Nagpur Dussehra : महाराष्ट्र के नागपुर के दशहरे में कुछ अलग बात है। यहां के दशहरे में शहर भर में जितने भी रावण के पुतले बनते हैं, उन्हें एक ही परिवार के लोग बनाते हैं। खास बात ये है कि जिस व्यक्ति ने यहां पर पहली बार रावण दहन के लिए पुतला बनाया था, आज उन्हीं के परिवार की तीसरी पीढ़ी शहरभर में आयोजित होने वाले दशहरा उत्सवों के लिए रावण का पुतला बनाती है। नागपुर में रावण दहन की परंपरा का इतिहास 75 साल पुराना है। यहां पर पहले दशहरा तो मनाया जाता था, लेकिन रावण दहन नहीं किया जाता था। 75 साल पहले नागपुर का पहला रावण का पुतला बना और यहां के लोगों ने पहली बार रावण को दहन होते देखा।
नागपुर के रावण दहन का इतिहास (फोटो साभार - ट्विटर)
75 साल पुराना इतिहास
नागपुर में रावण दहन की शुरुआत करने का श्रेय जिन लोगों को जाता है उनमें से एक प्रोफेसर ध्यानसिंह ठाकुर हैं। दरअसल साल 1948 में एक प्रोफेसर ध्यानसिंह नागपुर आए थे, उस समय उन्होंने देखा कि नागपुर में दशहरा को बिना रावण दहन के ही मनाया जा रहा है। उस समय केवल उत्तर भारत और दिल्ली में भी रावण का दहन किया जाता था। जिसके बाद प्रोफेसर ने नागपुर में रावण दहन की शुरुआत की। लेकिन उस समय की बड़ी समस्या ये थी कि दहन करने के लिए रावण का पुतला कहां से आएगा। ऐसे में 85 साल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हेमराजसिंह बिनवार से संपर्क किया गया। हेमराजसिंह कागज और बांबू से कलाकृति बनाने में माहिर थे। उन्होंने रावण का पुतला बनाने के लिए हामी भर दी और पंजाब सेवा समिति ने रावण दहन की तैयारी की जिम्मेदारी उठाई।
ऐसे हुआ पहला रावण दहन
नागपुर में पहला रावण का पुतला 35 फीट ऊंचा बनाया गया था। हेमराजसिंह ने पुतले के सारे अंगो को अलग-अलग हिस्सों में बनाया था, जिसे बाद में जोड़ा गया। लेकिन उस समय एक और बड़ी समस्या ये भी थी कि रावण का पुतला खड़ा कैसे किया जाएगा। उस समय क्रेन नहीं हुआ करती थी, ऐसे में नागपुर महानगर पालिका ने सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया और लकड़ी का बड़ा मचान और सीढ़िया बनाई। जिसपर 50 लोग चढ़े और 100 लोगों ने रावण को मोटे रस्से से बांधकर उसके चारों ओर खड़े हो गए। 150 लोगों ने मिलकर रावण का पुतला खड़ा किया और नागपुर के रविनगर मैदान में शहर का पहला रावण दहन सफलतापूर्वक पूरा हुआ। यहां पर दो साल तक रावण दहन होने के बाद इसे कस्तूरचंद पार्क में आयोजित किया जाने लगा।
तीसरी पीढ़ी बना रही रावण का पुतला
नागपुर में आज रावण दहन कार्यक्रम शहर के कई जगहों पर होता है। लेकिन रावण का पुतला बनाने का काम सिर्फ बिनवार परिवार ही करता है। पहले रावण दहन कार्यक्रम के बाद हेमराजसिंह बिनवार को बहुत से ऑर्डर मिलने लगे। आज उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी रावण के पुतले बनाने का काम कर रही है। इसके लिए 2-3 महीने पहले ऑर्डर लिए जाते हैं आज भी पुतले के अलग-अलग हिस्सों को बनाकर उसे बाद में जोड़ा जाता है। हालांकि अब पुतलों के वजन पहले की तुलना में कम होते है ताकि उन्हें खड़ा करने में समस्या न हो।
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