आम फलों का राजा है और यह फलों के राजा का समय है। यानी अभी आम का सीजन है और बाजार में हर तरफ अलग-अलग तरह के आम नजर आ रहे हैं। पीले-पीले रसीले आम देखकर ही लालच आने लगता है। लेकिन एक आम है, जिसका शायद हर कोई दीवाना होता है। बड़ी बात ये कि यह आम पूरी तरह से पीला भी नहीं होता, बल्कि हरे और पीले रंग का मिश्रण होता है। जी हां, दशेरी आम बाहर से हरा ही रहता है, लेकिन उसकी मिठास हर किसी को पसंद आती है। दशेरी आम की खासियत ये होती है कि इसे काटने का झंझट नहीं होता। एक तरफ से मुंह लगाया और आम का पूरा रस (Pulp) सीधे मुंह में घुलता चला जाता है। क्या आप जानते हैं कि आपके फेवरिट आम का नाम दशेरी कैसे पड़ा, पहली बार यह आम कहां पैदा हुआ और इसको ये नाम कैसे मिला? चलिए जानते हैं -
कहां पैदा होता है दशेरी आम?
मैंगो कैपिटल
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास ही आमों की राजधानी मलीहाबाद है। मलीहाबाद अपने आमों के लिए मशहूर है। यहां के लोग कई पीढ़ियों से आम का उत्पादन कर रहे हैं। यहां के आम के बागों में कई तरह के आम होते हैं। मलीहाबाद में हजारों हेक्टेयर में आम के बगीचे हैं और देश में आमों के उत्पादन में मलीहाबाद का अनोखा नाम है। यहां की अनोखी मिट्टी और वातावरण यहां स्वादिष्ट आमों के उत्पादन के लिए बेहतरीन परिस्थितियां बनाती हैं।
दशेरी आम है यहां की पहचान
मलीहाबाद अपने आम के बागानों के लिए मशहूर है और यहां का सबसे मशहूर आम दशेरी ही है। दशेरी को हम और आप जैसे करोड़ों लोग पसंद करते हैं। दशेरी की मिठास का कोई तोड़ नहीं है। इसका गूदा यानी पल्प, इसकी सुगंध और इसका टेक्सचर इसे अनोखा बनाते हैं। बता दें कि दशेरी दुनिया में भारत की पहचान भी है, क्योंकि भारत से सबसे ज्यादा दशेरी आम का ही एक्सपोर्ट होता है।
कब हुआ दशेरी का जन्म?
कहा जाता है कि दुनिया को पहली बार दशेरी का स्वाद करीब 200 साल पहले चखने को मिला। कहा जाता है कि करीब 200 साल पहले मलीहाबाद में जिस पेड़ पर पहली बार दशेरी आम लगा था, वह आज भी यहां जिदा है।
दशेरी का नाम कैसे पड़ा?
दशेरी के मीठे स्वाद और सुगंध के तो आप दीवाने हैं, लेकिन शायद आपको ये नहीं पता होगा कि आम की इस वैरायटी को अपना ये नाम कैसे मिला? बता दें कि मलीहाबाद के पास ही दशेरी नाम का एक गांव है, जहां पहली बार यह आम करीब 200 साल पहले हुआ था, उसी गांव के नाम पर इसे दशेरी नाम मिला।
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आम यहां कि संस्कृति और विरासत हैं
मलीहाबाद के स्थानीय लोगों के लिए आमों की खेती, सिर्फ खेती किसानी का काम नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और विरासत का हिस्सा है। यहां की कई पीढ़ियां सिर्फ आमों की पारंपरिक किस्मों के उत्पादन और उन्हें बचाने में लगी रही हैं। आमों के इस सीजन में फलों के राजा के शौकीन यहां आम का अनोखा स्वाद लेने आते हैं।
