दिल्ली : भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पुलिस व्यवस्था में कर्तव्य, विवेक और जनता के भरोसे को बेहद अहम बताया है। उन्होंने कहा कि पुलिस का काम केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना नहीं है। पुलिस को संकट आने से पहले ही उसकी आशंका पहचानकर तैयारी करनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने यह बात पूर्व पुलिस अधिकारी ओ.पी. मिश्रा की किताब ‘बियॉन्ड द यूनिफॉर्म- ड्यूटी, डिस्क्रेशन एंड पब्लिक ट्रस्ट’ के विमोचन के मौके पर कही। कार्यक्रम 16 सितंबर को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ।
CJI सूर्यकांत का पुलिस को संदेश
पुलिस की जिम्मेदारी अपराध के बाद नहीं, उससे पहले शुरू होती है
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पुलिस की जिम्मेदारी उस समय से शुरू नहीं होती जब अपराध हो चुका हो, भीड़ जमा हो गई हो या कोई आपात स्थिति पैदा हो गई हो। इसकी शुरुआत इससे बहुत पहले हो जाती है।
पुलिस को पहले से तैयारी करनी चाहिए। जरूरी जानकारी जुटानी चाहिए। अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल होना चाहिए। संभावित कमजोर जगहों की पहचान करनी चाहिए और जरूरत पड़ने से पहले ही कानून-व्यवस्था की पूरी व्यवस्था तैयार रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पुलिस का सबसे अच्छा काम कई बार वही होता है जिसमें किसी मुश्किल स्थिति को संकट बनने से पहले ही रोक लिया जाता है।
ब्रिक्स सम्मेलन का उदाहरण दिया
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने हाल में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन का सफल संचालन केवल मंच पर होने वाले कार्यक्रमों से संभव नहीं था। इसके पीछे पुलिस की बड़ी तैयारी थी। उन्होंने रास्तों और आयोजन स्थलों की सुरक्षा, यातायात व्यवस्था, मेहमानों के ठहरने की जगहों की सुरक्षा और रातभर निगरानी जैसे पुलिस के कामों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि किसी बड़े आयोजन की सफलता का आकलन कई बार इस बात से होता है कि कौन सी समस्या होने से पहले ही रोक दी गई। खतरे की पहले पहचान करना, किसी व्यवधान को रोकना और ऐसी तैयारी करना जिससे लोगों में अनावश्यक चिंता पैदा न हो। यही पुलिस सेवा का अनुशासन है।
कानून में अधिकार मिला है तो उसका सही इस्तेमाल भी जरूरी
मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस के विवेकाधिकार पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कानून सामान्य परिस्थितियों के लिए नियम तय करता है, लेकिन इंसानी जिंदगी हमेशा एक जैसी परिस्थितियों में नहीं चलती। किसी थाने में आधी रात को पहुंचे परेशान माता-पिता। अपनी बात कहने में हिचकिचाता कोई पीड़ित। तनावपूर्ण स्थिति को बिगड़ने से रोकने वाला पुलिस अधिकारी। इन सभी परिस्थितियों में कानून को सामने मौजूद इंसानी परिस्थिति के हिसाब से लागू करना होता है।
उन्होंने कहा कि किसी पुलिस अधिकारी की क्षमता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसके पास कार्रवाई करने का अधिकार है। यह भी जरूरी है कि वह समझे कि कार्रवाई कब करनी है। उसकी सीमा क्या होनी चाहिए। और कानून के उद्देश्य को प्रभावी तथा उचित तरीके से कैसे हासिल किया जा सकता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने साफ किया कि विवेकाधिकार का मतलब नियमों की अनदेखी करना नहीं है। उनके मुताबिक सही मायने में विवेक वह जगह है जहां कर्तव्य को न्याय में बदला जाता है।
एफआईआर से लेकर जांच तक, यहीं से न्याय की नींव पड़ती है
मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस और अदालत के काम को न्याय व्यवस्था की लगातार चलने वाली कड़ी बताया। उन्होंने कहा कि अदालत के सामने पुलिस जो सामग्री रखती है, न्यायपालिका उसी के आधार पर आगे बढ़ती है।
अगर एफआईआर सावधानी से दर्ज की गई हो और जांच निष्पक्ष तरीके से की गई हो तो अदालत में न्याय मिलने की संभावना मजबूत होती है। लेकिन अगर प्रक्रिया की शुरुआत में ही गलती हो जाए तो बाद में अदालत के लिए हुए नुकसान को पूरी तरह ठीक करना मुश्किल हो सकता है।
जनता का भरोसा पुलिस की सबसे बड़ी ताकत
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पुलिस पर जनता का भरोसा उसकी छवि से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से बनता है। जिस पुलिस पर लोगों को भरोसा होता है, वे जल्दी सामने आते हैं। जरूरी जानकारी साझा करते हैं और शांति बनाए रखने में सहयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि जब किसी नागरिक की बात संवेदनशीलता के साथ सुनी जाती है। उसके साथ सम्मान से व्यवहार किया जाता है और उसे सही रास्ता बताया जाता है। तब वह सिर्फ अपनी शिकायत दर्ज कराकर नहीं लौटता। बल्कि उसका भरोसा पूरी संस्था में बढ़ता है।
पुलिसकर्मियों को भी बेहतर माहौल चाहिए
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर समाज पुलिसकर्मियों से हर समय साहस, संयम और संवेदनशीलता की उम्मीद करता है तो उन्हें भी ऐसा माहौल देना होगा जिसमें ये गुण बेहतर तरीके से काम कर सकें। उन्होंने बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक जांच संसाधन, जिम्मेदार नेतृत्व, उचित कामकाजी परिस्थितियों और पुलिसकर्मियों के शारीरिक तथा भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान देने को जरूरी बताया।
ओ.पी. मिश्रा की 36 साल की सेवा का जिक्र
किताब के लेखक ओ.पी. मिश्रा का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि उन्होंने 36 साल पुलिस की वर्दी में सेवा की है। अब अपने अनुभवों को किताब के जरिए मौजूदा और आने वाली पीढ़ी के पुलिस अधिकारियों के सामने रखा है। मुख्य न्यायाधीश ने किताब को सिर्फ व्यक्तिगत अनुभवों का संग्रह नहीं बल्कि संस्थागत महत्व वाला काम बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह किताब पुलिस अधिकारियों और प्रशासकों के साथ छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों के बीच भी पढ़ी जाएगी।
वर्दी नागरिक से अलग नहीं, उसके साथ खड़ी हो
अपने संबोधन के अंत में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने किताब के तीन मूल विचारों। कर्तव्य, विवेक और जनता का भरोसा। का फिर जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब ये तीनों गुण एक साथ आते हैं तो पुलिस की वर्दी नागरिक से अलग खड़ी नहीं होती। वह नागरिक के साथ खड़ी होती है। सुरक्षा, सहायता और भरोसे के लिए।
