Delhi News Today: दिल्ली हाई कोर्ट ने सड़क हादसे के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि सिर्फ गाड़ी की तेज रफ्तार को आधार बनाकर किसी ड्राइवर को 'रैश' या 'लापरवाह' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि 'तेज रफ्तार' या 'ओवर स्पीड' की कोई तय सीमा नहीं होती, यह सड़क और हालात के हिसाब से तय होती है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि ड्राइवर ने वास्तव में ऐसी लापरवाही या खतरनाक तरीके से वाहन चलाया, जिससे हादसा हुआ।
दिल्ली हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
दिल्ली सरकार को हाई कोर्ट से लगा झटका
यह फैसला जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने दिल्ली सरकार की उस अपील पर सुनाया, जिसमें 2009 के सड़क हादसे में एक महिला की मौत के मामले में टेंपो चालक को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए राज्य की अपील खारिज कर दी।
क्या है पूरा मामला?
मामला 12 नवंबर 2009 का है। अभियोजन के मुताबिक, सुबह करीब 9:15 बजे एक व्यक्ति अपनी मां को साइकिल पर बैठाकर काम के लिए कमरुद्दीन नगर की ओर जा रहा था। इसी दौरान सामने से आ रहे एक टेंपो ने उनकी साइकिल को टक्कर मार दी। हादसे में महिला सड़क पर गिर गईं और टेंपो का दाहिना अगला पहिया उनके सिर के ऊपर से गुजर गया। महिला की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने टेंपो चालक के खिलाफ आईपीसी की धारा 279 और 304A के तहत केस दर्ज किया था।
ट्रायल कोर्ट ने 26 अगस्त 2013 को आरोपी चालक को दोनों धाराओं में बरी कर दिया था। इसके खिलाफ दिल्ली सरकार ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
चश्मदीद ने कहा- टेंपो बहुत तेज रफ्तार में था
मामले में मृतका के बेटे की गवाही अभियोजन के लिए मुख्य आधार थी। उसने कहा कि टेंपो काफी तेज रफ्तार में आ रहा था और ड्राइवर लापरवाही से गाड़ी चला रहा था। उसने साइकिल को बचाने की कोशिश की, लेकिन टेंपो ने सामने से टक्कर मार दी। हालांकि, जिरह के दौरान उसने माना कि उसने पुलिस को टेंपो की कोई निश्चित या अनुमानित स्पीड नहीं बताई थी। कोर्ट के पूछने पर भी वह यह नहीं बता सका कि टेंपो कितनी रफ्तार से चल रहा था।
'सिर्फ तेज रफ्तार से लापरवाही साबित नहीं होती'
हाई कोर्ट ने कहा कि सड़क हादसा हो जाना और उसमें किसी व्यक्ति की मौत हो जाना अपने आप में ड्राइवर की 'रैशनेस' या 'नेग्लिजेंस' साबित नहीं करता। कोर्ट ने साफ कहा कि वाहन तेज रफ्तार से चलाए जाने का मतलब यह नहीं है कि ड्राइवर अपने आप लापरवाह या खतरनाक तरीके से गाड़ी चला रहा था। 'हाई स्पीड' और 'ओवर स्पीड' सापेक्ष शब्द हैं। अभियोजन को रिकॉर्ड पर यह सामग्री लानी होगी कि उस खास परिस्थिति में 'हाई स्पीड' से क्या मतलब था।
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ड्राइवर की लापरवाही का सीधा लिंक हादसे से साबित करना होगा
कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 279 के तहत यह साबित करना जरूरी है कि वाहन को इस तरह चलाया गया जिससे मानव जीवन खतरे में पड़ा या किसी व्यक्ति को चोट लगने की संभावना पैदा हुई। वहीं, धारा 304A के तहत मौत किसी ऐसे 'रैश' या लापरवाह काम के कारण होनी चाहिए, जो गैर इरादतन हो।
हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन को सिर्फ हादसा और मौत साबित नहीं करना था, बल्कि यह भी साबित करना था कि हादसा आरोपी की रैश या लापरवाह ड्राइविंग का सीधा नतीजा था। कोर्ट को रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त सबूत नहीं मिला।
गाड़ी की जांच रिपोर्ट से भी उठे सवाल
कोर्ट ने टेंपो की मैकेनिकल इंस्पेक्शन रिपोर्ट का भी जिक्र किया। रिपोर्ट में टेंपो के बाईं ओर हल्का डेंट पाया गया था। वहीं, चश्मदीद के मुताबिक, टेंपो सामने से आया था और साइकिल से टकराया था। कोर्ट ने कहा कि अगर घटना इस तरह हुई होती, जैसा चश्मदीद ने बताया, तो सामान्य तौर पर टेंपो के दाईं ओर नुकसान होना चाहिए था। इस अंतर ने अभियोजन की कहानी को और कमजोर किया।
साइट प्लान पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
हाई कोर्ट ने पुलिस की ओर से तैयार किए गए साइट प्लान को भी पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट के मुताबिक, साइट प्लान में हादसे की जगह तो दिखाई गई थी, लेकिन सड़क की चौड़ाई तक नहीं बताई गई थी। इससे यह पता लगाना संभव नहीं था कि आरोपी वास्तव में सड़क की गलत साइड पर गया था या नहीं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि साइट प्लान उस चश्मदीद की मौजूदगी में तैयार नहीं हुआ था।
कोर्ट ने आरोपी को बरी रखने का फैसला बरकरार रखा
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त आधार नहीं है, जिससे आरोपी की जरूरी 'रैशनेस' या 'नेग्लिजेंस' साबित हो सके। इसलिए ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी करके कोई गलती नहीं की थी। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने दिल्ली सरकार की अपील को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया।
