महरौली पुरातत्व पार्क में कोई नया निर्माण या जीर्णोद्धार कार्य नहीं होगा- सुप्रीम कोर्ट

एएसआई ने कहा था कि यह मकबरा पृथ्वीराज चौहान के किले के करीब है तथा प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम के तहत 200 मीटर के विनियमित क्षेत्र में आता है। उसने कहा था कि किसी भी मरम्मत, जीर्णोद्धार या निर्माण कार्य के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति की आवश्यकता होती है।

उच्चतम न्यायालय ने राजधानी के महरौली पुरातत्व पार्क के भीतर 13वीं सदी की आशिक अल्लाह दरगाह और सूफी संत बाबा फरीद की चिल्लागाह समेत सदियों पुराने धार्मिक ढांचों में कोई भी नया निर्माण या जीर्णोद्धार कार्य करने पर शुक्रवार को रोक लगा दी। प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने जमीर अहमद जुमलाना नाम के व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। इस याचिका में पुरातत्व पार्क के अंदर स्थित धार्मिक ढांचों को ध्वस्त होने से बचाए जाने का अनुरोध किया गया है।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

प्रधान न्यायाधीश ने क्या कहा

वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थिति रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि वहां पाया गया एक ऐतिहासिक स्मारक लगभग 700 साल पहले बनाया गया था। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ‘‘लोग पैसे कमाने के लिए अतिक्रमण करते रहते हैं और दुकानें लगाते रहते हैं।’’ उन्होंने एएसआई से यह सुनिश्चित करने के लिए योजना बनाने को कहा कि आगे कोई अतिक्रमण न हो।

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