बदरीनाथ धाम में भी होता है पितरों का तर्पण और पिंडदान, इस बार श्रद्धालुओं की संख्या में क्यों आई कमी?

बद्रीनाथ मंदिर के पास स्थित ब्रह्म कपाल घाट तर्पण और पिंड दान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है लेकिन उत्तराखंड में इस बार आपदा के चलते जहाँ हजारों की तादाद में श्रद्धालु अपने पितरों। का तर्पण करने बदरीनाथ धाम पहुंचते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। ऐसा माना जा रहा है। इसका एक बेहद बड़ा कारण उत्तराखंड में आपदा है।

देहरादून: तर्पण संस्कृत शब्द 'तर्प' से निकला है, जिसका अर्थ है 'संतुष्ट करना' या 'तृप्त करना'। यह अनुष्ठान पितरों को जल, तिल और अन्य सामग्री अर्पित करके किया जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को शांति और मोक्ष के लिए वंशजों द्वारा किए जाने वाले इन कर्मों की आवश्यकता होती है। बदरीनाथ में यह अनुष्ठान अलकनंदा नदी के किनारे ब्रह्मकपाल घाट पर किया जाता है, जहां तर्पण के साथ पिंडदान (चावल की पिंडी दान) भी जुड़ा होता है। पितृ पक्ष (सितंबर-अक्टूबर में 16 दिनों की अवधि) में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, जब श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा को तृप्त करने के लिए यहां पहुंचते हैं।

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बदरीनाथ धाम में भी होता है पितरों का तर्पण और पिंडदान (PHOTO-PTI)

बद्रीनाथ हिंदू धर्म में तर्पण (पितृ तर्पण) करने के लिए सबसे श्रेष्ठ स्थानों में से एक माना जाता है। यह उत्तराखंड में स्थित एक पवित्र तीर्थस्थल है, जो भगवान विष्णु का धाम है और चार धाम यात्रा का हिस्सा है। विशेष रूप से, बद्रीनाथ मंदिर के पास स्थित ब्रह्म कपाल घाट तर्पण और पिंड दान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है लेकिन उत्तराखंड में इस बार आपदा के चलते जहाँ हजारों की तादाद में श्रद्धालु अपने पितरों। का तर्पण करने बदरीनाथ धाम पहुंचते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। ऐसा माना जा रहा है। इसका एक बेहद बड़ा कारण उत्तराखंड में आपदा है। आपदा की वजह से ना सिर्फ उत्तराखण्ड की आम आदमी की रोजी रोटी पर असर पड़ा है बल्कि देश विदेश से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं पर भी इसका खासा असर दिखाई दे रहा है। आइए आपको समझाते हैं सरकारी आँकड़ों से कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष कितने लोग उत्तराखंड के इन प्रसिद्ध स्थानों पर पहुंचे हैं

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