पंजाब में 19 जुलाई को आयोजित फार्मेसी ऑफिसर भर्ती परीक्षा विवादों में घिर गई है। परीक्षा में कथित पेपर लीक और बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए नकल के आरोप लगाते हुए अभ्यर्थियों ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया है। याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा को रद्द कर दोबारा पारदर्शी तरीके से परीक्षा कराने की मांग की है।
कोर्ट (सांकेतिक फोटो-Istock)
याचिका में परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि परीक्षा के दौरान ही प्रश्नपत्र बाहर भेज दिया गया और एक संगठित अंतरराज्यीय नकल गिरोह ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मदद से कई अभ्यर्थियों तक सवालों के जवाब पहुंचाए।
मिनटों में प्रश्नपत्र बाहर भेजने का आरोप
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, परीक्षा शुरू होने के कुछ ही मिनटों बाद एक अभ्यर्थी ने कथित तौर पर छिपे हुए पेन कैमरे से प्रश्नपत्र स्कैन किया और उसे व्हाट्सऐप के जरिए बाहर भेज दिया। इसके बाद प्रश्नपत्र को परीक्षा केंद्रों से बाहर मौजूद लोगों तक पहुंचाया गया। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि परीक्षा केंद्रों पर मोबाइल सिग्नल जैमर नहीं लगाए गए थे। अभ्यर्थियों का दावा है कि इसी सुरक्षा खामी का फायदा उठाकर वायरलेस और ब्लूटूथ आधारित उपकरणों का इस्तेमाल किया गया।
तीन शहरों में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस पहुंचने का दावा
याचिका में आरोप लगाया गया है कि परीक्षा आयोजित करने वाले तीनों शहरों के केंद्रों में इलेक्ट्रॉनिक चीटिंग डिवाइस पहुंचाए गए थे। अभ्यर्थियों ने इसे महज व्यक्तिगत स्तर पर हुई नकल के बजाय पहले से तैयार की गई साजिश बताया है। आरोप है कि परीक्षा से जुड़ा प्रश्नपत्र फरिदकोट में बनाए गए एक अस्थायी कंट्रोल रूम तक पहुंचाया गया, जिसे फाजिल्का स्थित संत कबीर पॉलिटेक्निक कॉलेज के एक कर्मचारी द्वारा संचालित किए जाने का दावा किया गया है।
वहां कथित तौर पर प्रश्नों को रियल टाइम में हल किया गया और उनके जवाब परीक्षा केंद्रों में मौजूद अभ्यर्थियों तक बैटरी से चलने वाले वायरलेस ब्लूटूथ माइक्रो-ईयरपीस के जरिए पहुंचाए गए।
सरकार के ‘फूलप्रूफ सिस्टम’ के दावे पर भी सवाल
अभ्यर्थियों ने पंजाब सरकार की ओर से परीक्षा के दिन जारी उस प्रेस रिलीज पर भी सवाल उठाए हैं, जिसमें परीक्षा व्यवस्था को ‘फूलप्रूफ’ बताया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कथित पेपर लीक और इलेक्ट्रॉनिक नकल के आरोप सामने आने के बावजूद परीक्षा प्रणाली को बिना स्वतंत्र जांच के क्लीन चिट देना जल्दबाजी थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार का यह शुरुआती दावा परीक्षा की वास्तविक स्थिति के विपरीत है और इससे परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर और गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
हाईकोर्ट से क्या मांग?
अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट से मांग की है कि 19 जुलाई की कथित तौर पर प्रभावित परीक्षा को रद्द किया जाए और निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से दोबारा परीक्षा आयोजित कराई जाए।
साथ ही याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि जब तक मामले का स्वतंत्र आकलन नहीं हो जाता, तब तक उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन, परीक्षा परिणाम जारी करने और भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर रोक लगाई जाए।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का भी मुद्दा
याचिका में परीक्षा की निष्पक्षता को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 से जोड़ते हुए सवाल उठाया गया है। अभ्यर्थियों का तर्क है कि यदि प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने के कुछ ही मिनटों में बाहर पहुंच गया और वायरलेस माध्यम से कुछ उम्मीदवारों को रियल टाइम में जवाब उपलब्ध कराए गए, तो सभी उम्मीदवारों को समान अवसर मिलने का संवैधानिक अधिकार प्रभावित होता है।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब कथित तौर पर परीक्षा व्यवस्था में व्यापक स्तर पर सेंध लगी हो, तो निष्पक्ष उम्मीदवारों और कथित तौर पर लाभ उठाने वाले उम्मीदवारों को अलग-अलग चिन्हित करना संभव है या नहीं।
‘वांशिका यादव’ फैसले का दिया हवाला
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के Vanshika Yadav v. Union of India (2024 INSC 568) फैसले का भी हवाला दिया है। उनका तर्क है कि यदि परीक्षा की पूरी प्रणाली इस स्तर तक प्रभावित हो गई हो कि दोषी और निर्दोष उम्मीदवारों को विश्वसनीय तरीके से अलग करना संभव न हो, तो पूरी परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित कराना जरूरी हो सकता है।
याचिका में पंजाब पुलिस की जांच में सामने आए कथित संगठित अंतरराज्यीय नकल नेटवर्क को भी महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। अभ्यर्थियों का सवाल है कि जब आपराधिक जांच जारी है, तब क्या राज्य सरकार परीक्षा के परिणाम और भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है या पहले परीक्षा की संपूर्ण निष्पक्षता सुनिश्चित करना जरूरी है। अब इस मामले में हाईकोर्ट के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यही है कि 19 जुलाई की फार्मेसी ऑफिसर भर्ती परीक्षा में कथित पेपर लीक का असर कितना व्यापक था और क्या पूरी परीक्षा की प्रक्रिया इतनी प्रभावित हुई कि इसे रद्द कर दोबारा परीक्षा कराने की जरूरत पड़े।
