'राष्ट्र निर्माण' का ध्येय लेकर आरएसएस ने पूरी की 100 साल की यात्रा : CM मोहन यादव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस शताब्दी यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रचारकों के रूप में असंख्य विभूतियां आगे आईं, लेकिन किसी ने भी न अपने नाम की चिंता की न अस्तित्व और न ही जीवन की। वे सब राष्ट्र निर्माण कार्य की नींव में समा गये। संघ ने अपनी इस शताब्दी वर्ष यात्रा में समाज और राष्ट्रजीवन के आयाम को स्पर्श किया है।

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र निर्माण का ध्येय लेकर चले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। संसार के सबसे विशाल और अनूठे संगठन की यह यात्रा त्याग, तपस्या, निःस्वार्थ सेवा और अनुशासन का प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की यह यात्रा कई चुनौतियों और विषम परिस्थितियों में सेवा, समर्पण और संकल्प के ध्येय पथ पर आगे बढ़ी है। यह आद्य सरसंघचालक परमपूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी का संकल्प और प्रत्येक स्वयंसेवक का समर्पण है कि आज पूरे विश्व में संघ का ध्वज लहरा रहा है।

CM Mohan Yadav

सीएम मोहन यादव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना देश की असाधारण परिस्थितियों में हुई। भारत और भारत के स्वत्व के लिये जितना संकट अंग्रेजी राज से था उससे कहीं अधिक भारत विरोधी वे शक्तियां सक्रिय थीं जो भारत के पूर्ण रूपांतरण का कुचक्र रच रहीं थीं। इसे मालाबार, चटगांव, करांची और ढ़ाका की हिंसा से समझा जा सकता है। हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहार, स्त्रियों के अपहरण पर भी देश में चुप्पी रही। एक ओर समाज, संस्कृति और राष्ट्र के दमन का कुचक्र चल रहा था दूसरी ओर भारतीय समाज अनेक आंतरिक विसंगतियों में उलझ गया था। जहां समाज विखंडन और अस्पृश्यता जैसा लोक व्यवहार प्रभावी था, वहीं भारतीय समाज में आत्मगौरव कहीं खो रहा था। दासत्व की जंजीरों को ही अपनी नियति समझ लेने वाला विचार भी प्रभावी होने लगा था।

End of Feed