Paliganj Assembly Election 2025: पटना से लगभग दक्षिण-पश्चिम दिशा में सोन नदी के तट पर स्थित पालीगंज सिर्फ एक अनुमंडलीय कस्बा नहीं, बल्कि बिहार की ग्रामीण राजनीति का एक अहम केंद्र माना जाता है। यहां का मतदाता किसी एक दल या नेता के प्रति लंबे समय तक स्थिर नहीं रहता, बल्कि हर चुनाव में नया रुख दिखाता है। यही कारण है कि पालीगंज की राजनीतिक जमीन अक्सर अप्रत्याशित नतीजे देती है।
पालीगंज विधानसभा चुनाव 2025
इसका सबसे ताजा उदाहरण 2020 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जब इलाके ने बड़ा सियासी बदलाव किया। इस चुनाव में भाकपा (माले) के युवा प्रत्याशी संदीप सौरभ ने शानदार प्रदर्शन करते हुए जीत हासिल की। उन्होंने महागठबंधन की ओर से चुनाव लड़ा और जदयू के उम्मीदवार जयवर्धन यादव को भारी मतों से पराजित किया। यह जीत इस बात का प्रतीक थी कि पालीगंज की जनता किसी भी पार्टी को लंबे समय तक सत्ता में टिके रहने का अवसर नहीं देती। अब एक बार फिर यहां सियासी जंग के लिए मैदान तैयार है। पालीगंज विधानसभा क्षेत्र में पहले चरण के तहत 6 नवंबर को मतदान होंगे, जबकि मतगणना 14 नवंबर को की जाएगी।
पालीगंज का राजनीतिक इतिहास क्या है?
पालीगंज का राजनीतिक अतीत दो प्रमुख नेताओं की प्रतिस्पर्धा से गहराई से जुड़ा रहा है कांग्रेस के रामलखन सिंह यादव और सोशलिस्ट धारा के चंद्रदेव प्रसाद वर्मा। इस विधानसभा सीट पर दशकों तक इन्हीं दोनों नेताओं का वर्चस्व कायम रहा। दोनों ने बारी-बारी से पांच-पांच बार जीत दर्ज की और एक-दूसरे के बीच राजनीतिक संघर्ष का यह सिलसिला कई वर्षों तक जारी रहा। इस दिलचस्प मुकाबले की शुरुआत 1951 के पहले आम चुनाव से हुई, जब रामलखन सिंह यादव ने कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की। इसके बाद 1957 के चुनाव में चंद्रदेव प्रसाद वर्मा ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बाजी पलट दी। आने वाले वर्षों में भी यह संघर्ष जारी रहा।
1980, 1985 और 1990 में रामलखन सिंह यादव ने लगातार तीन बार जीतकर हैट्रिक बनाई, जबकि 1991 के उपचुनाव और 1995 के विधानसभा चुनाव में चंद्रदेव प्रसाद वर्मा ने जनता दल के प्रत्याशी के रूप में लगातार दो बार जीत हासिल की। इस तरह पालीगंज की राजनीति लंबे समय तक इन्हीं दो नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही।
पालीगंज की सियासत ने नया मोड़
पालीगंज विधानसभा क्षेत्र का चुनावी इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। कांग्रेस ने अब तक इस सीट पर कुल छह बार जीत दर्ज की है, जिनमें से पांच बार विजय रामलखन सिंह यादव के नाम रही। दूसरी ओर, समाजवादी धारा का प्रतिनिधित्व करने वाले चंद्रदेव प्रसाद वर्मा ने तीन बार इस क्षेत्र में सफलता हासिल की। वहीं, भाकपा (माले) ने भी तीन बार यहां अपनी जीत का परचम लहराया है। 1990 के दशक के बाद पालीगंज की सियासत ने नया मोड़ लिया। कांग्रेस का पुराना प्रभाव धीरे-धीरे खत्म हुआ और इस सीट पर भाजपा, राजद और भाकपा (माले) (लिबरेशन) के बीच मुकाबला देखने को मिलने लगा। इन तीनों दलों ने बारी-बारी से यहां दो-दो बार जीत दर्ज की। इसके अलावा, 1977 में एक निर्दलीय उम्मीदवार ने भी जीत हासिल की थी। लगातार बदलते चुनावी समीकरणों और मतदाताओं की अप्रत्याशित पसंद ने पालीगंज को राजनीतिक अस्थिरता के प्रतीक के रूप में पहचान दिलाई है, जहां हर चुनाव में सत्ता का पलड़ा नए सिरे से बदल जाता है।
2020 के चुनाव का हाल क्या था?
पालीगंज विधानसभा सीट पर 2020 का चुनाव कई राजनीतिक दलों और नेताओं के बदलते गठजोड़ के कारण खासा चर्चा में रहा। उस समय राजद विधायक जयवर्धन यादव, जो रामलखन सिंह यादव के पोते हैं, ने पार्टी छोड़कर जदयू का दामन थाम लिया। इसकी वजह थी कि राजद ने यह सीट अपने गठबंधन के तहत भाकपा (माले) को दे दी थी। इसी बीच, भाजपा की पूर्व विधायक उषा विद्यार्थी ने भी पाला बदलते हुए लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) से चुनाव लड़ा। इस जटिल मुकाबले में अप्रत्याशित नतीजा सामने आया भाकपा (माले) के उम्मीदवार संदीप सौरभ ने शानदार जीत दर्ज करते हुए जयवर्धन यादव को बड़े अंतर से पराजित किया। यह जीत महागठबंधन के खाते में गई और यह साफ संकेत मिला कि पालीगंज के मतदाता किसी दल या परिवार से अधिक स्थानीय मुद्दों और जनसंपर्क को प्राथमिकता देते हैं। अब 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में पालीगंज एक बार फिर सियासी जंग का केंद्र बना हुआ है। इस बार कुल 14 उम्मीदवार मैदान में हैं। 2020 के विजेता संदीप सौरभ दोबारा भाकपा (माले) के टिकट पर किस्मत आजमा रहे हैं। वहीं, एनडीए की ओर से लोजपा (रामविलास) के सुनील कुमार उम्मीदवार हैं। 2020 में चिराग पासवान की पार्टी यहां तीसरे स्थान पर रही थी। इसके अलावा, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने श्याम नंदन शर्मा को उम्मीदवार बनाया है, जबकि आम आदमी पार्टी से शिवनाथ कुमार मैदान में उतर रहे हैं।
पालीगंज विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
पालीगंज विधानसभा क्षेत्र में जातीय समीकरण हमेशा से चुनावी नतीजों को गहराई से प्रभावित करते रहे हैं। यहां की राजनीति में मुख्य रूप से यादव, मुस्लिम और भूमिहार समुदायों का वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। पारंपरिक रूप से एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण और इसके साथ वामपंथी दलों का मजबूत जनाधार इस क्षेत्र की सियासत को दिशा देता आया है। पालीगंज का नाम भी इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इसका नाम पाली भाषा से निकला है। वही प्राचीन भाषा जिसमें कई बौद्ध ग्रंथों की रचना हुई थी। इसके अलावा, भरतपुरा (भारतपुरा) गांव में गुलाम वंश, तुगलक, बाबर और अकबर काल के करीब 1,300 प्राचीन सिक्कों की खोज हुई थी, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक समृद्धि का प्रमाण है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, पालीगंज का राजनीतिक माहौल काफी रोमांचक है। यहां की लड़ाई सिर्फ दो दलों के बीच नहीं, बल्कि इतिहास, विचारधारा और बदलते जनमत के टकराव की कहानी है। यही वजह है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पालीगंज एक बार फिर कांटे की टक्कर वाले मुकाबले का केंद्र बनने जा रहा है।
इनपुट - आईएएनएस
