Elections 2024: एक वक्त था जब चुनावी रणभूमि में सियासी पार्टियों का चुनावी मुद्दा महंगाई, बेरोजगारी, महिला सशक्तिकरण, गरीबी, भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द रहता था। सत्ताधारी पार्टियां हो या फिर विपक्षी दल सभी ने ऐसे ज्वलनशील मुद्दों को तूल दिया, जो सामाजिक सरोकार और जनहित से जुड़ा रहता था। विकास के मॉडलों का जिक्र किया जाता था, भ्रष्टाचार को उजागर कर सरकार की आलोचनाएं होती थीं, गरीबी, बेरोजगारी के आंकड़ों को दिखाकर चुनावी मैदान में सियासी दलों में दो-दो हाथ होते थे। जनता मुद्दों के आधार पर फैसला करती थी। पर सियासत का स्वरूप अब बदल चुका है।
विपक्षी गठबंधन का सबसे बड़ा मुद्दा क्या?
गाली, आलोचना, टांग खिंचाई पर सबका ध्यान
सियासत कितनी बदल चुकी है इसका अंदाजा विपक्षी पार्टियों के गठबंधन में शामिल पार्टियों के सबसे बड़े चुनावी एजेंडे से समझा जा सकता है। चुनाव आते ही बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, जब उसे धरातल पर उतारने की बारी आती है तो मिजाज बदला-बदला नजर आने लगता है। पहले के समय में जब कोई विपक्षी पार्टी सरकार पर आरोप लगाती थी तो उसके मजबूत आधार हुआ करते थे, घोटालों के सबूत पेश किए जाते थे। मगर आज के दौर में आधारहीन इल्जाम लगाने का ट्रेंड है। गाली देकर आलोचना करना एक प्रकार का फैशन बन चुका है। बेतुकी बयानबाजी और टांग खिंचाई का सिलसिला अब आम बात हो गई है।
विपक्षी गठबंधन INDIA का सबसे बड़ा मुद्दा क्या?
लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर 28 विपक्षी दलों ने गठबंधन कर इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (INDIA) का गठन किया। इस गुट ने चार बैठकें की, जिनमें कई विषयों पर चर्चा हुई। कहा गया कि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की उपेक्षा, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, अन्याय और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को लेकर पार्टियां एकजुट हुई हैं। मगर जब इन पार्टियों के नेताओं से ये सवाल पूछा जाता है कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो एक-दूसरे के विरोधी कहे जाने वाले कई दल इस गठबंधन में साथ आ गए, तो जवाब यही मिलता है कि 'हम सबका लक्ष्य मोदी को हराना है। भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए हम साथ आए हैं।'
मतलब साफ है इन पार्टियों का सबसे बड़ा मुद्दा है मोदी को हराना और भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकना। इस बात का जिक्र सिर्फ एक नेता ने नहीं किया, बल्कि इस मुद्दे को लेकर सभी के सुर एक दूसरे से पूरी तरह मेल खाते हैं। इस गठबंधन में कई ऐसे भी दल हैं जो खुद कभी भाजपा के साथ सरकार में शामिल थे।
किन-किन नेताओं ने भाजपा को हराने की ठानी?
मोदी को हराना और भाजपा को सरकार से बेदखल करने के लिए कई पार्टियां अपने दिल पर पत्थर रखकर उन विरोधी पार्टियों के साथ मंच साझा करने पर मजबूर हो गए, जो एक दूसरे को फूटे आंख भी नहीं देखना चाहते थे। इनमें कांग्रेसी नेताओं के अलावा ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, नीतीश कुमार, लालू यादव, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता और उनकी पार्टियां शामिल हैं।
नेताओं की मजबूरी, गठबंधन के लिए जरूरी
इन नेताओं में सबसे ज्यादा मजबूर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी नजर आ रही हैं, जिन पर बार-बार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी निशाना साध रहे हैं। हालांकि चुनाव और गठबंधन को देखते हुए ममता कुछ भी बोलने के मूड में नहीं हैं। वहीं हाल ही में अखिलेश यादव की सपा और कांग्रेस पार्टी के बीच भी जमकर तकरार देखी गई थी। एमपी चुनाव में दोनों ने एक-दूसरे को जमकर खरी-खोटी सुनाई थी।
महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना की हातल भी कांग्रेस के सामने कुछ ठीक नहीं है। दोनों की पार्टियां टूट चुकी हैं, ऐसे में कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटों की डिमांड करने के मूड में होगी। पलटी मारने में माहिर कहे जाने वाले नीतीश कुमार की भी मजबूरी ही है जो कभी सियासत में अपने सबसे बड़े विरोधी लालू यादव से बार-बार गले मिलना पड़ता है। अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के बीच का विवाद किसी से छिपा नहीं है।
मतलब साफ है, इन सभी पार्टियों ने अब तक महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी, किसान को लेकर अपना प्लान नहीं बताया, मगर ये लक्ष्य सभी ने बताया कि मोदी को हराना ही उनका असल मकसद है। भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने का दावा करने वाली INDIA खेमे की पार्टियों में अबतक सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन सकी है। इन दलों के बीच 4 राउंड की बैठक हो चुकी है। ये बात और है कि बैठकों में सीट शेयरिंग जैसे अहम मुद्दे पर एक बार भी चर्चा नहीं हुई।
