न्याय व्यवस्था को मानवीय बनाती है इंटरसेक्शनैलिटी की अवधारणा, बेनेट यूनिवर्सिटी में बोले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल

बेनेट यूनिवर्सिटी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल हुए। इस उद्घाटन समारोह में संवैधानिक एवं संसदीय अध्ययन संस्थान (ICPS), नई दिल्ली की निदेशक डॉ. सीमा कौल सिंह ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया। यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन सेंटर फॉर फैमिली लॉ, बेनेट लॉ स्कूल, यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग और यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम, यूनाइटेड किंगडम के सहयोग से आयोजित किया गया।

ग्रेटर नोएडा। बेनेट यूनिवर्सिटी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल हुए। यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन सेंटर फॉर फैमिली लॉ, बेनेट लॉ स्कूल, यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग और यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम, यूनाइटेड किंगडम के सहयोग से आयोजित किया गया। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने अपने उद्घाटन भाषण में 19वीं शताब्दी में भारत में लागू हुए डॉक्ट्रिन ऑफ इक्लिप्स, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858, और बाद में लागू हुए भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) तथा साक्ष्य अधिनियम जैसे प्रमुख विधिक सिद्धांतों और कानूनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख किया। उन्होंने इन कानूनों की दार्शनिक आधारभूमि की चर्चा करते हुए बताया कि कैसे स्वतंत्रता के बाद भी दंड आधारित सोच (दंड का सिद्धांत) कानूनों में बनी रही, जबकि हाल ही में किए गए विधायी सुधारों में 'न्याय' की भावना को केंद्र में रखा गया है।

Shri Arjun Ram Meghwal Inaugurates International Conference at Bennett University

बेनेट यूनिवर्सिटी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन को संबोधित करते कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल।

सम्मेलन के मुख्य विषय से जुड़ते हुए इंटरसेक्शनैलिटी की अवधारणा ने कहा कि 'इंटरसेक्शनैलिटी' भारत के सांस्कृतिक और दार्शनिक चिंतन में कोई नई बात नहीं है। उन्होंने राजस्थान की मैना बाई के उदाहरण से समझाया कि किस प्रकार उन्होंने सामाजिक पहचान को केवल लिंग आधारित न मानकर मानवता के व्यापक दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने मैना बाई की स्वामी विवेकानंद से हुई भेंट का उल्लेख करते हुए भजन "प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो" गाकर इस बात को रेखांकित किया कि कैसे शारीरिक अक्षमता सामाजिक अदृश्यता और बहिष्कार का कारण बन सकती है।

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