Vrindavan Widow Holi Celebration: सफेद साड़ियों में जिंदगी ने सोमवार को वृंदावन के ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर में रंगों की खुली उड़ान भर ली। बरसों तक ’अशुभ’ कहकर त्योहारों से दूर रखी गईं विधवा महिलाओं ने हंसी की खनक, भक्ति की स्वर-लहरियों और उड़ते गुलाल के बीच इस बार न सिर्फ होली देखी, बल्कि उसे जीया, जैसे मानो रंगों ने उनके जीवन के सूनेपन पर दस्तक दी हो और कहा हो-अब वर्जनाएं नहीं, बस उत्सव।
वृंदावन में 200 से अधिक विधवा महिलाओं ने खेली गोपीनाथ मंदिर में होली
’बंसी वाले की जय’ के गूंजते जयघोष
’सुलभ इंटरनेशनल’ की कार्यकारी संयोजक नित्या पाठक ने बताया कि पांच आश्रमों से आईं 200 से अधिक विधवा महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ उत्सव में भाग लिया। ’बंसी वाले की जय’ के गूंजते जयघोषों के बीच वे मंदिर में गाए जा रहे रासिया गीतों की धुन पर थिरकीं और देखते ही देखते एक-दूसरे पर एक हजार किलोग्राम से अधिक फूल तथा 700 किलोग्राम गुलाल उड़ा दिया।
नित्या ने कहा, 'पूरा मंदिर परिसर भक्ति में डूब गया और महिलाओं में होली खेलने को लेकर अपार उत्साह दिखा गया।' उन्होंने कहा, 'बीते वर्षों में हमने इस आयोजन में भाग लेने वाली विधवा महिलाओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखी है। यह बदलाव की वही आहट है, जिसे इन महिलाओं ने खुले दिल से स्वीकार किया है और अब वे ऐसे उत्सवों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगी हैं।'
विधवाओं को उच्चतम न्यायालय से मिली देखभाल
नित्या ने कहा, 'भारतीय समाज में एक समय विधवाओं को अशुभ माना जाता था और उन्हें त्योहारों व सामाजिक आयोजनों में शामिल होने से वंचित कर दिया जाता था। कई महिलाएं तो अपने ही घरों से निकाल दी गईं और शरण की तलाश में वृंदावन आ पहुंचीं, जहां उन्हें अभाव और बेबसी भरा जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ा।' उन्होंने कहा कि 2012 में वृंदावन में रहने वाली विधवाओं की दयनीय स्थिति को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने ’सुलभ इंटरनेशनल’ को उनकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी थी।
पवित्र जगह: गोपीनाथ मंदिर
जबकि पूरा वृंदावन शहर एनर्जी से भरा हुआ है और इस खास बदलाव यानी विधवा महिलाओं की होली के जश्न का केंद्र ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर है। बाहर की अस्त-व्यस्त सड़कों के उलट, यहां का जश्न अपनेपन वाला लेकिन शानदार होता है। यह पारंपरिक रूप से मुख्य होली त्योहार (रंगवाली होली) से कुछ दिन पहले होता है।
होली 2026 के लिए, विधवाएं गेंदे और गुलाब की पंखुड़ियों के ढेर के बीच जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुईं, जिससे ऐसा नजारा बना जो त्योहार कम और भगवान को फूल चढ़ाने जैसा ज्यादा लग रहा था। सिर्फ सूखे रंगों (गुलाल) के बजाय ढेर सारी फूलों की पंखुड़ियों (फूलों की होली) के इस्तेमाल ने इस इवेंट को एक नरम, ज्यादा दिव्य पहलू दिया है, जो इसे सड़कों पर होने वाले शोर-शराबे वाले जश्न से अलग बनाता है।
