मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के रूपनगर गांव का एक सरकारी प्राथमिक स्कूल कुछ महीने पहले अपनी व्यवस्थाओं और पढ़ाई के मॉडल को लेकर चर्चा में था। स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक रहे बद्रीलाल राठौर ने अपनी सैलरी से स्कूल में कई सुविधाएं विकसित कीं और स्थानीय लोगों की मदद से बच्चों के लिए पढ़ाई का बेहतर माहौल तैयार किया। अब उसी शिक्षक को शिक्षा विभाग ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
बच्चों को पढ़ाने के लिए जेब से खर्च किए लाखों, अब शिक्षा विभाग ने भेजा टीचर को नोटिस।
नोटिस में शिक्षक से स्कूल में अपनी निजी राशि से कराए गए विभिन्न कामों और सुविधाओं को लेकर जवाब मांगा गया है। इनमें स्टील बाउंड्री, टीवी, स्लाइड, वाटर कूलर, पेयजल टंकी, डायनिंग टेबल, फर्नीचर, पंखे और फर्श जैसी व्यवस्थाओं का जिक्र है। इसके अलावा बच्चों को स्कूल बैग, कॉपियां, पेन-पेंसिल और ज्योमेट्री बॉक्स जैसी सामग्री उपलब्ध कराने को लेकर भी जवाब मांगा गया है।
‘अच्छा काम करने की मिली तारीफ नहीं, नोटिस’
बद्रीलाल राठौर के कार्यकाल में रूपनगर का सरकारी प्राथमिक स्कूल स्थानीय स्तर पर चर्चा में आया था। इनपुट के मुताबिक, स्कूल में बच्चों की पढ़ाई के लिए ग्रुप स्टडी का मॉडल अपनाया गया था। बच्चों को स्कूल में ही पढ़ाई पूरी कराने पर जोर दिया जाता था और छुट्टी के बाद उन्हें होमवर्क का बोझ नहीं दिया जाता था।
स्कूल में बच्चों के भोजन के लिए भी अलग व्यवस्था की गई थी। बच्चे टेबल पर बैठकर भोजन करते थे और स्कूल परिसर में साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता था। ग्रामीणों का दावा है कि उस समय गांव का कोई बच्चा निजी स्कूल में नहीं जाता था और सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या और पढ़ाई का स्तर बेहतर हुआ था।
अपनी सैलरी से रखे थे दो निजी शिक्षक
इनपुट के मुताबिक, स्कूल में दो सरकारी शिक्षकों के अलावा बद्रीलाल राठौर ने अपनी सैलरी से दो महिला शिक्षकों को भी रखा था। इन शिक्षकों का वेतन भी कथित तौर पर राठौर अपनी जेब से देते थे। इसके अलावा रिटायर्ड नारकोटिक्स अधिकारी जगदीश यादव भी स्कूल में बच्चों को निशुल्क पढ़ाने आते थे। ग्रामीणों का कहना है कि इस व्यवस्था से बच्चों को अतिरिक्त शैक्षणिक मदद मिलती थी।
तबादले के वक्त रो पड़े थे बच्चे
बद्रीलाल राठौर का तबादला किए जाने के बाद स्कूल के बच्चों के रोने के वीडियो भी सामने आए थे। ग्रामीणों ने शिक्षक को वापस रूपनगर स्कूल में भेजने की मांग को लेकर अधिकारियों से संपर्क किया था। ग्रामीणों का दावा है कि शिक्षक के तबादले के बाद करीब 25 बच्चों के अभिभावकों ने स्कूल से उनकी टीसी निकलवा ली।
ग्रामीणों के मुताबिक, उनका कहना है कि राठौर के जाने के बाद स्कूल में पहले जैसी पढ़ाई और व्यवस्थाएं नहीं रह गई हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि शिक्षा विभाग के आधिकारिक आंकड़ों और स्कूल के वर्तमान रिकॉर्ड से की जानी बाकी है।
‘किसकी अनुमति से किया इतना खर्च?’
अब शिक्षा विभाग की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। नोटिस में राठौर से पूछा गया है कि उन्होंने निजी खर्च से स्कूल में इतनी व्यवस्थाएं किसके आदेश और अनुमति से कराईं।
नोटिस में स्कूल में बाउंड्री, टीवी, स्लाइड, वाटर कूलर, पेयजल टंकी, डायनिंग टेबल, फर्नीचर, पंखे और फर्श सहित कई व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है। बच्चों को अपनी ओर से उपलब्ध कराई गई शैक्षणिक सामग्री और निजी शिक्षकों की व्यवस्था को लेकर भी विभाग ने जवाब मांगा है।
यही सवाल अब चर्चा में है कि अगर कोई शिक्षक अपनी निजी राशि और स्थानीय लोगों की मदद से सरकारी स्कूल में सुविधाएं बढ़ाता है, तो इसके लिए विभागीय अनुमति की क्या प्रक्रिया है और क्या ऐसी व्यवस्था के लिए पूर्व स्वीकृति जरूरी है?
स्कूल पहुंची टाइम्स नाउ नवभारत की टीम
टाइम्स नाउ नवभारत की टीम जब रूपनगर के प्राथमिक स्कूल पहुंची तो स्कूल के बाहर रूपनगर मिडिल स्कूल के प्रधान अध्यापक मौजूद थे। टीम को स्कूल के अंदर जाकर कवरेज करने की अनुमति नहीं दी गई।
प्रधान अध्यापक ने कहा कि जिला शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश हैं कि बिना अनुमति मीडिया को स्कूल के अंदर प्रवेश नहीं दिया जा सकता। टीम से लिखित अनुमति लेकर आने को कहा गया। इसके बाद स्कूल की मौजूदा स्थिति को लेकर ग्रामीणों से बातचीत की गई। ग्रामीणों ने दावा किया कि बद्रीलाल राठौर के समय स्कूल में साफ-सफाई, फर्नीचर और पढ़ाई की व्यवस्थाएं बेहतर थीं।
मंत्री बोले- ‘अच्छा काम करने वाले शिक्षक की तारीफ होनी चाहिए’
इस मामले पर मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह से सवाल किया गया। उन्होंने कहा कि अच्छा काम करने वाले शिक्षक की तारीफ होनी चाहिए, लेकिन अनुशासन भी जरूरी है।
मंत्री के मुताबिक, यह जानना भी जरूरी है कि स्कूल में सुविधाओं के लिए पैसा कहां से आया और किसने काम करवाया। यानी विभाग इस बात की जांच करना चाहता है कि निजी स्तर पर स्कूल में किए गए खर्च और कराए गए काम नियमों के अनुरूप थे या नहीं।
कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस प्रवक्ता अभिनव बरोलिया ने इस कार्रवाई को लेकर सरकार और शिक्षा विभाग पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि अगर किसी शिक्षक ने सरकारी स्कूल में बेहतर काम किया है तो उसका मनोबल बढ़ाने के बजाय उससे यह पूछना कि उसने अच्छा काम क्यों और किसकी अनुमति से किया, शिक्षकों के लिए गलत संदेश है।
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि ऐसी कार्रवाई से सरकारी स्कूलों में बेहतर काम करने वाले शिक्षकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और सरकार की ओर से इस आरोप पर अलग से प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।
क्या है पूरा विवाद?
रूपनगर के सरकारी प्राथमिक स्कूल का मामला अब दो अलग-अलग पहलुओं के बीच खड़ा है। एक तरफ ग्रामीण और शिक्षक के समर्थक स्कूल में हुए बदलाव और बच्चों की पढ़ाई को उपलब्धि के तौर पर देख रहे हैं। दूसरी तरफ शिक्षा विभाग यह जांच कर रहा है कि निजी धन से स्कूल में कराए गए काम और निजी शिक्षकों की नियुक्ति किस नियम और अनुमति के तहत हुई।
सवाल है कि सरकारी स्कूल को बेहतर बनाने के लिए निजी स्तर पर खर्च करने वाले शिक्षक के लिए विभागीय नियम क्या कहते हैं? और क्या बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने से पहले औपचारिक अनुमति लेना जरूरी था? इन सवालों का जवाब शिक्षा विभाग की जांच और शिक्षक के जवाब के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा।
