Noida Workers Protest: नोएडा में हुई हिंसा को लेकर जांच एजेंसियों ने एक सनसनीखेज खुलासा किया है, जिससे यह साफ हो गया है कि यह कोई तात्कालिक गुस्सा नहीं बल्कि एक सुनियोजित गहरी साजिश थी। इस पूरी साजिश का ताना-बाना मानेसर से लेकर नोएडा के अरुण विहार तक फैला हुआ था, जिसकी पटकथा कई महीनों पहले ही तैयार कर ली गई थी।
नोएडा हिंसा के पीछे के मास्टमाइंड का हुआ पर्दाफाश।
जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क का मकसद मजदूरों के हितों की आड़ में बड़े स्तर पर अव्यवस्था फैलाना और प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह ठप करना था। पुलिस को मिले दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से "मोटो जाम करना है" जैसी रणनीतियों का जिक्र मिला है, जिससे पता चलता है कि साजिशकर्ता सड़कों को बंधक बनाकर सरकार पर दबाव बनाना चाहते थे।
इस साजिश का मुख्य केंद्र नोएडा का पॉश इलाका अरुण विहार था, जहां तमिलनाडु से गिरफ्तार मास्टरमाइंड आदित्य आनंद एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल के घर में तीन कमरों का सेट किराए पर लेकर रह रहा था।
एनआईटी जमशेदपुर से की थी आदित्या ने पढ़ाई
खुद को एक नामी आईटी कंपनी से जुड़ा बताने वाला आदित्य असल में इस घर को दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम में हिंसा फैलाने के 'कंट्रोल रूम' के रूप में इस्तेमाल कर रहा था। जांच में पता चला है कि एनआईटी जमशेदपुर से बीटेक और हंसराज कॉलेज से पढ़ाई करने वाला आदित्य कॉलेज प्लेसमेंट के दौरान ही 1 लाख रुपये की सैलरी पाता था, जिसका इस्तेमाल वह इस नेटवर्क को खड़ा करने और युवाओं की भर्ती के लिए कर रहा था।
लेबर स्ट्राइक के बहाने पूरी रणनीति तैयार की गई
जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस साजिश के पीछे कई संगठनों का एक साझा नेक्सस काम कर रहा था, जिसमें RWPI, मजदूर बिगुल दस्ता, नौजवान भारत सभा और दिशा ऑर्गनाइजेशन जैसे नाम शामिल हैं। इन संगठनों ने लेबर स्ट्राइक के बहाने पूरी रणनीति तैयार की थी, जिसके तहत कंपनियों के नाम पर व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए और उनमें घुसपैठ की गई।
दस्तावेजों में यह तक दर्ज था कि किस फेज में कहां भीड़ जुटानी है और पकड़े जाने से बचने के लिए व्हाट्सएप एडमिन को कब ग्रुप छोड़कर भागना है। यह पूरा आंदोलन मई 2026 तक चलाने की योजना थी ताकि धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाया जा सके।
पुलिस ने हाल ही में दिल्ली के आदर्श नगर और शाहबाद डेरी इलाकों में छापेमारी कर संदिग्ध इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और पेम्फलेट बरामद किए हैं, जिनसे इस नेटवर्क के विस्तार का पता चलता है। एजेंसियां अब इस बात की जांच कर रही हैं कि आदित्य और उसके साथी हिमांशु को फंडिंग कहां से मिल रही थी और क्या इस साजिश के पीछे कोई विदेशी हाथ या बड़ा नक्सली लिंक है।
फिलहाल आदित्य का लैपटॉप और फोन गायब है, जिसकी तलाश की जा रही है ताकि इस पूरे 'डिजिटल वॉर रूम' के राज फाश किए जा सकें। यह खुलासा बताता है कि कैसे पढ़े-लिखे युवाओं का इस्तेमाल करके एक संगठित तरीके से देश की औद्योगिक राजधानी को अस्थिर करने की कोशिश की गई थी।
