मुख्यमंत्री : कभी वोट मांगने नहीं गए, फिर भी चुनाव नहीं हारे 'श्रीबाबू'; CM रहते अनशन पर बैठे और नेहरू से मनवा ली बात

बिहार में विधानसभा चुनावों की तैयारियां जोरों पर हैं। ऐसे में हम आपके लिए लेकर आए हैं अपनी एक नई सीरीज 'मुख्यमंत्री' इसके तहत हम आपको एक-एक करके बिहार के सभी मुख्यमंत्रियों के बारे में जानकारी देंगे। आज इस सीरीज की पहली कड़ी में जानें बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीबाबू के बारे में, जिन्हें आधुनिक बिहार का निर्माता भी कहा जाता है।

बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2025) होने तय हैं। आजकल चुनावों के दौरान नेताओं के जबरदस्त तामझाम होते हैं। मुख्यमंत्री और तमाम नेता प्रचार का पूरा कार्यक्रम तैयार करते हैं। प्रचार के लिए बड़ी योजनाएं बनती हैं और फिर जनता के बीच पूरे लाव-लश्कर के साथ पहुंचकर अपनी ताकत दिखाकर वोट मांगे जाते हैं। लेकिन बिहार में एक ऐसे भी मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने प्रचार नहीं किया, फिर भी वह हर बार चुनाव जीते। जी हां, बात राज्य के पहले मुख्यमंत्री 'श्रीबाबू' यानी श्री कृष्ण सिंह की हो रही है। श्रीबाबू बिहार के इकलौते मुख्यमंत्री रहे, जो पहले प्रधानमंत्री रहे और फिर मुख्यमंत्री बनाए गए। यही नहीं, वह बिहार के विकास के लिए इतने समर्पित थे कि मुख्यमंत्री रहते हुए वह अपनी ही पार्टी की केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ अनशन पर बैठ गए। आखिर उनकी मांग मानी गई, यही कारण है कि उन्हें आधुनिक बिहार का निर्माता माना जाता है। 'मुख्यमंत्री' सीरीज के तहत हम बिहार के हर मुख्यमंत्री के बारे में विस्तार से जानेंगे। चलिए आज जानते हैं बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीबाबू के बारे में...

1st CM of Bihar Sribabu.

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह

पांच साल की उम्र में मां का साया उठ गया

श्रीकृष्ण सिंह का अपना पैतृक गांव मुंगेर जिले में बरबीघा थाना क्षेत्र के माउर में था। लेकिन श्रीबाबू का जन्म अपने ननिहाल नवादा जिले के खनवा गांव में 21 अक्टूबर 1887 को हुआ। वह कुल पांच भाई थे, तीन उनसे बड़े और एक उनसे छोटा भाई था। उनके पिता हरिहर सिंह मुंगेर में जमींदार थे। जब श्रीबाबू महज पांच साल के थे, तब एक दिन अचानक उनकी मां की सेहत बिगड़ गई। बाद में पता चला कि उन्हें प्लेग हो गया है और कुछ ही दिन बाद उनका निधन हो गया। इस तरह सिर्फ पांच साल की उम्र में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया। इसके बाद उनकी देखरेख की जिम्मेदारी उनकी बड़ी भाभी यानी सबसे बड़े भाई देवकीनंदन सिंह की पत्नी ने संभाली।

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