Kannauj Lok Sabha Election: उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित सीटों की बात की जाए तो कन्नौज लोकसभा सीट का नाम सबकी जुबान पर रहता है। मुलायम सिंह यादव की जमाने में कभी समाजवादी पार्टी का गढ़ रही यह लोकसभा सीट 2019 के चुनाव में सपा के हाथ से छिटक गई थी और भाजपा ने यहां चौंकाने वाली जीत हासिल की। भारतीय जनता पार्टी इस बार भी जीत के लिए आश्वस्त थी, लेकिन अंतिम समय में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने इस सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर भाजपा के सभी समीकरणों को बिगाड़ दिया।
कन्नौज लोकसभा सीट पर मतदान हो चुका है। यहां अखिलेश यादव बनाम निवर्तमान सांसद सुब्रत पाठक के बीच मुकाबला था। अब लोगों को इंतजार है तो बस 4 जून का, इस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के साथ-साथ कन्नौज लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों से भी पर्दा उठेगा। आइए जानते हैं इस सीट का सियासी इतिहास कैसा रहा और अखिलेश यादव की वापसी ने भाजपा को कितना नुकसान पहुंचाया।
लोहिया ने पहली बार हासिल की थी जीत
कन्नौज लोसकभा सीट पहली बार 1967 में अस्तित्व में आई थी और इसी साल हुए आम चुनाव में यहां दिग्गज समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने जीत हासिल की थी। उन्होंने कांग्रेस के एसएन मिश्रा को 472 वोटों के अंतर से हराया था। हालांकि, 1971 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज में बाजी पलट गई और कांग्रेस प्रत्याशी एसएन मिश्रा ने इस सीट से जीत हासिल की। हालांकि, आपातकाल के बाद 1977 में यह सीट कांग्रेस के कब्जे में नहीं रह पाई और भारतीय लोकदल के टिकट पर मैदान में उतरे राम प्रकाश त्रिपाठी ने जीत हासिल की। 1980 के मध्यावधि चुनाव में यह सीट जनता पार्टी (सेकुलर) के उम्मीदवार छोट सिंह यादव के कब्जे में चली गई। हालांकि, 1984 के चुनाव में इस सीट पर शीला दीक्षित की एंट्री हुई और उन्होंने जीत हासिल की।
कैसे सपा का गढ़ बनी कन्नौज
1984 के बाद हुए आम चुनावों में कन्नौज लोकसभा सीट पर हार-जीत का सिलसिला लगा रहा। इसके बाद जब 1999 का चुनाव आया तो इस सीट पर मुलायम सिंह यादव की एंट्री हुई और उन्होंने यहां के साथ-साथ संभल लोकसभा सीट से भी जीत हासिल की। हालांकि, नतीजों के बाद मुलायम सिंह ने कन्नौज लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया और 2000 के उपचुनाव में उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को मैदान में उतारा। यहीं से अखिलेश यादव की सियासत में भी एंट्री हुई। अखिलेश यादव इस सीट पर 2000 के बाद 2004 और 2009 में भी जीत हासिल की। हालांकि, 2012 में अखिलेश यादव ने इस सीट से इस्तीफा दे दिया और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बन गए। उन्होंने अपनी पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतारा और वह निर्विरोध चुनी गईं। 2014 के चुनाव में डिंपल यादव और भाजपा के सुब्रत पाठक के बीच कड़ा मुकाबला देखा गया और इस चुनाव को डिंपल यादव सिर्फ 19,907 वोटों से जीत सकीं।
करीब 12 साल बाद अखिलेश यादव की वापसी
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सुब्रत पाठक ने सपा के इस अभेद किले को भेद दिया और उन्होंने डिंपल यादव को 12,353 वोटों से हराया। सुब्रत पाठक इस बार भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने करीब 12 साल बाद कन्नौज में वापसी का ऐलान कर भाजपा के सभी समीकरणों को बिगाड़ दिया है।
