Morwa Assembly Election 2025: समस्तीपुर जिले में स्थित मोरवा विधानसभा सीट भौगोलिक रूप से उपजाऊ गंगा के मैदान का हिस्सा है। इस क्षेत्र से लगभग 32 किलोमीटर दूर बहने वाली बूढ़ी गंडक नदी यहां की कृषि को जीवन देती है। राजनीतिक दृष्टि से यह सीट हमेशा कांटे की टक्कर वाली मानी जाती है। यह सीट उजीयारपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, और इसका राजनीतिक प्रभाव दिल्ली की सियासत तक महसूस किया जाता है। वर्तमान में यह सीट सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित है, जहां राजद (RJD) का कब्जा है। समस्तीपुर जिला मुख्यालय से करीब 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह क्षेत्र हर चुनाव में राजद और जदयू (JDU) के बीच तीव्र मुकाबले का गवाह रहा है। इस बार समीकरण कुछ अलग दिख रहे हैं। जनसुराज पार्टी ने भी मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। पार्टी ने अपनी पहली उम्मीदवार सूची में कर्पूरी ठाकुर की पोती डॉ. जागृति ठाकुर को मोरवा से प्रत्याशी बनाया है। ऐसे में इस बार मोरवा सीट पर राजद, जदयू और जनसुराज के बीच जबरदस्त संघर्ष देखने को मिल सकता है।
मोरवा विधानसभा चुनाव 2025
यादगार रहा 2020 का विधानसभा चुनाव
मोरवा विधानसभा सीट हमेशा ही निर्णायक मतदाताओं और अनपेक्षित चुनावी नतीजों के लिए जानी जाती रही है। साल 2020 का चुनाव इस सीट के लिए खास तौर पर यादगार रहा, जब आरजेडी के रणविजय साहू ने अपने कड़े प्रतिद्वंद्वी को मात देकर जीत दर्ज की। रणविजय ने इस बार लगभग 10 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। मोरवा के चुनाव में अक्सर मुकाबला जदयू और आरजेडी के बीच ही रहता है। यहां के मतदाता किसी एक पार्टी या नेता पर स्थायी रूप से निर्भर नहीं रहते। वे हमेशा यह आंकलन करते हैं कि कौन उनके क्षेत्र और जनता के लिए वास्तव में काम कर सकता है। यही वजह है कि मोरवा के मतदाता बदलाव और नए उम्मीदवारों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हैं।
कब हुआ था मोरवा विधानसभा सीट पर पहला चुनाव
मोरवा विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई, इसलिए इसका चुनावी इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन राजनीति की दृष्टि से यह बेहद रोचक रही है। इस सीट पर पहला चुनाव 2010 में हुआ था, जिसमें जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के वैद्यनाथ सहनी ने जीत दर्ज की। उन्होंने राजद के अशोक सिंह को मात देकर इस नई सीट पर जदयू का दबदबा स्थापित किया। वैद्यनाथ सहनी की जीत में सहनी समुदाय का मजबूत समर्थन एक प्रमुख कारक रहा। साल 2015 में जदयू उस समय महागठबंधन का हिस्सा था। इस बार जदयू के विद्या सागर निषाद महागठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे और भाजपा के सुरेश राय को हराकर सीट बरकरार रखी। 2020 के चुनाव में समीकरण बदल गए और आरजेडी के रणविजय साहू ने जीत हासिल कर मोरवा की सत्ता को पलट दिया। इस तरह मोरवा सीट ने शुरुआत से ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और बदलते समीकरणों का जीता-जागता उदाहरण पेश किया है।
मतदान के प्रति जागरूकता और सक्रियता
मोरवा की राजनीति में विकास की चर्चा जरूर होती है, लेकिन बिहार के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी जातिगत समीकरण चुनावी नतीजों को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। मोरवा में सहनी समाज (निषाद समुदाय का हिस्सा) की आबादी सबसे बड़ी है। यह समाज केवल संख्या में बड़ा ही नहीं, बल्कि मतदान के प्रति जागरूक और सक्रिय होने के लिए भी जाना जाता है। इसके अलावा, यह समुदाय मछली पालन जैसी स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में भी प्रमुख भूमिका निभाता है, जिससे उनकी क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक शक्ति और मजबूत होती है। इस सीट पर लगभग 30% वोटिंग मुस्लिम और यादव (एमवाई) मतदाताओं की है। ये दोनों समुदाय मिलकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए मजबूत और भरोसेमंद वोट बैंक तैयार करते हैं।
कृषि पर निर्भर है मौरवा क्षेत्र
इसके अलावा, ब्राह्मण और राजपूत मतदाता भी मोरवा की चुनावी तस्वीर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे साफ है कि मोरवा की राजनीति कई परतों वाली है, जिसमें हर समुदाय का अपना विशेष महत्व है। अर्थव्यवस्था की बात करें तो मोरवा मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। यहां बड़े पैमाने पर धान, गेहूं, मक्का और दालों की खेती होती है। इसके अलावा, कुछ छोटे स्तर के कृषि आधारित उद्योग भी मौजूद हैं। बिहार की राजधानी पटना से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती बेरोजगारी और गरीबी है। 6 नवंबर को होने वाले चुनाव में मोरवा में बेरोजगारी और विकास से जुड़े मुद्दे जरूर उभरेंगे, लेकिन हमेशा की तरह जातिगत समीकरण भी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
