Bhiwandi Mayor Election : भिवंडी निजामपुर शहर महानगरपालिका के महापौर चुनाव ने मतदान से ठीक पहले नाटकीय मोड़ ले लिया है, जिससे पूरे राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि Bharatiya Janata Party (BJP) ने अपने ही घोषित उम्मीदवार को अचानक बदल दिया, जिससे पार्टी की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। BJP नेतृत्व ने पहले नारायण चौधरी को आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया था। शहर अध्यक्ष रविकांत सावंत ने इसकी औपचारिक घोषणा की थी और चौधरी ने महापौर पद के लिए नामांकन भी दाखिल कर दिया था।
भिवंडी महापौर चुनाव
लेकिन बुधवार को अचानक पार्टी ने यू-टर्न लेते हुए स्नेहा मेहुल पाटिल को नया उम्मीदवार घोषित कर दिया। शहर अध्यक्ष ने सभी नगरसेवकों को लिखित पत्र देकर इस बदलाव की पुष्टि भी की। इस घटनाक्रम से राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, इस फैसले से नाराज नारायण चौधरी अब Congress और Nationalist Congress Party (SP) के संपर्क में हैं और कुछ नगरसेवकों के साथ नई राजनीतिक रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं।
कांग्रेस का फायदा
चर्चा है कि यदि यह समीकरण बनता है तो बागी नेता के रूप में पहचाने जा रहे चौधरी महापौर बन सकते हैं, जबकि कांग्रेस को उपमहापौर पद और NCP (SP) को स्थायी समिति अध्यक्ष पद मिल सकता है। विपक्षी दलों में यह भी चर्चा है कि पूरा घटनाक्रम पूर्व-नियोजित था। उम्मीदवार बदलने के पीछे क्या पार्टी की सोची-समझी रणनीति थी? क्या 2019 की तरह आखिरी समय में राजनीतिक समीकरण बदलने की पुनरावृत्ति हो रही है? ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी के अंदर की नाराजगी खुलकर सामने आती है, तो BJP की संगठनात्मक अनुशासन पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग सकता है। जो पार्टी खुद को अनुशासन का प्रतीक बताती है, उसमें अधिकृत उम्मीदवार का ही बागी बनना नेतृत्व की रणनीतिक विफलता माना जा सकता है।
महानगरपालिका चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी को अलग रखकर अब कांग्रेस को रोकने की नई रणनीति की भी चर्चा है। लेकिन फिलहाल राजनीतिक गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है — क्या यह सिर्फ राजनीतिक चाल है या BJP के अंदरूनी मतभेदों का खुला विस्फोट? दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी में बगावत की स्थिति क्यों बन रही है, इस पर भी चर्चा तेज है। महापौर चुनाव से पहले का यह राजनीतिक ड्रामा भिवंडी की राजनीति पर लंबे समय तक असर डाल सकता है। साथ ही कांग्रेस-NCP की संभावित सेक्युलर गठबंधन राजनीति पर भी इसके प्रभाव दिखाई दे सकते हैं।
