित होगा।हालांकि विपक्ष इस कदम को अलग तरह से देख रहा है। आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह का कहना है कि पवन सिंह की री-एंट्री असल में उपेंद्र कुशवाहा को किनारे करने की साज़िश है।
चुनावी समीकरण पर असर
•शाहाबाद + मगध क्षेत्र: बीजेपी की कमजोर कड़ी
•राजपूत वोट बैंक: पवन सिंह की पहचान से मज़बूती
•एनडीए का मक़सद: बगावत को काउंटर करना और विपक्षी नैरेटिव को तोड़ना
कुल मिलाकर, पवन सिंह की वापसी ने बिहार चुनाव 2025 को नया मोड़ दे दिया है। अब देखना होगा कि क्या भोजपुरी स्टार का जादू वोटों में तब्दील होता है और क्या वह शाहाबाद और मगध की कमजोर कड़ी को एनडीए की चुनावी ढाल में बदल पाते हैं।
