Dehradun Air Pollution: देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर इलाकों में वायु प्रदूषण लगातार गंभीर होता जा रहा है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि साफ और ताजी हवा की तलाश में लोग पहाड़ों और हिल स्टेशनों की ओर रुख कर रहे हैं। लेकिन अगर आप बेहतर एयर क्वालिटी की उम्मीद में देवभूमि उत्तराखंड, खासकर देहरादून जाने का सोच रहे हैं, तो यह जानकर निराशा हो सकती है कि वहां की हवा भी अब पहले जैसी स्वच्छ नहीं रही।
देहरादून की वायु गुणवत्ता खतरे में...
कभी ताजी और साफ हवा के लिए पहचाना जाने वाला देहरादून अब प्रदूषण की चपेट में आता दिख रहा है। यह दावा महज़ अनुमान नहीं, बल्कि पिछले पांच वर्षों की रिपोर्ट्स में सामने आए आंकड़ों से इसकी पुष्टि होती है। इन रिपोर्ट्स के अनुसार, देहरादून के एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) में बीते वर्षों के दौरान लगातार उतार-चढ़ाव देखा गया है। मौजूदा समय में बदलते मौसम के साथ यहां की वायु गुणवत्ता की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। आखिर बीते पांच सालों में AQI का स्तर कैसे बदला, वर्तमान हालात क्या हैं और इसके पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हैं? इन सभी पहलुओं को हम आगे विस्तार से समझेंगे।
पिछले पांच साल का डेटा
अब बात करते हैं देहरादून में पिछले पांच सालों के वायु गुणवत्ता रुझान की। CPCB और IQAir जैसे विश्वसनीय स्रोतों पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यहां का वार्षिक औसत AQI समय के साथ काफी बदलता रहा है। साल 2020 में देहरादून का औसत AQI करीब 59 दर्ज किया गया, जो संतोषजनक श्रेणी में आता है। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान यातायात और औद्योगिक गतिविधियां सीमित रहने के कारण उस समय हवा अपेक्षाकृत साफ रही।
2021 से 2022 देहरादून का AQI
2021 में हालात बदलने लगे और औसत AQI बढ़कर लगभग 115 तक पहुंच गया। जैसे-जैसे सामान्य गतिविधियां और ट्रैफिक बढ़े, प्रदूषण का स्तर भी ऊपर चला गया। 2022 देहरादून के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण साल साबित हुआ, जब औसत AQI करीब 139 रहा और हवा अस्वस्थ श्रेणी में पहुंच गई।
2023 तक क्या रहा हाल?
2023 में स्थिति में कुछ सुधार देखने को मिला और औसत AQI घटकर लगभग 90 दर्ज किया गया। 2024 में भी यही स्तर बना रहा और वायु गुणवत्ता में न तो ज्यादा सुधार हुआ और न ही बड़ा बिगड़ाव देखने को मिला। वहीं, 2025 में अब तक का औसत AQI करीब 108 तक पहुंच चुका है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत अधिक है। सर्दियों के मौसम में यह स्तर और बढ़ने की आशंका रहती है।
267 से 294 के बीच दर्ज AQI
इन आंकड़ों से साफ है कि 2022 के बाद कुछ समय के लिए राहत जरूर मिली, लेकिन 2025 में एक बार फिर वायु गुणवत्ता में गिरावट देखने को मिल रही है। खासतौर पर सर्दियों में ठंड और कोहरे के कारण प्रदूषक कण वातावरण में फंस जाते हैं, जिससे AQI औसत से काफी ऊपर चला जाता है। अब अगर मौजूदा हालात की बात करें, तो 17 और 18 दिसंबर 2025 को देहरादून में वायु गुणवत्ता बेहद चिंताजनक बनी हुई है। इन दिनों शहर का AQI करीब 267 से 294 के बीच दर्ज किया गया है, जो वायु गुणवत्ता के पैमाने पर ‘खराब’ से लेकर ‘बहुत खराब’ और कुछ समय के लिए ‘गंभीर’ श्रेणी में भी पहुंच रहा है।
PM2.5 और NO₂ की मात्रा में बढ़त
विशेषज्ञों का कहना है कि, शहर में वाहनों की संख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है, जो वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण बन चुकी है। पुराने और खराब हालत वाले वाहनों का चलन, रोज लगने वाला ट्रैफिक जाम और निम्न गुणवत्ता वाले ईंधन के उपयोग से हवा में PM2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) की मात्रा बढ़ रही है। इसके साथ ही तेज शहरी विस्तार भी स्थिति को और गंभीर बना रहा है। नई सड़कों का निर्माण, बढ़ती इमारतें और लगातार चल रहे निर्माण कार्यों के कारण PM10 जैसे कण हवा में ज्यादा घुल रहे हैं। वहीं खुले में कचरा जलाना और सर्दियों के मौसम में लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल कर आग जलाना भी प्रदूषण को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल है।
ये चीजें भी करती हैं हवा को प्रभावित
आसपास के जंगलों में लगने वाली आग भी देहरादून की हवा को प्रभावित कर रही है। इन वन अग्निकांडों से उठने वाला धुआं शहर तक पहुंचकर वायु गुणवत्ता को और खराब कर देता है। इसके अलावा औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार, खासकर छोटे उद्योगों से होने वाला अनियमित और नियंत्रित न किया गया उत्सर्जन, प्रदूषण बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
सर्दियों के मौसम में हालात और भी बिगड़ जाते हैं। तापमान उलटाव की स्थिति, हवा की रफ्तार का कम होना, घना कोहरा और इस बार दर्ज किया गया रिकॉर्ड स्तर का सूखा, ये सभी कारण मिलकर प्रदूषक कणों को वातावरण में फंसा देते हैं, जिससे देहरादून की हवा और ज्यादा जहरीली हो जाती है।
प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सरकार ने नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत कई कार्ययोजनाएं लागू की हैं, जिनमें वाहनों की PUC जांच, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और जन-जागरूकता अभियान शामिल हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपायों को प्रभावी बनाने के लिए जमीनी स्तर पर सख्त और निरंतर कार्रवाई बेहद जरूरी है।
