लोहे के जंग लगे तो सुधार की गुंजाईश है, लेकिन प्रोत्साहन को ही अगर जंग लग जाए तो प्रोत्साहित होने वाले बच्चों की भावना आशा-अभिलाषा को भी धक्का लगता है और ये बच्चे यदि ट्राईबल क्षेत्र के हो तो फिर योजनाएं मुंह चिढ़ाने लगती है और धराशाही हो जाते है, वो सपने, जो मेहनत के दम पर जिंदगी के केनवास में रंग भरते हैं। मामला आदिवासी इलाके बांसवाडा के होनहार बेटियों को दी जाने वाली नि:शुल्क स्कूटी वितरण को लेकर जुड़ा है, जो अधिकारियों की लापरवाही के चलते अब कबाड़ बन गई है।
स्कूटियों में उग आए पौधे।
हरे भरे गार्डन में स्कूटी पड़ी हुई है, जिसमें मेहनत कर 66 फीसदी अंक लाने वाली आदिवासी बालिकाओं के सपनों का खाद बीज लगा है। ये स्कूटी गार्डन प्राकृतिक नहीं है, बल्कि लापरवाही की बारिश में तैयार हुआ सपनों और आकांक्षाओ का वो कबाड़ है, जो गार्डन जैसा दिखाई देता है। इस गार्डन में अगर निगाहों को थोड़ा पैना करके नजर डाली जाए तो आपको यहां हजारों की संख्या में स्कूटी दिखाई देंगी।
कबाड़ बन गई स्कूटी
तस्वीर बांसवाडा के विद्यामंदिर कॉलेज की है, जहां 600 स्कूटी कबाड़ नजर आ रही है। ऐसी ही 1090 और स्कूटी हैं, जो शहर की अलग अलग लोकेशन पर रखी हुई है। इन कुल 1690 स्कुटियों की कीमत 13.50 करोड़ रूपये के करीब है। गहलोत सरकार में शुरू हुई बेटी पढ़ाओ प्रोत्साहन योजना में होनहार छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए यह स्कूटी दी जानी थी, लेकिन लापरवाह अफसरों की कारगुजारियों ने न केवल आदिवासी बेटियों के सपनों पर सिर्फ पानी फेरा, बल्कि शहर में तैयार कर दिए धराशायी सपनों के कुछ स्कूटी गार्डन। योजना में तय था कि 66 फीसदी से अधिक अंक लाने वाली छात्राओं को मेरिट के आधार पर स्कूटी दी जायेंगी, लेकिन पिछले तीन सालों से ये स्कूटी योजना को मुंह चिढ़ा रही है और उन सपनों पर भी जंग लगा चुकी है जो इसके हकदार थे।
क्यों नहीं हो पाया वितरण?
पुराने स्कुटियों का अभी तक वितरण नहीं हो पाया और 2023-24 के लिए 1368 छात्राओं से नये आवेदन ले लिए गए हैं। चुनाव, आचार संहिता, लापरवाही, क्यू-आर कोड का इंतजार जैसे कई पहलू हैं, जिनके चलते पिछली सरकार स्कूटी वितरण नहीं कर पाई। कई छात्राएं स्कूल से जा चुकी हैं। मार्क शीट में उनके नम्बर 66 फीसदी से ज्यादा भी हैं, लेकिन अब उम्मीदें ज्यादा नहीं बची।
क्या बोले जनजाति मंत्री?
इस मामले पर जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने कहा कि करीब दो साल से सर्दी, गर्मी, बरसात और लापरवाहियों को झेलता उम्मीदों का यह प्रोत्साहन योजनाओं की कलाई खोल रहा है। विद्यालय की प्राचार्या की माने तो अभी उन्हें ऊपर से आने वाले दिशा निर्देशों का इंतजार है। बिना क्यू-आर कोर्ड जनरेट हुए स्कूटी वितरण करना संभव नहीं ह। वहीं, अब तक स्कूटी वितरण में अक्षम रहा विपक्ष भी ठीकरा सरकार पर फोड़ने लग गया है।
बता दें कि पात्र छात्राएं जो विद्यालय छोड़ चुकी हैं वो यह नहीं समझ पा रही की योजना खराब है या स्कूटी। फिलहाल तो देखने से यह लग रहा है। कबाड़ बनी ये स्कूटी खराब हो चुकी है। विपक्ष इन्हें बदल कर नई स्कूटी के वितरण के पक्ष में हैं, जिम्मेदार ऊपरी आदेशों के इंतजार में हैं और आदिवासी बच्चियां हैं योजना की इस वादा खिलाफी का शिकार। अब देखना यह होगा की कबाड़ होता यह स्कूटी गार्डन क्या प्रोत्साहन के नए गुल खिला पायेगा या यूं ही सड़ती हुई योजना की दुर्गंध को अपने में समेटे राजनितिक आरोप- प्रत्यारोपो के बीच उजड़ कर रह जाएगा।
